कीटनाशक पर प्रतिबंध से किसान आत्महत्याएं नहीं रुकेंगी: क्रॉपलाइफ इंडिया
26 मई 2026, नई दिल्ली: कीटनाशक पर प्रतिबंध से किसान आत्महत्याएं नहीं रुकेंगी: क्रॉपलाइफ इंडिया – तेलंगाना में लगाए गए प्रतिबंध और विषाक्तता से होने वाली मौतों को लेकर उठी चिंताओं के बाद केंद्र सरकार पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान जैसे फसल सुरक्षा उत्पादों की बिक्री की समीक्षा कर रही है। इस बीच, क्रॉपलाइफ इंडिया (CropLife India) ने कहा है कि किसान आत्महत्याओं जैसे गंभीर मुद्दे पर कोई भी निर्णय लेने से पहले उन वास्तविक कारणों को समझना जरूरी है, जो किसानों को इस स्थिति तक पहुंचाते हैं। संगठन का कहना है कि केवल किसी उत्पाद पर प्रतिबंध लगाने से समस्या की जड़ समाप्त नहीं होगी, बल्कि इससे पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे किसानों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं।
क्रॉपलाइफ इंडिया के अनुसार, उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों और शोधों में किसान आत्महत्याओं के पीछे जिन प्रमुख कारणों की पहचान की गई है, उनमें कर्ज का बोझ, फसल खराब होना, वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की कमी और फसल नुकसान के बाद ऋण चुकाने में असमर्थता प्रमुख हैं।
संगठन ने 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला दिया, जो तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में किसान आत्महत्याओं पर आधारित था और जिसे इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन में प्रकाशित किया गया था। इस अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि किसान आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण मानसिक स्वास्थ्य नहीं बल्कि आर्थिक संकट है, जिसमें कर्ज और कर्ज के जाल को सबसे बड़ा कारण बताया गया।
इसी तरह, अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण और विकास संस्थान द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में 2014-15 से 2020-21 के बीच पांच राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि वर्षा में कमी के साथ किसान आत्महत्याओं के मामले बढ़ते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्षा में 5 प्रतिशत की कमी आती है तो औसतन 810 किसान आत्महत्याएं होती हैं, जबकि 25 प्रतिशत वर्षा घाटे की स्थिति में यह संख्या बढ़कर 1,188 तक पहुंच सकती है। वहीं, जिन क्षेत्रों में रोजगार गारंटी और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाएं प्रभावी थीं, वहां फसल खराब होने के बावजूद आत्महत्या के मामले अपेक्षाकृत कम रहे।
क्रॉपलाइफ इंडिया का कहना है कि उपलब्ध प्रमाण यह स्पष्ट करते हैं कि किसान आत्महत्या एक गहरे आर्थिक संकट का परिणाम है और आवश्यक फसल सुरक्षा उत्पादों पर प्रतिबंध इस संकट को और गंभीर बना सकता है। संगठन ने यह भी कहा कि सरकार पिछले कुछ वर्षों में आय सहायता, फसल बीमा, संस्थागत ऋण और ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों के लिए सुरक्षा कवच मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।
संगठन ने यह भी रेखांकित किया कि यह मुद्दा ऐसे समय उठ रहा है जब खरीफ बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है। किसानों ने पहले ही अपनी खेती के लिए बीज, उर्वरक और अन्य इनपुट की योजना बना ली है। ऐसे में बीच सीजन में स्थापित और किफायती खरपतवार एवं कीट नियंत्रण विकल्पों में बाधा आने से खेती की लागत बढ़ सकती है और किसानों पर आर्थिक दबाव और अधिक बढ़ सकता है।
क्रॉपलाइफ इंडिया के अनुसार, खरपतवारों के कारण देश में हर साल लगभग 92,000 करोड़ रुपये की फसल उत्पादकता का नुकसान होता है। यह आंकड़ा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आने वाले डायरेक्टरेट ऑफ वीड रिसर्च और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया द्वारा 11 राज्यों के 3,200 किसानों पर किए गए अध्ययन पर आधारित है। अध्ययन के अनुसार खरीफ फसलों में खरपतवार 25-26 प्रतिशत तक और रबी फसलों में 18-25 प्रतिशत तक उपज हानि का कारण बनते हैं।
पैराक्वाट का उपयोग देश में करीब 80 लाख एकड़ क्षेत्र में किया जाता है और यह चाय, कपास, आलू, मक्का, कॉफी, रबर, बागवानी एवं प्लांटेशन फसलों में खरपतवार प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संगठन के अनुसार यह जीरो टिलेज और संरक्षण कृषि जैसी तकनीकों को भी समर्थन देता है, जिन्हें सरकार स्वयं बढ़ावा दे रही है। लगभग 300-350 रुपये प्रति एकड़ की लागत वाला यह उत्पाद छोटे और सीमांत किसानों के लिए अपेक्षाकृत किफायती माना जाता है, खासकर ऐसे समय में जब मजदूरों की कमी के कारण हाथ से निराई-गुड़ाई की लागत तेजी से बढ़ी है।
वहीं, कार्बोसल्फान को धान में गॉल मिज नियंत्रण के लिए प्रभावी विकल्पों में गिना जाता है और इसका उपयोग करीब 32 लाख एकड़ क्षेत्र में किया जाता है। संगठन का कहना है कि यदि इन उत्पादों पर प्रतिबंध लगता है तो किसानों की लागत बढ़ेगी और उत्पादन में नुकसान हो सकता है, जिससे आर्थिक संकट और गहरा सकता है।
अंकुर अग्रवाल, चेयरमैन, क्रॉपलाइफ इंडिया और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक ने कहा, “किसी भी उत्पाद पर वाद-विवाद करते समय हम किसान आत्महत्या के मूल मुद्दे से भटक रहे हैं। किसी उत्पाद को अचानक हटाने से किसान की परेशानी खत्म नहीं हो जाती। कर्ज, फसल नुकसान और भविष्य की चिंता बनी रहती है। यदि वास्तव में किसानों की जान बचानी है तो समाधान ऐसे होने चाहिए जो किसानों को सुलभ ऋण, फसलों का उचित मूल्य, प्रभावी फसल बीमा और जमीनी स्तर पर गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज एवं सुरक्षित उपयोग का प्रशिक्षण उपलब्ध करा सकें।”
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

