जलजमाव और क्षारीय भूमि अब सुधरेगी! जैन इरिगेशन की तकनीक आखिर क्या है?
27 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: जलजमाव और क्षारीय भूमि अब सुधरेगी! जैन इरिगेशन की तकनीक आखिर क्या है? – देश में हुई पहली हरित क्रांति ने खाद्यान्न की कमी को दूर किया। लेकिन आज के समय में खेती के लिए पानी और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, बदलता मौसम, प्राकृतिक नालों का समतलीकरण, पगडंडियों/सड़कों का निर्माण आदि के कारण जमीन में पानी की निकासी की समस्या उत्पन्न हो गई है। जमीनें क्षारीय (Saline) हो गई हैं। कई स्थानों पर पानी भरने के कारण फसलों की जड़ों को जरूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है। पोषक तत्वों की उपलब्धता नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है। जमीनें बंजर हो रही हैं। इससे किसान संकट में आ गए हैं और उनकी खेती का गणित बिगड़ गया है। बढ़ती जनसंख्या के लिए आवश्यक गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न की आपूर्ति के साथ-साथ भूमि की उर्वरता बढ़ाने और किसानों के आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए ऐसी भूमि को खेती के योग्य बनाना आवश्यक है। इसके लिए एक अत्याधुनिक और टिकाऊ समाधान के रूप में जैन इरिगेशन सिस्टम्स लिमिटेड ने “जैन ड्रेनवेल-भूमिगत छिद्रित पाइप जल निकासी प्रणाली” विकसित की है। इसमें PE डबल वॉल नालीदार (DWC) और सिंगल वॉल नालीदार (SWC) छिद्रित पाइपों का उपयोग किया जा रहा है। यह प्रणाली जमीन से अतिरिक्त पानी और घुलनशील लवणों का प्रभावी ढंग से निष्कासन करके भूमि की उर्वरता में सुधार करती है और फसलों की उत्पादन क्षमता बढ़ाती है।

यह प्रणाली आखिर काम कैसे करती है
अंतरराष्ट्रीय स्तर के जैन डबल वॉल कोरुगेटेड (DWC) और सिंगल वॉल कोरुगेटेड (SWC) छिद्रित पाइप HDPE (हाई-डेंसिटी पॉलिथीन) सामग्री से बनाए जाते हैं और इन पाइपों के छिद्र तकनीकी मानदंडों के अनुसार डिजाइन किए गए हैं। यह एक अत्यंत मजबूत, लचीला और टिकाऊ थर्मोप्लास्टिक पाइप है। पाइप के लचीले होने के कारण वे जमीन की हलचल या दबाव के नीचे भी अत्यंत मजबूती से काम करते हैं। यह पाइप खारे पानी में या खेत की मिट्टी में रासायनिक घटकों के संपर्क में आने पर भी खराब नहीं होता है। PVC सिंगल वॉल कोरुगेटेड (SWC) छिद्रित पाइप की तुलना में इस पाइप की जमीन का भार सहने की क्षमता और आयु अधिक है। यह कम से कम 50 वर्षों से अधिक समय तक टिक सकता है। छिद्रित पाइप के चारों ओर एक सिंथेटिक जियोफैब्रिक स्लीव का आवरण होता है। इसके अलावा, इस प्रणाली की दक्षता और जीवनकाल बढ़ाने के लिए जियोफैब्रिक आवरण के चारों ओर मोटी रेत/छान या गिट्टी (खड़ी) का उपयोग करना आवश्यक है।
भूमिगत जल निकासी प्रणाली की संरचना और लाभ
कंपनी द्वारा मिट्टी के प्रकार, सिंचाई और फसल पद्धति, जलवायु, कंटूर सर्वेक्षण, आउटलेट की स्थिति जैसे कारकों का अध्ययन करके प्रणाली का खाका (डिजाइन) तैयार किया जाता है। इसमें पाइप का लेआउट, साइज, दो पाइपों के बीच की दूरी, पाइप की गहराई, पाइप का ढलान शामिल है। इन पाइपों को जमीन के नीचे कम से कम 3.25 से 3.5 फीट की गहराई पर स्थापित करना आवश्यक है। एक बार यह प्रणाली स्थापित हो जाने के बाद, रखरखाव का खर्च शून्य होता है। चूंकि ये पाइप जमीन के अंदर होते हैं, इसलिए जुताई या खेती के काम में कोई बाधा नहीं आती है। पाइप मजबूत होने के कारण खेती के काम के लिए जुताई हेतु ट्रैक्टर या बड़ी मशीनों का उपयोग करने पर भी पाइप को नुकसान नहीं पहुंचता है।
जल निकासी प्रणाली की तकनीक चार चरणों में काम करती है:
१) जमीन में जमा अतिरिक्त पानी और हानिकारक घुलनशील लवण मिट्टी से नीचे रिसते हैं।
२) पाइप छिद्रित होने के साथ-साथ पाइप के चारों ओर जियोफैब्रिक स्लीव होने के कारण मिट्टी के कण पाइप में नहीं जाते हैं, केवल अतिरिक्त पानी और घुलनशील लवण ही पाइप में आते हैं।
३) पाइप में ढलान दिया गया होने के कारण यह अतिरिक्त पानी छिद्रित पाइप से कलेक्टर पाइप में और फिर मुख्य पाइप की ओर तेजी से बहता है।
४) अंत में गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) द्वारा मुख्य पाइप के माध्यम से यह अतिरिक्त पानी खेत के बाहर नालों या खड्डों में छोड़ दिया जाता है। यह प्रणाली 24 घंटे चालू रहने के कारण कम समय में जमीन वाफसा (सही नमी) की स्थिति में आ जाती है और फसलों की अच्छी वृद्धि होती है।
किसानों के लिए मुख्य लाभ
१) जमीन से अतिरिक्त पानी की निकासी – भूमिगत छिद्रित पाइप जल निकासी प्रणाली के माध्यम से फसलों की जड़ों के क्षेत्र से अतिरिक्त पानी को प्रभावी ढंग से बाहर निकाल दिया जाता है।
२) जमीन से लवणों की निकासी – फसलों की जड़ों के क्षेत्र से अत्यधिक एवं हानिकारक लवणों की निकासी की जाती है, जिससे मिट्टी में रासायनिक प्रक्रिया में सुधार होता है।
३) मिट्टी की बनावट में सुधार – पानी की उचित निकासी के कारण मिट्टी की बनावट में सुधार होता है, मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे जुताई करना आसान हो जाता है और फसलों की जड़ें गहराई तक फैलती हैं। यह सूक्ष्मजीवों जीवाणुओं की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
४) नमी को नियंत्रित कर अंकुरण क्षमता बढ़ाता है – मानसून में या सिंचाई के बाद जमीन जल्दी वाफसा स्थिति में आने के कारण किसान समय पर जुताई, बुवाई और कटाई कर सकते हैं, जिससे फसलों का नुकसान टलता है।
५) वाफसा और सिंचाई क्षमता में वृद्धि करता है – जल निकासी अच्छी होने के कारण सिंचाई का पानी मिट्टी में सही मात्रा में रिस्ता है, दिया गया पानी सीधे फसलों के काम आता है। पानी की बर्बादी कम होकर सिंचाई दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
६) रोगों को रोकता है, उत्पादकता बढ़ाता है – जमीन में उचित नमी का स्तर बनाए रखने से फसलें रोगमुक्त रहती हैं, जड़ों के क्षेत्र में हवा का संचार बना रहता है, जड़ों द्वारा पोषक तत्वों का अवशोषण होता है, जिससे फसलों की वृद्धि अच्छी होती है और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
जलभराव और क्षारीय भूमि किसानों के लिए एक समस्या जरूर है, लेकिन उचित नियोजन और आधुनिक तकनीक की मदद से इसे फिर से उपजाऊ भूमि में परिवर्तित किया जा सकता है। ‘जैन ड्रेनवेल’ भूमिगत छिद्रित पाइप जल निकासी प्रणाली से जमीन में अतिरिक्त पानी और घुलनशील लवणों की प्रभावी निकासी होती है, जिससे जड़ों के क्षेत्र में हवा, नमी और पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। परिणामस्वरूप जमीन जल्दी वाफसा स्थिति में आती है, फसलों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता में सुधार होता है तथा खेती को अधिक कुशल और टिकाऊ बनाने में योगदान मिलता है। इसलिए बंजर होने की कगार पर खड़ी जलभराव और क्षारीय भूमि के लिए यह तकनीक किसानों की उत्पादकता और खेती की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।
जितेंद्र श्रीकांत झंवर, मीडिया विभाग, जैन इरिगेशन, जलगांव, M-9422774258
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