क्या इतिहास से सबक सीखकर बन सकेगा, जलाधिकार कानून ?

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राइट टू वाटर यानि ‘जलाधिकार कानून’ के तहत मध्यप्रदेश सरकार की कोशिश है कि करीब एक करोड़ प्रदेशवासियों के घर तक नल के माध्यम से पानी पहुँचाया जाए। इसके लिए राज्य सरकार आवश्यक तैयारी कर रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश के 14510 गांवों को इस योजना में शामिल किया जाएगा। ‘राइट टू वाटर’ कानून के तहत मध्यप्रदेश सरकार की कोशिश, वास्तव मेें भारतीय संविधान के ‘अनुच्छेद-21’ में निहित अधिकार के अन्तर्गत पानी के प्रबंध करने की आवश्यकता (राष्ट्रीय जल नीति-2012) के अनुक्रम में है। यह कोशिश ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ और ‘मानवाधिकार कौंसिल’ की पेयजल को मानवाधिकार के रूप में दी गई मान्यता के भी अनुक्रम में है। जाहिर है, यह अभिनव पहल अन्य राज्यों के लिए भी अनुकरणीय है।

खबरों के मुताबिक फिलहाल मध्यप्रदेश में लगभग 15 प्रतिशत आबादी को ही नल के माध्यम से पानी मिलता है। ग्रामीण क्षेत्र की लगभग 85 प्रतिशत आबादी हैंडपम्प या कुओं से पानी लेती हैं। मौजूदा योजना इसी लगभग 85 प्रतिशत आबादी को केंद्र में रखकर तैयार की गई हैं। इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी ‘जल निगम, मध्यप्रदेश’ की है जिसने भूजल के बजाय सतही पानी पर आधारित योजना पर ध्यान केंद्रित किया है। इस योजना के लिए आसपास के नदी, तालाब और ‘जल संसाधन विभाग’ के जलाशयों से पानी लिया जावेगा। मध्यप्रदेश के ‘लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी’ (पीएचई) मंत्री के अनुसार उपर्युक्त योजना को लगभग चार सालों में पूरा किया जावेगा। योजना में दस प्रतिशत राशि जन सहयोग से तथा बाकी राशि राज्य और केंद्र की सरकारें उपलब्ध करायेंगी।

मध्यप्रदेश में पेयजल की आपूर्ति के लिए अपनाई गई नीतियों के इतिहास और उससे लेने योग्य सबक की बात करें तो पिछली सदी में ‘पीएचई’ विभाग ने भूजल को भरोसेमंद साधन के यप में अंगीकार किया था। इस कारण हर गांव में जलापूर्ति के लिए नलकूप खोदे गए थे। उस दौर में यदि कहीं पेयजल संकट का अनुभव किया जाता था तो विभाग, समाज और जन प्रतिनिधि, सग एक स्वर से नलकूप लगाने का विकल्प सुझाते थे। प्रदेश में आज भी ‘समूह नल-जल योजना’ की करीब 39 योजनाओं (लागत करीब 6672 करोड़) पर पहले से काम चल रहा है। इन 39 योजनाओं से मध्यप्रदेश के कुल 54903 गांवों में से 6091 गांवों की लगभग 64 लाख आबादी को घर बैठे नल के माध्यम से पानी मिलेगा।

मध्यप्रदेश सरकार ने देश में अव्वल आने की खातिर ‘जलाधिकार कानून’ बनाने की घोषणा तो पिछले साल, सरकार बनते ही ताबड़तोड़ कर दी थी, लेकिन यह कानून अभी, इसी महीने (11 फरवरी 20) हुए ‘राष्ट्रीय जल सम्मेलन’ के बाद, काफी ना-नुकुर करके सार्वजनिक किया गया है। प्रस्तुत है, इस कानून पर की गई गंभीर टिप्पणियों में से एक कृष्ण गोपाल व्यास का यह लेख ।

पहले इंदौर, जबलपुर, रीवा और ग्वालियर जैसे महानगरों में पेयजल का इंतजाम सतही जल स्त्रोतों पर आधारित था। धीरे-धीरे-धीरे जब पानी की मांग बढ़ी तो वैकल्पिक स्त्रोत खोजे गए। इस दौर में इंदौर, देवास, जबलपुर इत्यादि के लिए नर्मदा मुख्य सतही जल स्त्रोत के रूप में सामने आई।

काफी समय तक मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भूजल और नगरीय इलाकों में सतही जल विश्वसनीय स्त्रोत के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं पर जब भूजल दोहन ने लक्ष्मण रेखा लांघी और नलकूप सूखने लगे तब ध्यान सतही जलस्त्रोतों पर केंद्रित होने लगा। पहली नजर में यह सही भी लगा पर कुछ अरसे से लग रहा है कि बरसात के चरित्र में बदलाव आया है। जहाँ तक सतही जल की बात है तो मध्यप्रदेश की लगभग सभी नदियों का प्रवाह घटा है। प्रवाह की यह कमी नर्मदा जैसी बड़ी नदियों में भी देखी जा रही है।

पानी के मामले में यदि ‘जल संसाधन विभाग’ के अनुभवों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बरसात में अब सभी बांध शत-प्रतिशत नहीं भरते। गर्मी आते-आते आधे-अधूरे भरे बांधों का जल स्तर डेड-स्टोरेज के नीचे चला जाता है। पानी का टोटा हो जाता है। छोटी नदियों पर बनने वाली, एक समय की पसंदीदा उद्वहन सिंचाई परियोजनाओं का अब नाम-लेवा भी नहीं बचा है। यह कल्पना नहीं है। यह सब इतिहास है।

मध्यप्रदेश में प्रस्तावति ‘जलाधिकार कानून’ के लिए घर-घर पानी पंहुचाने का ताना-बाना खड़ा करना चुनौती नहीं है। चुनौती है जलस्त्रोत को टिकाऊ बनाना और उसकी निरन्तर पानी देते रहने की क्षमता को साल-दर-साल कायम रखना। यह चुनौती अकेले मध्यप्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। अभी देश का ध्यान गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तरप्रदेश के कुल 78 जिलों के 8000 से अधिक अति-दोहित ग्रामों पर ही गया है। ‘अटल भूजल योजना’ उसी चिन्ता का परिणाम है। इसमें कल नए गांव जुड़ेंगे। यह समस्या भूजल रीचार्ज को हल्के में लेने का परिणाम हैं। इस अनदेखी के कारण कल समाज का ध्यान नदियों के प्रवाह को बहाल करने पर जायेगा। इसलिए पानी पर समग्र चिन्तन की आवश्यकता है। नीतिगत बदलाव के जरिए हर बसाहट में जल स्वराज लाने और नदियों, जलस्त्रोतों को जिन्दा करने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि हमारे पास पानी की कमी नहीं है। कमी है, उस दृष्टिबोध की जो अपनी आगामी पीढिय़ों को ध्यान में रखकर पानी पर काम करे। यह संभव है और यही जल अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए।

  • कृष्ण गोपाल व्यास
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