राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

पंजाब-हरियाणा के 2,550 किसानों को मृदा कार्बन क्रेडिट से ₹2.9 करोड़ का भुगतान, टिकाऊ खेती के लिए मिला प्रोत्साहन

18 सितंबर 2026, नई दिल्ली: पंजाब-हरियाणा के 2,550 किसानों को मृदा कार्बन क्रेडिट से ₹2.9 करोड़ का भुगतान, टिकाऊ खेती के लिए मिला प्रोत्साहन – भारत में कृषि कार्बन बाजार अब नीतिगत स्तर से खेतों तक पहुंच रहा है। पंजाब और हरियाणा के 2,550 छोटे किसानों को पुनर्योजी खेती के तरीकों को अपनाने के लिए मृदा कार्बन क्रेडिट से जुड़े भुगतान किए जाएंगे। लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) में आयोजित कार्यक्रम में इस भुगतान की शुरुआत की गई। कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने 2,550 किसानों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की शुरुआत की।

2019 में शुरू हुआ था कार्बन कार्यक्रम

यह भुगतान ग्रो इंडिगो के कार्बन कार्यक्रम ‘आदि’ का हिस्सा है। इसे 2019 में ICAR की तकनीकी मदद से शुरू किया गया था। कार्यक्रम के तहत 2019 से 2022 के बीच किसानों ने डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR), कम जुताई और फसल अवशेष प्रबंधन जैसे खेती के तरीके अपनाए। कार्बन क्रेडिट जारी करने से पहले इन तरीकों से ग्रीनहाउस गैसों में कमी और मिट्टी में कार्बन की मात्रा में बढ़ोतरी को मापा गया और स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया गया। यह कार्यक्रम सात राज्यों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन और एक लाख से अधिक किसानों तक फैला है। इसके तहत Verra VM0042 तरीके के अनुसार कृषि कार्बन क्रेडिट जारी किए गए हैं।

किसानों को ₹3,000 से ₹15,000 तक मिले

किसानों को उनके खेतों से बने कार्बन क्रेडिट में हिस्सेदारी के आधार पर भुगतान किया गया। ग्रो इंडिगो ने क्रेडिट की पूरी बिक्री होने से पहले अपने फंड से डिजिटल भुगतान किया, ताकि किसानों को बिक्री से मिलने वाली रकम का इंतजार न करना पड़े। किसानों के पास दो विकल्प थे। वे सुनिश्चित शुरुआती भुगतान ले सकते थे या क्रेडिट बिकने के बाद शुद्ध कार्बन राजस्व का 75 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त कर सकते थे। शुरुआती भुगतान में करीब 30 हजार एकड़ जमीन और 50 हजार से ज्यादा कार्बन क्रेडिट शामिल थे। इसमें भाग लेने वाले किसानों को लगभग ₹3,000 से ₹15,000 तक मिले।

टिकाऊ खेती से पानी और प्रदूषण में कमी

कार्यक्रम में फसल अवशेष प्रबंधन, जल संरक्षण और मिट्टी की सेहत सुधारने वाले खेती के तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक तरीके से धान की रोपाई की तुलना में DSR में सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है। वहीं, फसल अवशेषों के बेहतर प्रबंधन से पराली जलाने और उससे होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है। 2019 से 2022 के दौरान कार्यक्रम में शामिल खेतों के लिए अनुमान है कि 45 अरब लीटर पानी की बचत हुई और दो लाख टन से अधिक फसल अवशेषों को जलने से बचाया गया। इससे अनुमानित 1,000 टन PM2.5 उत्सर्जन को रोका जा सका।

ICAR ने दी वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञता

ICAR के संस्थानों ने ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग, क्रॉप-सिमुलेशन मॉडलिंग, मिट्टी के नमूने लेने, उपकरणों के वैलिडेशन, फील्ड टीम के प्रशिक्षण तथा सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता दी। ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली ने इन प्रक्रियाओं में योगदान दिया है। वहीं, ग्रो इंडिगो पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देने के लिए ICAR-एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ATARI), जोन-1 के साथ भी काम कर रहा है।

खेतों में टिकाऊ तरीकों को बढ़ावा

पुनर्योजी कृषि के तहत फसल अवशेषों को खेत में ही रखना, मिट्टी को कम से कम छेड़ना, DSR के जरिए धान की बुवाई, अलग-अलग फसलें उगाना, मिट्टी की सेहत सुधारना और पानी का सही इस्तेमाल जैसे तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पहल को ICAR, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और राज्य संस्थानों का समर्थन प्राप्त है। DARE के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि यह पहल दिखाती है कि वैज्ञानिक मूल्यांकन और जांच-पड़ताल पर आधारित जलवायु-स्मार्ट खेती के तरीके छोटे किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा कर सकते हैं। साथ ही, इससे जल संरक्षण और हवा की गुणवत्ता में सुधार में भी योगदान मिल सकता है।

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में कमी

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में धान की कटाई के मौसम के दौरान पंजाब में खेतों में आग लगने की 5,114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह निगरानी शुरू होने के बाद सबसे कम संख्या रही। 2021 की तुलना में इसमें 93 प्रतिशत और 2022 की तुलना में 90 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। मोगा के रानसिंह कलां मॉडल में भी फसल अवशेष प्रबंधन के प्रयास देखने को मिले हैं। गांव ने लगातार छह वर्षों तक 1,310 एकड़ जमीन पर फसल अवशेष नहीं जलाने का रिकॉर्ड बनाए रखा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ा सहयोग

जून 2026 में इंदौर में भारत की अध्यक्षता में हुई 16वीं BRICS कृषि मंत्रियों की बैठक में जलवायु सहनशीलता और उत्पादकता के लिए कृषि-पारिस्थितिकी और पुनर्योजी कृषि पर BRICS नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस बनाने पर सहमति बनी। इसकी शुरुआती देखरेख ICAR-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मिंग सिस्टम रिसर्च (IIFSR), मोदीपुरम करेगा। सितंबर 2026 में अपनाए गए BRICS नई दिल्ली घोषणापत्र में भी इस नेटवर्क के जरिए सहयोग मजबूत करने का स्वागत किया गया। लुधियाना की यह पहल किसान-केंद्रित कृषि अनुसंधान, प्रयोगशाला से खेत तक तकनीक पहुंचाने और टिकाऊ कृषि तरीकों को बड़े स्तर पर अपनाने से जुड़ी है। मृदा कार्बन के लिए किया गया भुगतान वैज्ञानिक रूप से मापे गए पर्यावरणीय परिणामों को किसानों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन से जोड़ने की दिशा में एक पहल है।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture