लेमन ग्रास की खेती

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें

लेमन ग्रास अथवा नींबू घास का महत्व उसकी सुगंधित पत्तियों के कारण है। पत्तियों से वाष्प आसवन के द्वारा तेल प्राप्त होता है। जिसका उपयोग कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, कीटनाशक एवं दवाओं में होता है। इस तेल का मुख्य घटक सिट्राल (80-60) प्रतिशत होता है।
जलवायु: नींबू घास उष्ण एवं उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में सुचारू रूप से होती है। समान रूप से वितरीत 250 से 300 मिमी वर्षा इसके लिए उपयुक्त होती है। परन्तु वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अतपकीप अच्छी होती है। यह प्रमुख रूप से वर्षा पर आधारित असिंचित दशा में उगाई जाती है।
भूमि: यह घास सभी प्रकार की मृदा में होती है। परन्तु जल लग्नता यह सहन नहीं कर सकती है। अत: अच्छे जल निकास वाली भूमि का चयन करना आवश्यक होता है। दोमट मृदा इसकी खेती के लिए बहुत उपयोगी होती है। ढालान वाले क्षेत्रों जहां पर मृदाक्षरण अधिक होता है। वहां पर इसकी रोपाई करने से मृदाक्षरण रूक जाता है। यह 6.5 पीएच तक उगाई जा सकती है। यह पहाड़ों की ढलानों के बंजर क्षेत्र में उगाई जा सकती है। जहां पर अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हंै।
उन्नत किस्में: सिमेप लखनऊ के द्वारा प्रगति व प्रमान दो किस्में विकसित तथा ओ.डी-16, ओडक्कली अरनाकुलम केरल विकसित की है।
बीज की मात्रा: एक हेक्टर में रोपाई करने हेतु नर्सरी (पौध) तैयार करने हेतु सीमेप की अनुशंसा के आधार पर 4 से 5 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। नर्सरी में पौध तैयार कर रोपाई की जाती है।
नर्सरी तैयार करना: अच्छी फसल के लिए एक अच्छी तरह तैयार नर्सरी में इसे बोया जाता है। मानसून की शुरुआत में अप्रैल-मई में लेमन ग्रास की नर्सरी तैयार की जाती है। क्यारियां तैयार करके बीज बोना चाहिए। और मिट्टी की एक पतली परत के साथ कवर किया जाता है 10 किलोग्राम के लिए प्रति हेक्टेयर सीडिं्लग्स प्लांटिंग के लिए पर्याप्त है। बीज 5-6 दिनों में उत्पन्न हो जाता है और जब बीज 60 दिन पुरानी हो जाती है तब रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। 60 दिन तक नर्सरी में तैयार करके रोपाई करते हंै।
रोपाई समय: जुलाई के प्रथम सप्ताह में रोपाई करें। सिंचित दशा में रोपाई फरवरी मार्च में करें।
रोपाई की दूरी व विधि: कतारों में 50 से अंतर 75 सेन्टीमीटर का अंतर तथा 30 से 40 सेन्टीमीटर पौधे के बीच अंतर रखें। 5 से 8 सेन्टीमीटर गहराई तक रोपे तथा अच्छी तरह दबाएं। अधिक गहराई पर लगने से जड़े सड़ जाती है। रोपने के तुरन्त बाद वर्षा न हो तो सिंचाई करें।
निंदाई: निराई और गुड़ाई बहुत महत्वपूर्ण है इससे उपज और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। प्रारंभिक अवस्था में यदि खरपतवार हो तो निंदाई करना आवश्यक होता है। आमतौर पर एक वर्ष में दो से तीन निराई-गुड़ाई करना आवश्यक हैं।
सिंचाई: इस को सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। परन्तु अधिक उत्पादन लेने के लिए शुष्क ऋतुओं में सिंचाई करना आवश्यक है। प्रत्येक कटाई के बाद एक सिंचाई अवश्य करें। फसल को सतह से 10 से 15 सेंटीमीटर ऊपर काटा जाता है। ग्रीष्म काल में 15 दिन के अंतर से सिंचाई करें।
उर्वरक: लेमन ग्रास को कीट और रोग संक्रमण प्रभावित पाया गया है। यह सफेद रंग का होता है और उसके शरीर पर काले धब्बे हैं। यह स्टेम में उबाऊ और शूट पर खिले लेमन ग्रास पर हमला करता है। हमले का पहला लक्षण है मुख्य पत्तियों का सूखना, इसके बाद पूरा शूट मर जाता है। यह घास उपज में एक महत्वपूर्ण कमी के परिणामस्वरूप होता है। गंभीर गम्भीर के मामले में नीम का काढ़ा गौमूत्र के साथ मिलाकर छिड़काव किया जाता हैं। इसकी फसल उर्वरक के बिना भी ली जा सकती है। परन्तु अधिक लाभ लेने हेतु इसमें पोटाश की संपूर्ण मात्रा देना आवश्यक है। रोपण के पहले खेत तैयार करते समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की संपूर्ण मात्रा देना चाहिए। इसे एक बार पहली कटाई के लगभग 1 माह पहले तथा दूसरी कटाई के बाद दिया जाता हैं।
कटाई: पहली कटाई 3 महीने बाद की जाती है। इसके बाद 2 से ढाई माह में कटाई की जाती है। मृदा के उपजाऊपन तथा उर्वरक की मात्रा के आधार पर कटाई की संख्या बढ़ जाती है। उसके बाद में प्रत्येक वर्ष में 4 कटाई की जाती है, जो 5 वर्षो तक की जाती है। असिंचित दशा में ग्रीष्मकाल में कटाई नहीं ली जा सकती है।
उपज: हरी घास का उपयोग तेल निकालने में होता है। पत्ती तना व पुष्प क्रम में तेल पाया जाता है। अत: पूरा ऊपरी भाग आसवन के लिए उपयोगी होता है। लगभग 10 से 25 टन प्रति हेक्टेयर हरीघास पैदा होती है। जिससे 60 से 80 किलो मिलता है। घास के ताजा वजन के आधार पर 0.35त्न तेल उपलब्ध होता है।

लेमन ग्रास (नींबू घास) भारतीय घरों में उगाई जाती है। इसे लेमन ग्रास/चायना ग्रास/भारतीय नींबू घास/मालाबार घास, कोचीन घास भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम सिम्बेपोगोन फ्लक्सुओसस है। यह मूल रूप से भारत तथा अन्य गरम देशों का पौधा है। यह लगातार उगने वाला और हमेशा हरा रहने वाला पौधा है। लेमन ग्रास को दक्षिण-पूर्व एशिया के बाहर कोई नहीं जनता था, लेकिन आज विश्व के कई हिस्सों में इसे उगाया जाता है। कुछ इसे हर्ब कहते हैं और कुछ लोग ग्रास (घास) कहते हैं। इसकी पत्तियां चाय में डालने हेतु उपयोग में लेते हैं। पत्तियों में एक मधुर तीक्ष्ण गंध होती है जो चाय में डालकर उबलकर पीने से ताजगी के साथ साथ सर्दी से भी राहत देती है। इसकी खेती केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान राज्यों में हो रही है।

लेमनग्रास खेती से लाभ

  • औषधीय पौधों की खेती कम जगह होने के कारण बाजार में इनकी कीमत अधिक है। लाभ अधिक होता है।
  • जिन किसानों के पास कम जमीन है वह औषधीय फसलों की खेती करके अन्य फसलों की खेती के तुलना मे अधिक लाभ कमा सकते है।
  • औषधीय पौधों में खरपतवार एवं कीटों का प्रकोप कम रहता है।
  • इससे कम से कम पांच साल तक मुनाफा लिया जा सकता है।
  • इसे देखरेख की जरूरत कम होती है, जिसके कारण कम लागत आती है।
व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

8 − 5 =

Open chat
1
आपको यह खबर अपने किसान मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। ऊपर दिए गए 'शेयर' बटन पर क्लिक करें।