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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

श्योपुर के किसानों ने सीखी कांटारहित कैक्टस की खेती – सूखे में हरे चारे और आय का नया विकल्प

09 अक्टूबर 2025, श्योपुर: श्योपुर के किसानों ने सीखी कांटारहित कैक्टस की खेती – सूखे में हरे चारे और आय का नया विकल्प – किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग द्वारा खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ग्रीन-एजी परियोजना के अंतर्गत श्योपुर जिले के किसानों का एक अध्ययन दल मंगलवार को सीहोर जिले के आईसीएआरडीए केंद्र, अमलाहा पहुँचा। इस दौरे का उद्देश्य किसानों को कांटारहित कैक्टस की खेती और उसके विविध उपयोगों के बारे में व्यावहारिक जानकारी देना था।

इस दल के साथ राज्य तकनीकी समन्वयक डॉ. नीलम बिसेन पवार, संचार अधिकारी श्रीमती मिली मिश्रा और पशुपालन विशेषज्ञ अमृतेश वशिष्ठभी उपस्थित रहे। किसानों ने इस दौरे के दौरान वैज्ञानिकों से बातचीत कर न केवल खेती की तकनीक को समझा बल्कि खेतों में जाकर प्रत्यक्ष रूप से कैक्टस की विभिन्न किस्मों का अवलोकन भी किया।

कम पानी में फलने वाला पौधा, पशुओं के लिए हरे चारे का भरोसेमंद साधन

प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ. नेहा तिवारी, वैज्ञानिक (ICARDA-India), ने बताया कि कैक्टस ऐसा पौधा है जो बहुत कम पानी में भी आसानी से उग जाता है और शुष्क एवं बंजर भूमि में भी बेहतर पनप सकता है। कांटारहित किस्म के कारण यह पशुपालकों के लिए गर्मी और सूखे के समय हरे चारे का एक उपयोगी विकल्प बन सकता है।

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उन्होंने बताया कि कैक्टस से बायोगैस और जैविक खाद तैयार करने की प्रक्रिया भी सरल है, जो किसानों के लिए अतिरिक्त लाभ दे सकती है।
“यह पौधा केवल सूखे इलाकों का साथी नहीं, बल्कि टिकाऊ कृषि का प्रतीक बन सकता है,” डॉ. तिवारी ने कहा।

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किसानों ने देखा, समझा और अपनाने की जताई इच्छा

दौरे में शामिल किसानों ने खेतों में जाकर कैक्टस के पौधों को करीब से देखा और उसकी देखभाल, सिंचाई और कटाई की तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी ली।
किसानों का कहना था कि यह खेती कम लागत वाली और जोखिम रहित है, जो पशुपालन के साथ-साथ आय बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

श्योपुर के किसान रामलाल मीणा ने बताया, “हमारे इलाके में बारिश कम होती है, इसलिए यह पौधा हमारे लिए उपयोगी रहेगा। इससे हमारे पशुओं को हरा चारा मिलेगा और बंजर जमीन का भी सही उपयोग होगा।”

ग्रीन-एजी परियोजना से टिकाऊ खेती की दिशा में कदम

वर्तमान में ग्रीन-एजी परियोजना श्योपुर और मुरैना जिलों में संचालित है। परियोजना का उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और सतत भूमि प्रबंधन को भारतीय कृषि में शामिल करना है।

इस परियोजना के तहत किसानों को नई, पर्यावरण-अनुकूल खेती की तकनीकें सिखाई जा रही हैं, जिनमें कांटारहित कैक्टस की खेती एक प्रमुख पहल है। यह न केवल सूखे क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, बल्कि इससे खेती और पशुपालन दोनों को स्थायी आय का आधार मिल सकता है।

सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नई उम्मीद

कांटारहित कैक्टस की खेती उन इलाकों के किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रही है, जहां पानी की कमी और सूखे की समस्या आम है। कम सिंचाई, न्यूनतम देखभाल और कई उपयोगों के चलते यह पौधा भविष्य की जलवायु-समर्थक कृषि का हिस्सा बनता जा रहा है।

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