ग्वालियर जिले में नरवाई प्रबंधन के लिये बनाई व्यापक कार्य योजना
11 मार्च 2026, ग्वालियर: ग्वालियर जिले में नरवाई प्रबंधन के लिये बनाई व्यापक कार्य योजना – खेत में ही वे फसल अवशेष अर्थात नरवाई व पराली जलाने के बजाय इसका वैज्ञानिक प्रबंधन करें। नरवाई जलाने से मृदा की उर्वरता पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता है। लाभदायक सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, उत्पादकता घट जाती है और पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण एवं भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए नरवाई नहीं जलाएं। यह अपील कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान ने जिले के किसानों से की है। जिला प्रशासन द्वारा नरवाई जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए व्यापक कार्य योजना लागू की गई है। इसके तहत व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। साथ ही नरवाई जलाने वालों के खिलाफ कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जायेगी। नरवाई प्रबंधन में अच्छा काम करने वाली ग्राम पंचायतों को सम्मानित भी किया जायेगा।
जिला एवं तहसील स्तर पर निगरानी दल गठित– नरवाई प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए जिला स्तर पर समिति गठित की गई है, जिसके अध्यक्ष अपर कलेक्टर एवं अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट होंगे तथा उप संचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास को सदस्य सचिव बनाया गया है। इसके अलावा तहसील स्तर पर निगरानी दल गठित किए गए हैं, जिनमें तहसीलदार, थाना प्रभारी, पटवारी, कृषि विस्तार अधिकारी, पंचायत सचिव एवं रोजगार सहायक शामिल हैं।
ग्रामों का जोनवार वर्गीकरण- जिले में पूर्व वर्षों में दर्ज नरवाई जलाने की घटनाओं के आधार पर ग्रामों को रेड, ऑरेंज, यलो एंड ब्लू जोन में वर्गीकृत किया गया है। रेड जोन में 10 से अधिक घटनाओं वाले ग्राम, ऑरेंज जोन में 5 से 10, यलो जोन में 3 से 4 तथा ब्लू जोन में 1 से 2 घटनाओं वाले ग्राम शामिल हैं। इन जोनों के अनुसार अलग-अलग स्तर पर जागरूकता एवं निगरानी की कार्ययोजना बनाई गई है।
15 जून तक चलेगा जन जागरूकता अभियान– नरवाई प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए गत 1 मार्च से 15 जून तक विशेष जन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा । इसके तहत ग्राम स्तर पर किसान संगोष्ठी, चौपाल, बाइक, साइकिल एवं ट्रैक्टर रैली, मानव श्रृंखला, मुनादी तथा सोशल एवं प्रिंट मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। साथ ही हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्ट्रा रीपर, मल्चर एवं बेलर जैसे कृषि यंत्रों का प्रदर्शन भी कराया जाएगा, ताकि किसान इनका उपयोग कर फसल अवशेष का वैज्ञानिक प्रबंधन कर सकें।
नरवाई से अतिरिक्त आय के अवसर– नरवाई को जलाने के बजाय मल्चिंग, भूसा निर्माण अथवा पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। बेलर सहित अन्य मशीनों की सहायता से फसल अवशेष के बंडल बनाकर उद्योगों, एथेनॉल एवं सीबीजी इकाइयों में ईंधन के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है। इसके अलावा हैप्पी सीडर या सुपर सीडर के माध्यम से बिना जुताई सीधे बोनी करने के लिए भी किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
कंबाइन हार्वेस्टर के साथ एसएमएस लगाना अनिवार्य – जिले में संचालित सभी कंबाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) अथवा स्ट्रा रीपर का उपयोग अनिवार्य किया गया है। बिना इन उपकरणों के कंबाइन हार्वेस्टर चलाने पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में कंबाइन हार्वेस्टर संचालकों के साथ बैठक आयोजित कर उन्हें निर्देशित किया जा रहा है। जिला परिवहन अधिकारी एवं कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा इसकी नियमित निगरानी की जाएगी।
सैटेलाइट से निगरानी, लगेगा अर्थदंड – नरवाई जलाने की घटनाओं की निगरानी जिला प्रशासन द्वारा सैटेलाइट के माध्यम से की जाएगी। सूचना मिलने पर निगरानी दल 48 घंटे के भीतर मौके पर पहुंचकर पंचनामा तैयार करेगा और नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। पर्यावरण संरक्षण के प्रावधानों के अनुसार 2 एकड़ से कम भूमि वाले कृषकों पर 2500 रुपये, 2 से 5 एकड़ तक भूमि वाले कृषकों पर 5000 रुपये तथा 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले कृषकों पर 15000 रुपये प्रति घटना अर्थदंड निर्धारित किया गया है। इसके अलावा ऐसे कृषकों को शासकीय योजनाओं एवं समर्थन मूल्य पर उपार्जन से भी वंचित किया जा सकता है।
नरवाई मुक्त ग्रामों को मिलेगा सम्मान– जिला प्रशासन द्वारा यह भी निर्णय लिया गया है कि जिन ग्रामों में नरवाई जलाने की घटनाएं शून्य रहेंगी, वहां के सरपंच, सचिव, पटवारी, कृषि विस्तार अधिकारी सहित संबंधित कर्मचारियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा। वहीं जिन ग्रामों में अधिक घटनाएं होंगी, वहां जागरूकता बढ़ाने के लिए “पर्यावरण मित्र” बनाए जाएंगे।
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