प्रावधानों के जाल में उलझी अतिवृष्टि पर राहत

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(सचिन बोन्द्रिया)

इंदौर। राज्य में अतिवृष्टि और बाढ़ से प्रभावित हुए किसानों को लेकर प्रदेश में राजनैतिक दांव-पेंच खेले जा रहे हैं। एक ओर कांग्रेस सरकार के मंत्री आर्थिक सहायता के लिए दिल्ली दौड़ लगा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर  विपक्षी भाजपा के नेता धरना परम्परा को पुनर्जीवित कर रहे हैं। लेकिन किसानों की वर्तमान हालत की चिंता किसी को नहीं है। किसान आर्थिक सहायता पाने की बाट जोह रहा है, जबकि अतिवृष्टि होने पर आर्थिक सहायता देने का मामला अधिसूचित नहीं होने से उलझ कर रह गया है। ऐसे में अतिवृष्टि से प्रभावित हुए किसानों को आर्थिक सहायता की भरपाई करेगा कौन ? केन्न्द्र सरकार या राज्य सरकार ? सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में अतिवृष्टि से करीब 55 लाख किसानों की 60 लाख हेक्टेयर की फसल खराब हो गई है। इस प्राकृतिक आपदा से किसानों को राहत दिलाने के लिए भारत सरकार से एनडीआरएफ से 6621.28 करोड़ रुपए एवं एसडीआरएफ की दूसरी किश्तों रूप में 533 करोड़ जारी करने की मांग की जा चुकी है। 

इसके पश्चात मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ ने दिल्ली में प्रधानमंत्री से भेंट कर राशि शीघ्र जारी करने का अनुरोध किया था। 

गत 1 नवंबर को म.प्र. स्थापना दिवस पर इन्दौर में पत्रकारों से चर्चा में कैबिनेट मंत्री श्री जीतू पटवारी ने केन्द्र सरकार पर सौतेले व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि केन्द्र ने अब तक कोई राशि जारी नहीं की है। जबकि कर्नाटक, बिहार जैसे अन्य राज्यों को जारी कर दी है। इस मुद्दे पर उन्होंने चार बार कहा कि क्या म.प्र. के 28 भाजपा सांसदों को सांप सूंघ गया है? वे प्रदेश के किसानों के हित में दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से आर्थिक सहायता जारी करने का अनुरोध क्यों नहीं करते हैं? 

श्री पटवारी ने कहा कि अतिवृष्टि और बाढ़ से  जिन किसानों की पशु हानि, जन-धन हानि हुई और मकान ढह गए उनके लिए राज्य सरकार ने  राज्य प्राकृतिक आपदा मद से 470 करोड़ की राशि प्रभावित जिलों की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर जारी की है।

आर्थिक सहायता के लिए केन्द्र सरकार से राशि मांगने से जुड़े कृषक जगत के एक सवाल  पर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्री जीतू पटवारी  संतोषजनक जवाब नहीं दे पाये। कृषक जगत ने सवाल किया था कि म.प्र.सरकार ने उक्त राशि की मांग अतिवृष्टि से या बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए की है? प्राप्त जानकारी के अनुसार नेचुरल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005, के तहत सिर्फ बाढ़ से प्रभावित लोगों को ही राशि जारी किए जाने का प्रावधान है,अतिवृष्टि का नहीं। इस पर मंत्री ने कहा कि अतिवृष्टि और बाढ़ दोनों से जो नुकसान हुआ है उसे मिलाजुलाकर करीब 12 हजार 500 करोड़ से की राशि की मांग का परिपत्र केंद्र सरकार को दिया है, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहा कि जब अतिवृष्टि के लिए सहायता देने की कानूनन कोई अधिसूचना ही नहीं है, तो केंद्र कैसे राशि जारी करेगा….?  गौर करने वाली बात यह है कि प्राकृतिक आपदा की जारी सूची में अतिवृष्टि को अधिसूचित ही नहीं किया गया है। 

प्राकृतिक आपदा में बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि, भूकम्प, भूस्खलन, सुनामी, हिमस्खलन, आंधी, बादल फटना, आग लगना, कीट आक्रमण, पाला और शीत लहर को शामिल किया गया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि अधिसूचना के अभाव में अतिवृष्टि से हुई हानि की क्षति पूर्ति कैसे होगी। जबकि दोनों प्रमुख राजनैतिक दल कानून बनाने के बजाय आरोप- प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं। किसानों की सुध कोई नहीं ले रहा है।

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