जैविक और ऋषि खेती के प्रबल समर्थक थे सुदर्शन जी

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18 जून प. पू. कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन जी की जयंती पर

  • कमल पटेल. मंत्री
    किसान कल्याण एवं कृषि विकास
    मप्र शासन

8 जुलाई 2021, भोपाल ।  जैविक और ऋषि खेती के प्रबल समर्थक थे सुदर्शन जी – 18 जून को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवे सरसंघचालक प. पू. कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन जी का जन्मदिवस है। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश आज एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है कोरोना महामारी ने जहां हमे विकट संकट में डाल दिया है वहीं हमारे पूर्वजो के सनातन ज्ञान, जिसमे आयुर्वेद, योग और सांस्कृतिक जीवन मूल्य थे उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण ना सिर्फ बदल रहा है अपितु हमारा समाज उन मूल्यों को पहचान रहा है बल्कि उसे पूरी श्रद्धा के साथ अंगीकार भी कर रहा है। श्रद्धेय सुदर्शन जी इसी सनातन ऋषि परम्पराओं से आते है, जिसके लिए उन्होंने अपना सारा जीवन होम कर दिया, हम यदि बात करें जीवनशैली की, यदि हम बात करें हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक मूल्यों की तो पाते है कि की वो कभी अप्रासंगिक हुए ही नही थे। प. पू. सुदर्शन जी ने इन्ही सांस्कृतिक मूल्यों को ना सिर्फ सहेजने का कार्य किया अपितु उन्हें व्यवहारिक धरातल पर सिद्ध भी किया और अनुकरणीय बनाने के लिए हर संभव प्रयास भी किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भोपाल स्थित समिधा कार्यालय की छत पर उन्होंने सब्जियों के उत्पादन के लिए जो प्रयोग किये वो इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। श्रद्धेय सुदर्शन जी ने इसके अलावा ग्राम बजवाड़ा नेमावर में सचदे परिवार के द्वारा की जा रही ऋषि खेती को बहुत निकट जा कर ना सिर्फ देखा बल्कि सैकड़ो लोगो को इसके बारे में पूरे मनोयोग से बताया और वहां जा कर उसे देखने, सीखने की प्रेरणा भी देते रहे।

प.पू. सुदर्शनजी देश भर में कही भी कोई नई खोज या अविष्कार होता तो उसकी पूरी जानकारी रखते थे, प्रोत्साहन देते थे। प.पू सुदर्शन जी का स्पष्ट मानना था कि हमारे ऋषि मुनियों ने गौ आधारित कृषि की संकल्पना की थी, हमारे ऋषियों को अतिसूक्ष्म जीवो के बारे में बहुत पहले से पता था। भगवान कृष्ण के बृज क्षेत्र में बाबा नंद के पास सात लाख गाये थी, जिनके गोबर से खाद , और गोमूत्र से कई प्रकार की औषधि का निर्माण किया जाता था। खेती के लिए पुष्ट बैल और गौ माता से दूध मिलता था। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत का खेतिहर वर्ग पशुपालन के साथ सीधा जुड़ा हुआ था। संभवत: यही कारण रहा होगा जिसके कारण सुदर्शन जी ने जैविक खेती को ऋषि खेती का नाम दिया होगा, हालांकि जैविक खेती और ऋषि खेती में अंतर हो सकता है किंतु इसका भाव कही न कही समरस हो जाता है। ऋषि और जैविक खेती में सहजीविता अपने उच्चतम आदर्शों पर स्थापित होती है इसमें सूक्ष्म कीटो से लेकर अति सूक्ष्म (बैक्टेरिया) तक के लिए इस व्यवस्था में सहजीवन का स्थान है। ऋषि खेतु, प्रकृति, विज्ञान, आध्यात्म एवम अहिंसा पर आधारित शाश्वत कृषि पद्धति है। ऋषि कृषि के सिद्धान्त से आपको बिना रसायनिक खाद, गोबर खाद, जैविक खाद, केंचुआ खाद, जहरीले कीटनाशक, खरपतवारनाशक, फफूंदनाशक के उत्तम कवालिटी की फसल प्राप्त होती है। केवल एक देसी गाय की सहायता से आप ऋषि खेती कर सकते है। आज खेती के समक्ष व्यावसायिक उत्पादन की चुनौती हमारे सामने है और साथ ही मिट्टी की चिंता भी करना है। पशुबल के स्थान पर मशीनों और अन्य कृषि आदानों के बदल जाने से कृषि के मूलभूत नियोजनों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। इन्ही बदलावों के परिणाम है कि मिट्टी की उर्वरकता और उसके मूलभूत जैविक गुणों पर असर पड़ रहा है जिसे सहेजने की महती आवश्यकता है।

प.पू. सुदर्शन जी के द्वारा बताई गई बातों का यदि सार निकाला जाए तो कुछ बाते स्पष्ट हो जाती है। पहली बात उनकी रुचि को देख कर ये समझ आती है कि स्थानीय और उपयोगी अविष्कारों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। कई बार हम देखते है कि स्थानीय तौर पर ग्रामीण भारत मे लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार छोटे और उपयोगी अविष्कार कर लेते है जिन्हें पहचान कर और परिष्कृत करके मान्यता दे कर लोकप्रिय बनाया जाना चाहिये। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो प.पू. सुदर्शन जी करते थे सिंचाई के लिए जल प्रबंधन उन्होंने कई बार इसका उल्लेख भी किया और ऐसे बीज तैयार किये जाने पर बल दिया जो कम पानी की मात्रा में फसल अच्छे से तैयार कर पाए क्योंकि नदियों और भूमि जल के स्रोतों का अंधाधुंध दोहन उनकी चिंता का विषय था। मिट्टी की चिंता उनका तीसरा महत्वपूर्ण विषय था जिसमे देसी गायो की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।देसी गाय के एक ग्राम गोबर मे 300 से 500 करोड़ तक जीवाणु होते हैं । जबकि विदेसी गाय के एक ग्राम गोबर मे अस्सी लाख से भी कम जीवाणु पाये जाते हैं। देसी गाय के गोबर एवम मूत्र की महक से देसी केंचुए भूमि की सतह पर आ जाते हैं और भूमि को उपजाऊ बनाते हैं । देसी गाय के गोबर मे 16 मुख्य पोषक तत्व पाये जाते हैं। इन्ही 16 पोषक तत्वों को पौधे भूमि से लेकर अपने शरीर का निर्माण करते हैं। ये 16 तत्व देसी गाय के आंत मे निर्मित होते हैं। इसलिए देसी गाय हमारे ऋषि मुनियों के आश्रम मे निश्चित रूप से रखी जाती थी ।

हरदा जिले के बरुड़ घाट पर हमने सतपुड़ा गौ अभ्यारण की शुरुआत भी की है जिसमे 200 से भी ज्यादा ग्रामों की 2000 परित्यक्त देसी गौ वंश को शरण दी गई है। इस गौ अभ्यारण को हम एक आदर्श और उत्तम केंद्र बनाने की ओर अग्रसर है जो प.पू. सुदर्शन जी की संकल्पना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस गौ अभ्यारण में जन सहयोग से ऋषि खेती के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाएगी, गाय के गोबर से गौ काष्ठ बनाया जाएगा जिससे मुक्ति धामो में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी की बचत होगी, पर्यावरण को संरक्षण मिलेगा। छोटी जोत के वनवासी बंधुओ को ऋषि और जैविक खेती के लिए प्रोत्साहन इस गौ अभ्यारण में मिले इसका प्रयास भी हम करेंगे। मप्र के यशश्वी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में मप्र के कृषि मंत्रालय का ये प्रयास रहेगा कि इस विषय मे कोई ठोस कार्य योजना बनाई जाए जिसमे खेती के साथ मिट्टी की चिंता भी की जा सके जो मैदानी स्तर पर ना सिर्फ लागू हो सके बल्कि इसमें किसानों और अन्य वर्गों, समुदायों का सहयोग भी मिले।

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