बढ़ते कपास आयात ने बढ़ाई चिंता, भारत की वैश्विक स्थिति कमजोर
03 अगस्त 2026, नई दिल्ली: बढ़ते कपास आयात ने बढ़ाई चिंता, भारत की वैश्विक स्थिति कमजोर – भारत में कपास के बढ़ते आयात को लेकर चिंता जताते हुए प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एवं पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. आर.एस. परोड़ा ने कहा है कि यदि देश ने शीघ्र ही नेक्स्ट-जनरेशन जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) तकनीकों को अपनाने और विज्ञान-आधारित नियामक सुधार लागू करने की दिशा में कदम नहीं उठाए, तो वैश्विक कपास उत्पादन में अपनी खोती हुई प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को वापस पाना कठिन हो जाएगा।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) द्वारा जारी नवीनतम अनुमान पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. परोड़ा ने कहा कि भारत के कपास क्षेत्र को दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें उन्नत जैव प्रौद्योगिकी, विज्ञान-आधारित नियमन तथा नवाचार को प्राथमिकता दी जाए।
CAI के अनुसार, वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का कपास आयात 60 लाख गांठ तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि निर्यात घटकर 15 लाख गांठरहने की संभावना है। वहीं, घरेलू खपत बढ़कर 348 लाख गांठ आंकी गई है। यह स्थिति देश में उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते अंतर तथा आयात पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है।
डॉ. परोड़ा ने कहा कि ये आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारत का कपास क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक नेतृत्व की स्थिति से लगातार पीछे खिसक रहा है। उनका मानना है कि जिस फसल में भारत वर्ष 2014 तक दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक था, उसी में बढ़ती आयात निर्भरता यह दर्शाती है कि अब नेक्स्ट-जनरेशन जीएम तकनीकों को अपनाने और विज्ञान-आधारित नियामक सुधारों को लागू करने की तत्काल आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि यह कदम केवल उत्पादकता बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को मजबूत करने और कपास क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक नीति ढांचा तैयार करने के लिए भी आवश्यक है। साथ ही, बढ़ती आयात निर्भरता देश को वैश्विक बाजार और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
डॉ. परोड़ा के अनुसार, भारत के कपास क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियां अस्थायी नहीं बल्कि संरचनात्मक हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों से भारतीय किसानों को उन नई जीएम तकनीकों का लाभ नहीं मिल पाया है, जिन्हें दुनिया के कई प्रमुख कपास उत्पादक देशों ने अपनाकर अपनी उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है।
उन्होंने बताया कि भारत का कपास क्षेत्र लगभग 70 लाख किसानों की आजीविका से जुड़ा है और देश के सबसे बड़े रोजगार सृजित करने वाले वस्त्र उद्योग के लिए प्रमुख कच्चा माल उपलब्ध कराता है। ऐसे में उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार के लिए नवाचार आधारित तकनीकों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. परोड़ा ने हाल ही में घोषित कॉटन मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कपास उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कई पहलें प्रस्तावित हैं, लेकिन नेक्स्ट-जनरेशन जीएम कपास जैसी उन्नत तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाने की स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं देती।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के नियामक ढांचे को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए, ताकि वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित और प्रमाणित कृषि नवाचारों को समय पर किसानों तक पहुंचाया जा सके। उनके अनुसार, जिन देशों ने कृषि क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया है, उन्होंने नवाचार को पारदर्शी, पूर्वानुमेय और विज्ञान-आधारित नियामक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ाया है।
बीटी कपास के सफल अनुभव का उल्लेख करते हुए डॉ. परोड़ा ने कहा कि भारत पहले भी विज्ञान-आधारित निर्णयों के माध्यम से कपास उत्पादन में उल्लेखनीय परिवर्तन ला चुका है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यदि भारत को एक बार फिर वैश्विक कपास क्षेत्र में अग्रणी स्थान हासिल करना है, तो नेक्स्ट-जनरेशन जीएम तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ दीर्घकालिक, विज्ञान-आधारित नीति सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी।
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