राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

बायोलॉजिकल कृषि आदानों को बढ़ावा देने पर जोर, BASAI कॉन्क्लेव में नीति, नवाचार और निर्यात पर हुई चर्चा

16 जुलाई 2026, नई दिल्ली: बायोलॉजिकल कृषि आदानों को बढ़ावा देने पर जोर, BASAI कॉन्क्लेव में नीति, नवाचार और निर्यात पर हुई चर्चा – टिकाऊ कृषि और सुरक्षित खाद्य उत्पादन के लिए भारत को एकीकृत कृषि प्रणाली (इंटीग्रेटेड फार्मिंग) को तेजी से अपनाने, बायोलॉजिकल कृषि आदानों की गुणवत्ता मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बायो-आधारित कृषि उद्योग विकसित करने की आवश्यकता है। यह बात भारत एग्री-बायोलॉजिकल्स कॉन्क्लेव 2026 में विभिन्न वक्ताओं ने कही।

बायोलॉजिकल एग्री सॉल्यूशंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BASAI) द्वारा आयोजित इस कॉन्क्लेव में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, कृषि वैज्ञानिक और बायोलॉजिकल कृषि आदान उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में इस बात पर मंथन हुआ कि बेहतर नीतियों, प्रभावी नियामक व्यवस्था, नवाचार और बाजार विकास के माध्यम से भारत में बायोलॉजिकल कृषि आदानों के उपयोग को कैसे बढ़ावा दिया जाए I

टिकाऊ कृषि के लिए एकीकृत खेती सबसे प्रभावी मॉडल

मुख्य वक्ता के रूप में भारत सरकार के कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह ने कहा कि एकीकृत खेती भारतीय कृषि के लिए सबसे टिकाऊ मॉडल है। इससे रासायनिक कृषि आदानों पर निर्भरता कम करते हुए देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन बनाए रखा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसान बड़े पैमाने पर जैव उर्वरकों को अपनाते हैं तो भविष्य में इनकी मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। उनके अनुसार, बायोलॉजिकल कृषि आदानों का व्यापक उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने तथा सुरक्षित, पौष्टिक और वैश्विक बाजार की जरूरतों के अनुरूप कृषि उत्पादन को बढ़ावा देगा।

गुणवत्ता सबसे बड़ी चुनौती

सम्मेलन में वक्ताओं ने माना कि बायोलॉजिकल कृषि आदान उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की उपलब्धता है।

केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (CIB&RC) के सचिव डॉ. सुभाष चंद ने कहा कि बायोलॉजिकल उद्योग की सफलता उत्पादों की गुणवत्ता और किसानों को उनके सही उपयोग की जानकारी पर निर्भर करेगी।

उन्होंने कहा कि कुछ कंपनियां केवल माइक्रोबियल स्ट्रेन खरीदकर उत्पाद तैयार करती हैं, लेकिन अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास में पर्याप्त निवेश नहीं करतीं। इससे उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और किसानों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। उन्होंने उद्योग से अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश करने का आह्वान किया।

सरकार, उद्योग और शोध संस्थानों के बीच समन्वय जरूरी

BASAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विपिन सैनी ने कहा कि बायोलॉजिकल समाधान केवल पोषक तत्व प्रबंधन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) जैसी टिकाऊ खेती प्रणालियों को भी मजबूती देते हैं।

उन्होंने BASAI की S.H.E. (Sustainability, Health and Economy) पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य वैज्ञानिक आधार पर किसान-केंद्रित बायोलॉजिकल तकनीकों को बढ़ावा देना है।

BASAI की अध्यक्ष संदीपा कानिटकर ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को बायोलॉजिकल कृषि आदान उद्योग में आत्मनिर्भर बनना होगा। उनके अनुसार, स्वदेशी जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और बायोस्टिमुलेंट आयातित रासायनिक कृषि आदानों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ मिट्टी की जैव विविधता, फसलों की सहनशीलता और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार, शिक्षण संस्थानों, अनुसंधान संगठनों और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी आवश्यक है।

तकनीक, कौशल और नियामक सुधार पर जोर

कॉन्क्लेव के समापन पर वक्ताओं ने बायोलॉजिकल कृषि आदान उद्योग के विकास के लिए मजबूत नीतिगत समर्थन, नियामक प्रक्रियाओं में सामंजस्य, अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश तथा सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग के बीच व्यापक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि इन प्रयासों से भारत टिकाऊ कृषि प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने के साथ विकसित भारत के लक्ष्य को भी गति दे सकेगा।

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