संरक्षित खेती

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हमारे देश में जहां आबादी एक अरब पन्द्रह करोड़ से भी अधिक है वहां 35-40 प्रतिशत जनसंख्या केवल शहरों में रह रही है तथा शहरी आबादी का यह अनुपात वर्ष 2025 तक लगभग 60 प्रतिशत तक बढऩे की उम्मीद है। प्रतिदिन गांव से शहरों की तरफ युवा रोजगार व बेहतर भविष्य की उम्मीद में हजारों की संख्या में विस्थापित हो रहे हैं। यह विस्थापन एक ओर रोजगार के विकल्प पर प्रशनचिन्ह लगा रहा है वहीं दूसरी तरफ बढ़ती शहरी जनसंख्या खाद्य आपूर्ति पर भी गंभीर दबाव बढ़ा रही है। इस शहरी आबादी में प्रति व्यक्ति कम आय वाले लोग अपनी लगभग 50 से 80 प्रतिशत तक आय भोजन उपलब्ध करने में लगा देते हैं। इस वर्ग के भोजन की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती जिनमें मुख्य पोषक तत्वों की मात्रा आवश्यकता से कहीं कम होती है।

क्यों करें संरक्षित खेती : हमारे देश में जितनी भी कृषि नीतियां बनी हैं वे मुख्यत: ग्रामीण परिस्थितियों के ही अनुकूल बनी हैं और शहरों में खाद्य आपूर्ति पूर्णतया ग्रामीण उत्पादन पर ही निर्भर है। इसमें अब काफी सुधार की आवश्यकता है। शहरी क्षेत्रों की खाद्य आपूर्ति के लिए ग्रामीण इलाकों से उन फसलों की आयात तो बिल्कुल ठीक व उचित है जो ज्यादा समय तक खराब न हो परन्तु वे खाद्य पदार्थ जो जल्दी ही खराब हो सकते हैं उनके लिए यदि शहरी क्षेत्रों को ही उनके उत्पादन हेतु उपयोग में लाया जाये तो जल्दी खराब होने वाले कृषि आधारित खाद्य पदार्थ जैसे ताजे फल, सब्जियां, फूल इत्यादि बहुत कम समय में ही उपभेक्ता के पास पहुंच जायेंगे। इससे उपभोक्ता को न सिर्फ ताजी खाद्य सामग्री ही मिलेगी बल्कि उत्पादों के दाम भी कम हो जायेंगे तथा तुड़ाई उपरान्त होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम करने में मदद मिलेगी।

परिभाषा : जब हम किसी फसल का उत्पादन मुख्य जैविक या अजैविक कारकों से बचाते हुए (सुरक्षा प्रदान करते हुए) करते हैं तो उसे संरक्षित खेती कहते हैं।
विभिन्न संरक्षित संरचनायें तथा उनका संरक्षित सब्जी उत्पादन में उपयोग : मुख्यत: सब्जी उत्पादन हेतु उचित व उपयुक्त संरक्षित संरचना की आवश्यकतता उस क्षेत्र की जलवायु पर निर्भर करती है। लेकिन इसके अतिरिक्त किसान की आर्थिक स्थिति, टिकाऊ व उच्च बाजार की उपलब्धता, बिजली की उपलब्धता, भूमि का प्रकार आदि कारण भी इसकी खेती को निर्धारित करते हैं। विभिन्न देशों में सब्जियों के बेमौसमी उत्पादन हेतु मुख्यत: वातावरण अनुकूलित ग्रीनहाउस, प्राकृतिक वायु संवाहित ग्रीन हाउस, कम लागत वाले पोली-हाउस, वाक-इन-टनल, कीट अवरोधी नेट हाउस, प्लास्टिक लो-टनल आदि को आवश्यकतानुसार वर्ष भर व मुख्यत: बेमौसमी सब्जी उत्पादन हेतु उपयोग में लिया जाता है जिनको हमारे देश के विभिन्न शहरी क्षेत्रों में अपनाने की अपार संभावनायें हैं।

अर्ध वातानुकूलित ग्रीनहाउस : यह एक ऐसा ग्रीनहाउस है जिसमें गर्मी के दिनों में ग्रीनहाउस के अन्दर तापमान को नियंत्रित करने के लिये कूलिंग पैड लगे होते हैं तथा सामान्य गर्मी के समय यह घर में उपयोगी कूलर के आधार पर ही कार्य करता है। लेकिन यह कूलिंग तब अच्छी प्रकार से कार्य करती है जब हवा में नमी कम हो (आर्द्रता 30 प्रतिशत या इससे कम हो)। इस प्रकार उत्तर भारत में मध्य अप्रैल से जून तक यह कूलिंग प्रणाली बहुत अच्छी तरह प्रभावित होती है तथा कभी-कभी इसे सितम्बर व अक्टूबर माह में भी आवश्यकतानुसार उपयोग में लाया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार दिसम्बर तथा जनवरी माह में अन्दर के तापमान को रात में गर्म करने के लिए हीटर भी लगाया जा सकता है। ग्रीनहाउस के अन्दर के तापमान को रात के समय 12 या 13 डिग्री से. ग्रे. से नीचे नहीं जाने दिया जाता है तथा फिर इसके दैनिक रखरखाव पर भी भारी खर्चा होता है क्योंकि इसे मौसम के अनुसार ठंडा या गर्म रखने में ऊर्जा की काफी खपत होती है। इससे उत्पादन लागत अत्यधिक बढ़ जाती है, जिसे वहन करना साधारण कृषकों के लिये संभव नहीं है। यह तभी संभव हो सकता है जबकि सब्जी उत्पादकों की सब्जियां बहुत ऊंचे बाजार में बहुत अधिक भाव पर बिके तथा उस क्षेत्र में बगैर रुकावट के बिजली की आपूर्ति जारी रहती हो। आमतौर पर इस प्रकार के ग्रीनहाउस में बड़े आकार का टमाटर, चेरी टमाटर, लाल व पीले रंग की शिमला मिर्च आदि फसलों को वर्ष भर के लिये उगाया जाता है तथा अधिक उत्पादन के साथ-साथ अधिक गुणवत्ता वाली सब्जियां भी पैदा की जाती हैं। टमाटर व शिमला मिर्च को ऐसे ग्रीनहाउस में उगाने हेतु उसमें लगातार कटाई-छंटाई का कार्य किया जाता है अन्यथा उपज व गुणवत्ता दोनों में ह्रास होता है। ये कृषि क्रियाएं प्रत्येक 10-15 दिनों के अंतराल पर की जाती है। टमाटर की फसल में अंदर परागक का कार्य भी नियमित रुप से किया जाता है। यद्यपि टमाटर स्वपरागित फसल है लेकिन ग्रीनहाउस में हवा का प्रवाह न हाने का कारण परागक नहीं हो पाता है। फसल में खाद व उर्वरण सिंचाई जल के साथ घोलकर पौधों को उनकी आवश्यकता व मौसम व भूमि की प्रकार के अनुसार दिये जाते हैं। टमाटर के पौधे पर कटाई-छंटाई के बाद एक प्रमुख शाखा रखी जाती है जिसको रस्सी के सहारे 8-9 फुट तक बढऩे दिया जाता है तथा फिर उसे आवश्यकतानुसार 1.0 या 1.5 फुट नीचे उतार कर रस्सी के सहारे एक दिशा में मुख्य तार के सहारे आगे बढ़ाया जाता है। इस प्रकार टमाटर को 10 से 11 महीने व शिमला मिर्च को 9 से 10 माह तक की लम्बी अवधि तक उगाया जा सकता है। बड़े टमाटर से लगभग 150-200 टन उपज तथा चेरी टमाटर से 40 से 50 टन उपज प्रति हेक्टेयर तथा शिमला मिर्च से पीले व लाल रंग वाले फल 40 से 50 टन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त किये जा सकते हैं।

फसलों की संरक्षित खेती के मुख्य लाभ

  • मुख्य जीवित व अजीवित कारकों से फसल की सुरक्षा।
  • उच्च उत्पादकता (सामान्यत: खुले खेतों से 5-10 गुणा अधिक)।
  • उच्च गुणवत्ता प्राप्त करना सम्भव जो खुले वातावरण में फसलें उगाकर प्राप्त करना असंभव।
  • लम्बी अवधि तक सब्जियों की लगातार उपलब्धता।
  • अधिक लाभ के लिए बेमौसमी फसल उत्पादन की पूर्ण सम्भावना।
  • प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जल व भूमि आदि) का सदुपयोग पूर्णत: संभव।

प्राकृतिक वायु संवाहित ग्रीनहाउस : इस प्रकार के ग्रीनहाउस या संरक्षित संरचनाओं को बनाने पर सामान्यत: वातानुकूलित ग्रीनहाउस के मुकाबले एक तिहाई या एक चौथाई से भी कम लागत आती है तथा इस प्रकार के ग्रीनहाउस को चलाने हेतु या तो ऊर्जा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है या केवल हवा को बाहर निकालने वाले पंखों को चलाने हेतु बहुत कम ऊर्जा की जरुरत पड़ती है। सामान्य रुप से इस प्रकार का अच्छा व उपयुक्त ग्रीनहाउस बनवाने पर 600 से 650 रुपये प्रति वर्गमीटर के हिसाब से खर्चा होता है। इस प्रकार के ग्रीनहाउस में टमाटर की फसल को 8 से 9 माह तक सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। शिमला मिर्च को भी 8 से 8) माह तक उगाया जा सकता है। जबकि उच्च गुणवत्ता वाले बीज रहित खीरे की फसल को वर्ष में तीन बार उगाया जा सकता है। खीरे की पहली फसल की रोपाई अगस्त के प्रथम सप्ताह में तथा दूसरी फसल की रोपाई मध्य अक्टूबर से अक्टूबर के तृतीय सप्ताह तक तथा तीसरी फसल की रोपाई फरवरी प्रथम सप्ताह में की जा सकती है तथा इस प्रकार 9 से 9) महीने में लगातार तीन फसलें सम्भव है। इसके अतिरिक्त इसमें बेमौसमी शिमला मिर्च, खरबूजा व अन्य बेल वाली सब्जियों को भी सरलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इस प्रकार के ग्रीनहाउस पर उत्पादन लागत कम आने के कारण उत्पादक फसल की कम अवधि होने के बावजूद अधिक लाभ कमा सकते हैं। इस प्रकार के ग्रीहाउस ऐसे शहरी क्षेत्रों जैसे पूना, बैंगलौर आदि के लिये अत्यधिक उपयुक्त है क्योंकि जलवायु अनुकूल होने के कारण यहां गर्मी में न तो ग्रीनहाउस को ठण्डा करने की तथा न ही सर्दी में गर्म करने की आवश्यकता होती है। अत: इस प्रकार की संरक्षित संरचनाएं इन क्षेत्रों के लिये अत्यन्त उपयुक्त है, जहां इन्हें फसल उत्पादन हेतु ठण्डा या गर्म करने की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार के ग्रीनहाउस के रखरखाव में भी ज्यादा खर्चा व कठिनाई नहीं होती है। इस प्रकार के ग्रीनहाउस अन्य क्षेत्रों जहां बिजली वितरण की काफी कमी है, के लिये भी बहुत उपयुक्त सिद्ध हो सकते हैं।
(क्रमश:)

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