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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

जलवायु संकट के दौर में पारंपरिक फसलों की वापसी: भारत और मध्य प्रदेश के लिए नया अवसर 

लेखक: शशिकांत त्रिवेदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार

02 नवंबर 2026, नई दिल्ली: जलवायु संकट के दौर में पारंपरिक फसलों की वापसी: भारत और मध्य प्रदेश के लिए नया अवसर – दुनिया भर में बढ़ते तापमान और अनिश्चित मौसम ने कृषि व्यवस्था पर गहरा दबाव बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार पिछले तीन दशकों में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला वार्षिक कृषि नुकसान दोगुने से अधिक हो गया है और अब यह औसतन लगभग ₹13,68,000 करोड़ प्रति वर्ष तक पहुँच चुका है। सप्लाई चेन में व्यवधान भी तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि मौजूदा खाद्य प्रणाली अगले 30 वर्षों में टिकाऊ नहीं रह पाएगी।

पशुपालन कठिन होता जाएगा और मक्का-सोयाबीन जैसी मुख्य फसलों का उत्पादन भी प्रभावित होगा। इस चुनौती का समाधान पारंपरिक और जलवायु-लचीली फसलों को फिर से बढ़ावा देने में छिपा है। एफएओ और यूरोपीय आयोग जैसे संगठन मानते हैं कि मोनोकल्चर की जगह विविध फसलें अपनाने से कीट-व्याधियों का प्रकोप घटेगा और कृषि प्रणाली अधिक मजबूत बनेगी। भारत में यह दिशा पहले से ही दिखाई दे रही है। बाजरा जैसी पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों की मदद से 2025 में देश में बाजरे का उत्पादन 18 मिलियन टन तक पहुँच गया। ये फसलें न केवल सूखा सहन करने में सक्षम हैं, बल्कि पोषण से भरपूर भी हैं और स्थानीय संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। मध्य प्रदेश के संदर्भ में यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण है।

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राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है और यहाँ के किसान जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को पहले से महसूस कर रहे हैं। राज्य में बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो-कुटकी जैसी पारंपरिक फसलें सदियों से उगाई जाती रही हैं। ये फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद करती हैं। हिमालयी क्षेत्रों में काले सोयाबीन जैसी फसलों को रागी के साथ इंटरक्रॉपिंग करने से पैदावार बढ़ाने के सफल प्रयोग हो रहे हैं। इसी तरह की तकनीकें मध्य प्रदेश के पठारी और सूखा प्रभावित इलाकों में भी अपनाई जा सकती हैं। हालांकि किसानों के सामने कई बाधाएँ हैं। पारंपरिक फसलों से होने वाली आय अक्सर कम होती है और बाजार तक पहुँच सीमित है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसानों को खास बाजारों से जोड़ा जाए, जहाँ उन्हें बेहतर दाम मिल सकें। साथ ही, पारम्परिक लेकिन बार बार उगने वाली फसलों की खेती के तरीकों को अपनाने और वैज्ञानिक जानकारी को स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराने की जरूरत है। कई युवा खेती छोड़ रहे हैं क्योंकि इसमें स्थिरता और मुनाफा कम दिखता है। यदि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ा जाए तो युवाओं को फिर से खेती की ओर आकर्षित किया जा सकता है। ज्ञान के आदान-प्रदान का महत्व भी रेखांकित किया जा रहा है। मेक्सिको के “कैक्टस” का उदाहरण बताता है कि कैसे पारंपरिक जानकारी के बिना किसी नई फसल को अपनाना मुश्किल हो जाता है। एफएओ ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इस पौधे की उपयोगिता पर रिपोर्ट जारी कर जागरूकता बढ़ाई।

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इसी तरह भारत और मध्य प्रदेश में भी स्थानीय फसलों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को दर्ज करने और फैलाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के मुताबिक, 2021 के बाद से सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं के कारण कृषि, खाद्य और पेय उद्योगों में व्यवधान 250 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। एफएओ के अनुसार, 2014 तक इंसानों के उपभोग के लिए होने वाले वैश्विक फसल उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केवल नौ मुख्य फसल प्रजातियों से आता था। प्रसिद्द अंग्रेजी अख़बार फायनांशल टाइम्स में प्रकाशित जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में खाद्य और जलवायु मामलों की एक प्रोफेसर के मुताबिक, “आज हमारे पास जो खाद्य प्रणाली है, वह 30 साल बाद काम नहीं आएगी।” वे चेतावनी देती हैं कि पशुपालन करना बहुत मुश्किल हो जाएगा और ब्राजील जैसी प्रमुख निर्यातक देशों में मक्का व सोयाबीन उगाना भी बेहद कठिन हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भारत को अपनी कृषि विविधता को बचाना और बढ़ाना होगा। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पारंपरिक फसलों को मुख्यधारा में लाने से न केवल खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ेगी और सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रहेगी। सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के बीच समन्वय से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। कल की खाद्य सुरक्षा आज की इन छोटी लेकिन महत्वपूर्ण फसलों पर निर्भर करेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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