टमाटर को रोगों से बचायें

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1 फरवरी 2021, भोपाल, टमाटर को रोगों से बचायें- सब्जियों में टमाटर के उत्पादन में कमी का एक प्रमुख कारण फसल पर रोग और सूत्रकृमियों का अधिक प्रकोप होना है। टमाटर के मुलायम तथा कोमल होने की वजह से और इसकी खेती के दौरान वातावरण में उच्च नमी एवं अत्यधिक उर्वरकों आदि का प्रयोग होने के कारण भी इस फसल पर रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जिसके कारण उत्पादन में 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है> बेमौसमी संकर किस्मों का उपयोग नाशीजीवों के परिदृश्य में केवल बदलाव ही नहीं लाते हैं, अपितु इसके परिणाम स्वरूप बीमारियों एवं सूत्र कृमियों को प्रचुर मात्रा में लगातार भोजन मिलता रहता है। जिससे इनकी उपस्थिति चिरस्थाई बनी रहने के साथ-साथ अधिक तेजी से बढ़ती है।
आर्द्र गलन- शुरूआत में बीमारी के लक्षण कुछ जगहों में दिखाई पड़ते हैं और 2 से 3 दिनों में पूरी नर्सरी में फैल जाते हैं। नर्सरी भूरे और सूखे धब्बों के साथ पीली-हरी दिखाई पड़ती है। पौधे अचानक ही सूख जाते हैं तथा जमीन पर गिर कर सड़ जाते हैं।

अगेती झुलसा- इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों के किनारे के भाग पर नियमित त्रिकोणीय धब्बे दिखाई देते हैं। इन धब्बों के बढऩे के साथ ही पत्तियाँ गिर जाती हैं। यह रोग पौधे के सभी भागों में लग सकता है।

पिछेती झुलसा– टमाटर की फसल में यह रोग पौधे की किसी भी अवस्था में लग सकता है। पौधे के किसी भी भाग पर भूरे बैंगनी या काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है। वातावरण में लगातार नमी रहने पर इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। फलों के डंठल भी ग्रसित हो कर काले रंग के हो जाते हैं।
सनस्काल्ड- ग्रीष्म व सूखे मौसम में टमाटर के फलों का अचानक ही सीधी सूर्य की किरणों के सम्पर्क में आना सनस्काल्ड का कारण हो सकता है। फलों पर सूर्य की किरणों के सीधे सम्पर्क में आने वाले भाग की तरफ सफेद या पीले धब्बे प्रकट हो जाते हैं।

पर्ण कुंचन- यह बीमारी सफेद मक्खी कीट द्वारा फैलाई जाती है। ग्रसित पौधों में पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और फूल व फल छोटे तथा कम संख्या में लगते हैं। इस रोग से ग्रसित पौधों में टहनियों का आकार छोटा होने से पौधे भी छोटे हो जाते हैं। पुरानी पत्तियों के किनारे मोटे और अन्दर की ओर मुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं।
चक्षु सडऩ रोग- यह रोग टमाटर के कच्चे फलों में पहले दिखता है। फलों पर पहले छोटे काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं, जो कि धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं। इस रोग का एक मुख्य लक्षण है, कि फल के ग्रसित भाग के चारों ओर गोल-गोल हल्की भूरी रंग की वलय बन जाती है।

नर्सरी के दौरान

  • अच्छी जल निकासी और जड़ सडऩ रोग से बचाव के लिए हमेशा जमीन से 10 से 15 सेंटीमीटर ऊँची क्यारी बनाकर ही नर्सरी की बुवाई करें।
  • नर्सरी की बुआई से पहले मिट्टी को 0.45 मिलीमीटर मोटी पॉलीथिन शीट से ढककर मिट्टी का सौर्यीकरण करें। ऐसा करने से मिट्टी जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे।
  • नर्सरी के दौरान रोगों के नियंत्रण के लिए सक्षम ट्राइकोडर्मा स्ट्रेन की 50 ग्राम मात्रा को गोबर की सड़ी हुई बारीक खाद में अच्छी प्रकार मिलाकर चार वर्ग मीटर क्यारी की मिट्टी में मिला दें।
  • प्रचलित संकर किस्मों के बीजों का शोधन सक्षम ट्राइकोडर्मा स्ट्रेन 9 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या स्यूडोमोनॉस इनफलोरेसेस 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार करें।
  • द्र्कुंचन के प्रबंधन के लिए 0.40 मिलीमीटर मोटी नायलोन जाली का इस्तेमाल करें।
  • मुख्य फसल के दौरान
  • टमाटर की प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद गेंदे की एक पंक्ति फसल प्रपंच के रूप में उगायें। सुंडी अण्डे देने के लिए गेंदे के फूलों की तरफ आकर्षित होती है।
  • बीमारियों के फैलाव से बचाव के लिए टमाटर की किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60&45 सेंटीमीटर और संकर किस्मों के लिए 90&60 सेंटीमीटर की दूरी रखें।
  • सूत्रकृमियों के प्रकोप को कम करने के लिए 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नीम की खली भूमि में मिलाएं।
  • टमाटर की फसल में परजीवी पक्षियों के बैठने के लिए 10 स्टैण्ड प्रति एकड़ के अनुसार खेत में लगाएं।
  • टमाटर की पौध रोपने के 15 दिनों बाद सफेद मक्खी के प्रबंधन के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 35 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हे. की दर से छिड़कें।
  • टमाटर की फसल में नीम के बीज का अर्क 5 प्रतिशत की दर से छिड़काव करने से भी सफेद मक्खी का नियंत्रण किया जा सके।
  • फल बेधक की निगरानी हेतु खेत में गन्ध पाश 5 प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगाएं और 15 से 20 दिन के अंतराल पर इनके ल्यूर को बदलते रहें, फल बेधक के अण्डों के लिए पौधे के शीर्ष के तीन प्रणों की निगरानी करें।
  • अण्डे का परजीवी ट्राईकोग्रामा कीलोनिस को एक लाख प्रति हेक्टेयर की दर से एक सप्ताह के अंतराल पर पौधों पर फूल आरम्भ होने की अवस्था में 4 से 5 बार छोड़ें।
  • द्य टमाटर की पौध रोपने के 25, 35 व 45 दिनों बाद एच ए एन पी वी (1& 109 पीओबी/एमएल) 1500 एमएल प्रति हेक्टेयर की दर से फल बेधक के प्रबंध के लिए सांयकाल छिड़काव करें।
  • फल बेधक ग्रसित फलों को इक_ा करके नष्ट कर दें। फल बेधक का प्रकोप आर्थिक हानि स्तर 5 प्रतिशत से अधिक होने पर क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल 18.5 प्रतिशत एस सी 30 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • टमाटर की फसल में पर्णकुंचन तथा उकठा रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें।
  • अगेती व पिछेती झुलसा के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 1.25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सुरक्षात्मक छिड़कें।
  • आवश्यकतानुसार एजोक्सीस्ट्रोबीन 23 प्रतिशत एस सी 125 सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर या एजोक्सीस्ट्रोबीन+ डाईफेनकोनाजोल 0.03 प्रतिशत की दर से अगेती व पछेती झुलसा के लिए छिड़काव करें।
  • अगेती झुलसा रोग के नियंत्रण के लिए आवश्यकतानुसार पाईराक्लोस्ट्रोबीन 20 डब्ल्यू जी 75 से 100 ग्राम सक्रिय तत्व, मेटीरेम 55+पाईराक्लोस्ट्रोबीन 5 डब्ल्यू जी 1500 से 1750 प्रति हेक्टेयर या टेबूकूनाजोल 50+ट्राईफ्लोक्सीस्ट्रोबीन 25 डब्ल्यू जी 350 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • द्य पिछेती झुलसा रोग के नियंत्रण हेतु आवश्यकतानुसार मन्डीप्रोपानीड 23.4 एस सी 0.02 प्रतिशत सक्रिय तत्व की दर से या साईमॉक्सिनिल 8 का 1500 ग्राम/हेक्टेयर की दर से छिड़कें।
  • चक्षु सडऩ रोग के लिए डंडे लगाकर पौधों को सहारा दें तथा आवश्यकतानुसार प्रोपीनेब 70 डब्ल्यू पी 0.21 प्रतिशत सक्रिय तत्व का छिड़काव करें।
  • टमाटर की फसल में बैक्टीरियल धब्बे के लिए स्ट्रेप्टोसाईक्लीन 40 से 100 पीपीएम की दर से क्यारी में व रोपाई के बाद छिड़काव करें।

नाशीजीव अवरोधी किस्में

फल बेधक- अविनाश- 2, अविनाश- 3 अवरोधी किस्में है
बैक्टीरियल सूखा– अर्का आभा, अर्को आलोक, शक्ति, अभिजीत, अर्को श्रेष्ठ अवरोधी किस्में है
पर्ण कुंचन- परभणी यशीरी, एच- 24 अवरोधी किस्में है
मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि– हिसार अनमोल, एस एल- 120, पूसा हाईब्रिड- 2 अवरोधी किस्में है
चूर्णिल आसिता- अर्का आशीष अवरोधी किस्म है
अगेती झुलसा-देवगिरी अवरोधी किस्म है
फ्यूजेरियम म्लानि-पंत बहार अवरोधी किस्म है।

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