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किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)राज्य कृषि समाचार (State News)

सफलता की कहानी: धान छोड़कर मखाना की खेती से दरभंगा के किसान को मिला मुनाफा

26 अक्टूबर 2026, दरभंगा: सफलता की कहानी: धान छोड़कर मखाना की खेती से दरभंगा के किसान को मिला मुनाफा – मिथिला क्षेत्र के जलजमाव वाले खेतों में अब पानी की वही समस्या किसानों के लिए कमाई का जरिया बन रही है। दरभंगा के प्रगतिशील किसान प्रदीप कुमार ऐसे ही कुछ किसानों में शामिल हैं, जो धान जैसी परंपरागत फसल छोड़कर मखाने की खेती से अच्छी आमदनी कमा रहे हैं।

मिथिला मखाना को भौगोलिक संकेत यानी GI टैग मिलने और हाल में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के गठन के बाद इस फसल की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है। दरभंगा के साथ-साथ पड़ोसी मधुबनी जिले में भी जलजमाव वाली जमीन पर बड़े पैमाने पर मखाने की खेती होती है, जहां धान या दूसरी फसलें लगाना मुश्किल होता है।

प्रदीप कुमार के मुताबिक मखाने की खेती में बीज, मजदूरी और देखभाल मिलाकर प्रति बीघा करीब 50 हजार रुपये की लागत आती है। अगर बाजार में सही दाम मिल जाए तो प्रति बीघा शुद्ध मुनाफा डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच सकता है, जो धान की खेती के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।

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प्रोसेसिंग से बढ़ी कमाई

मखाने की खेती में सबसे ज्यादा मुनाफा तब होता है जब किसान कच्चे बीज को खुद प्रोसेस करके बेचें। कच्चे बीज को भूनकर और फिर हल्के दबाव से फोड़कर लावा यानी पॉप्ड मखाना तैयार किया जाता है, जिसे सीधे बाजार या व्यापारियों को बेचने पर किसानों की कमाई कई गुना बढ़ जाती है।

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पहले किसानों को मखाने के बीज 150 से 200 रुपये प्रति किलो के भाव पर भी खरीदार मिलना मुश्किल होता था, क्योंकि इसके लिए संगठित बाजार या प्रोसेसिंग यूनिट सीमित थे। अब GI टैग और सरकारी ध्यान बढ़ने के बाद मखाना किसानों को पहले से बेहतर दाम मिल रहे हैं, और बड़े शहरों के अलावा विदेशों में भी मखाने की मांग बढ़ने की खबरें आती रही हैं।

मिथिला के कई किसान धान जैसी परंपरागत फसलों की तुलना में मखाने को ज्यादा फायदे का सौदा मानने लगे हैं, खासकर उन खेतों में जहां पानी निकलना मुश्किल होता है और धान की पैदावार भी अनिश्चित रहती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मखाना किसानों को प्रोसेसिंग और भंडारण की सुविधाएं और बेहतर तरीके से मिलें, तो यह फसल मिथिला क्षेत्र के लाखों छोटे किसानों की आमदनी बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

GI टैग के बाद बदली तस्वीर

मखाने की खेती परंपरागत रूप से मेहनत और जोखिम वाला काम माना जाता रहा है, क्योंकि इसमें तालाब जैसी जमीन में घंटों पानी में उतरकर बीज बोने और फसल काटने का काम होता है। इसके बावजूद सही बाजार और दाम न मिलने की वजह से लंबे समय तक मिथिला के किसान इस फसल से पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे थे।

GI टैग मिलने के बाद मिथिला मखाने की एक अलग पहचान बनी है, जिससे बड़े शहरों के खुदरा बाजार और सुपरमार्केट में भी इसकी मांग बढ़ी है। किसानों का कहना है कि अब व्यापारी खुद खेतों तक पहुंचकर मखाना खरीदने लगे हैं, जिससे बिचौलियों पर उनकी निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के गठन के बाद क्षेत्र के किसानों को उम्मीद है कि आने वाले समय में तालाब निर्माण, बीज की उन्नत किस्मों और प्रोसेसिंग मशीनों पर भी सरकारी मदद मिलेगी। प्रदीप कुमार जैसे किसानों का कहना है कि अगर छोटे किसानों को भी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने में सहायता मिल जाए, तो वे कच्चा माल बेचने के बजाय तैयार लावा मखाना बेचकर कहीं ज्यादा कमा सकते हैं।

दरभंगा और मधुबनी के आसपास के कई युवा किसान भी अब शहरों में नौकरी के बजाय पुश्तैनी जलजमाव वाली जमीन पर मखाने की खेती को तरजीह देने लगे हैं। उनका कहना है कि अगर सही तरीके से खेती और प्रोसेसिंग की जाए, तो यह फसल साल भर में एक बार ही मेहनत करने पर भी लंबे समय तक अच्छी आमदनी दे सकती है।

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