Ad DesktopAd TabletAd Mobile
राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

संसद में कृषि : पर्यावरण और बीजों की स्वायत्तता

लेखक: नीलेश देसाई

27 जुलाई 2026, भोपाल: संसद में कृषि : पर्यावरण और बीजों की स्वायत्तता – आज भारत की कृषि नीति एक ऐसे ऐतिहासिक दोराहे पर खड़ी है जहाँ एक तरफ ‘औद्योगिक मानकीकरण’ की चमक है, तो दूसरी तरफ ‘पारिस्थितिकी तंत्र’ और ‘संप्रभुता’ को बचाने की जमीनी पुकार। संसद के पटल और नीतिगत गलियारों में चर्चा का विषय बना ‘बीज विधेयक 2025’ केवल एक कानूनी मसौदा भर नहीं है, बल्कि यह तय करने का संकेत है कि भविष्य में हमारी कृषि किस करवट बैठेगी?

मुख्य वैचारिक टकराव : ‘उत्पाद’ बनाम ‘साझा विरासत’

इस पूरे विवाद की जड़ उस बुनियादी नजरिए में है जिससे दोनों पक्ष बीज और खेती को देखते हैं। सरकार और बाजार-उन्मुख तंत्र का मानना है कि यदि भारतीय कृषि को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाना है, तो बीजों का औद्योगिक मानकीकरण, पेटेंट, कड़ा प्रमाणीकरण और ‘क्यूआर कोड’ जैसी तकनीकी पहचान अनिवार्य है। तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे कॉर्पोरेट निवेश बढ़ेगा और नकली बीजों पर लगाम लगेगी।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

इसके ठीक उलट, किसानों और पर्यावरणविदों का नजरिया पूरी तरह पारिस्थितिक है। हमारे लिए बीज किसी फैक्ट्री में बनने वाला कोई ‘उत्पाद’ नहीं है, जिसे कानूनी सांचों में कसा जाए। बीज तो हजारों सालों के प्राकृतिक चयन, हमारी समृद्ध जैव-विविधता और पीढ़ियों के पारंपरिक ज्ञान का परिणाम है। यह संपूर्ण समाज की एक ‘साझा विरासत’ है, जिसे तिजोरियों या पेटेंट के नियमों में बंद नहीं किया जा सकता।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

‘अप्रत्यक्ष बहिष्करण’ का व्यावहारिक खतरा

भले ही सरकारी बयानों और प्रचार-प्रसार के कार्यालयों के माध्यम से यह भरोसा दिलाया जाता रहा हो कि यह बिल पारंपरिक बीजों और ‘गैर-ब्रांडेड’ अनौपचारिक आदान-प्रदान पर लागू नहीं होगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही अंदेशा जताती है। कानून की भाषा और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन में हमेशा एक बड़ा अंतर होता है, जिसे हम ‘अप्रत्यक्ष बहिष्करण’ के रूप में समझ सकते हैं।

जब बाजार के 90 प्रतिशत हिस्से पर प्रमाणित, ‘क्यूआर कोड’ वाले कॉर्पोरेट बीजों का नियंत्रण हो जाएगा, तो पारंपरिक बीजों का अनौपचारिक बाजार स्वतः ही हाशिए पर चला जाएगा। हमारे देश के छोटे और सीमांत किसानों के पास इतनी प्रशासनिक या कानूनी क्षमता नहीं होती कि वे किसी कानूनी विवाद की स्थिति में सरकारी दफ्तरों या अदालतों में जाकर अपने बीजों को ‘पारंपरिक’ साबित कर सकें। ऐसे में भारी जुर्माने और कानूनी पेचीदगियों का डर उन्हें अनजाने में ही सही, पूरी तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों पर निर्भर बना देगा।

वैश्विक संदर्भ और केन्या की चेतावनी

यह संकट केवल भारत का नहीं है। आज पूरी दुनिया में कॉर्पोरेट-एकाधिकार के खिलाफ किसान सड़कों पर हैं। यूरोप में कड़े कॉर्पोरेट पर्यावरण मानकों और बढ़ती लागत के कारण छोटे किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। केन्या का ‘सीड एंड प्लांट वैरायटी एक्ट’ हमारे सामने एक कड़वी चेतावनी है, जहाँ पारंपरिक बीजों को आपस में साझा करना या बेचना कानूनी रूप से दंडनीय अपराध बना दिया गया है। ‘ला विया कैम्पेसिना’ जैसे वैश्विक किसान आंदोलन आज इसी ‘बीज गुलामी’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। ‘भारत-अमेरिका व्यापार संधि’ जैसी नीतियां यदि हमारी संप्रभुता से ऊपर कॉर्पोरेट के पेटेंट अधिकारों को तरजीह देती हैं, तो भारत में भी केन्या जैसी स्थिति दूर नहीं होगी।

सामुदायिक बीज बैंक : एक जीवित विकल्प

इस संकट का समाधान प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद है। झाबुआ की ‘सम्पर्क संस्था’ द्वारा पिछले कई दशकों से संचालित ‘सामुदायिक बीज बैंक’ इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। पारंपरिक श्रम और सहकारिता के ‘अदजी-पदजी’ मॉडल पर आधारित ये बीज बैंक किसी व्यापारिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि जैव-विविधता और पोषण की सुरक्षा के लिए काम करते हैं।

झाबुआ और बस्तर के वनांचलों में जहां बाजारी ‘संकर’ (हाइब्रिड) फसलें जलवायु परिवर्तन और सूखे के सामने दम तोड़ देती हैं, वहीं हमारे पारंपरिक देशी बीज (कोदों, कुटकी, देशी मक्का) आज भी सीना ताने खड़े रहते हैं। यह सिद्ध करता है कि जलवायु संकट के इस दौर में विविधता ही हमारी असली सुरक्षा है।

आगे की राह : क्या होने चाहिए सुरक्षा कवच?

इस विधेयक को पूरी तरह खारिज करने के बजाय, सरकार को इसमें कुछ अनिवार्य ‘सुरक्षा कवच’ जोड़ने चाहिए:

  1. ‘पारंपरिक बीज’ की अचूक परिभाषा : कानून में इसकी स्पष्ट और सरल व्याख्या हो, ताकि किसी भी स्थानीय अधिकारी द्वारा छोटे किसानों या बीज बैंकों का उत्पीड़न न किया जा सके।
  2. सामुदायिक बीज बैंकों को कानूनी मान्यता : पंजीकरण का अधिकार केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे। ग्राम पंचायतों और स्थानीय किसान संगठनों को बिना किसी शुल्क के अपने पारंपरिक बीजों को प्रमाणित और संरक्षित करने का कानूनी अधिकार मिले।
  3. श्रेणीबद्ध जुर्माना व्यवस्था : लाखों रुपये के जुर्माने की तलवार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ठीक हो सकती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर अनजाने में हुई तकनीकी चूक के लिए छोटे उत्पादकों या पारंपरिक किसानों को इस भारी दंड से पूरी तरह मुक्त रखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष: यदि सरकार कृषि क्षेत्र में ‘व्यवसाय की सुगमता’ लाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले भारतीय किसानों के लिए ‘जीवन की सुगमता’  सुनिश्चित करनी होगी। विकास की परिभाषा केवल प्रयोगशालाओं के ‘डेटा पोर्टलों’ से तय नहीं हो सकती; वह खेत की जीवंत मिट्टी, थाली के पोषण और किसान की अटूट स्वायत्तता से ही तय होगी। 

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture