संपादकीय (Editorial)

हिन्दी के हितैषी महात्मा गांधी

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14 सितंबर- हिंदी दिवस

  • कुमार कृष्णन

 

21 सितम्बर 2022, भोपालहिन्दी के हितैषी महात्मा गांधी – भांति-भांति की असंख्य विविधताओं वाले भारत में आपस के संवाद के लिए एक सामान्य भाषा की जरूरत आजादी के पहले से महसूस की जा रही थी। महात्मा गांधी हिन्दी को सम्पर्क, संवाद की राष्ट्रभाषा मानकर इस जरूरत को पूरा करना चाहते थे। क्या थे, उनके विचार?

महात्मा गांधी के सपनों के भारत में एक सपना राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रतिष्ठित करने का भी था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है। हिन्दी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में एक राजनीतिक शख्सियत के रूप में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

महात्मा गांधी की मातृभाषा गुजराती थी और उन्हें अंग्रेजी भाषा का उच्चकोटि का ज्ञान था, किंतु सभी भारतीय भाषाओं के प्रति उनके मन में विशिष्ट सम्मान भावना थी। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करे, उसमें कार्य करे, किंतु देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा भी वह सीखे, यह उनकी हार्दिक इच्छा थी।

गांधीजी ने ‘हिन्द स्वराज’ (सन् 1909 ई.) में अपनी भाषा-नीति की घोषणा इस प्रकार की थी- ‘‘सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।’’

महात्मा गाँधी ने भारत आकर अपना पहला महत्वपूर्ण भाषण 6 फरवरी 1916 को बनारस में दिया था। उस दिन भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग वहाँ ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ का शिलान्यास करने आए थे। महामना मदनमोहन मालवीय के विशेष निमंत्रण पर महात्मा गाँधी भी इस समारोह में शामिल हुए थे।

सर्वप्रथम उन्होंने समारोह की कार्रवाई एक विदेशी भाषा, अँग्रेजी में चलाए जाने पर आपत्ति की और दुख जताया। इसके बाद उन्होंने मंच पर और सामने विराजमान रत्नजडि़त आभूषणों से दमकते राजाओं-महाराजाओं की उपस्थिति को बेशकीमती जेवरों की भडक़ीली नुमाइश बताते हुए उन्हें देश के असंख्य दरिद्रों की दारुण स्थिति का ध्यान दिलाया।

महात्मा गांधी किसी भाषा के विरोधी नहीं थे। अधिक-से-अधिक भाषाओं को सीखना वे उचित समझते थे। प्रत्येक भाषा के ज्ञान को वे महत्वपूर्ण मानते थे, किंतु उन्होंने निज मातृभाषा और हिन्दी का सदैव सबल समर्थन किया। एक अवसर पर उन्होंने कहा था- ‘भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।’

गांधीजी की इच्छा थी कि भारत के प्रत्येक प्रदेश में शिक्षा का माध्यम उस प्रदेश की भाषा को होना चाहिए। उनका कथन था- ‘राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं।’

मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में गांधीजी ने कहा- ‘जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें।’ इसी भाषण में उन्होंने हिंदी के क्षेत्र-विस्तार की आवश्यकता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा, यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुत: गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा।

इंदौर साहित्य-सम्मेलन के अवसर पर गांधी जी ने हिंदी के प्रचार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य का आरंभ कराया जिसका संबंध दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार से था। उन्होंने अपने उसी भाषण में यह कहा कि- सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़ भाषाओं के लिए है। वहां तो कुछ प्रयत्न भी नहीं हुआ है। हिंदी भाषा सिखाने वाले शिक्षकों को तैयार करना चाहिए। ऐसे शिक्षकों की बड़ी ही कमी है।

दक्षिण भारतीयों के बीच हिंदी का कैसे प्रचार हो, यह गांधी जी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या थी। भारतीय राजनेताओं में गांधीजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने द्रविड़ प्रदेश में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए हिंदी को विधिवत् सिखाया जाना आवश्यक समझा और उसके लिए उन्होंने ठोस योजना प्रस्तुत की, जिसके अंतर्गत पुरुषोत्तम दास टंडन, वेंकटेश नारायण तिवारी, शिवप्रसाद गुप्ता सरीखे हिंदी-सेवियों को लेकर ‘दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा’ का गठन किया।

महात्मा गांधी ने सभी भारतीय भाषाओं का समादर और हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए 17 मई 1942 तथा 9 अगस्त 1946 को कहा था- ‘महान प्रांतीय भाषाओं को उनके स्थान से च्युत करने की कोई बात ही नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय भाषा की इमारत प्रांतीय भाषाओं की नींव पर ही खड़ी की जानी है। दोनों का लक्ष्य एक-दूसरे की जगह लेना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमी को पूरा करना है।’ महात्मा गांधी के विचार, महान् भारतीय नेताओं की भावना और हिन्दी-भाषा-भाषी जनता की विशाल संख्या को दृष्टिगत रखते हुए पर्याप्त चिंतन-मनन के उपरांत भारतीय संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को भारतीय संविधान में राजभाषा की प्रतिष्ठा प्रदान की थी।

गांधी के अभियान का हश्र यह हुआ कि उत्तरप्रदेश, बिहार और अन्य क्षेत्रों के साहित्यकारों ने जनपदीय भाषा को भूलकर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास में अपनी कलम चलायी। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, भवानी प्रसाद मिश्र, विष्णु प्रभाकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि ने हिन्दी को राष्ट्रीय धर्म के रूप में अपनाया। बिहार में भी आचार्य शिवपूजन सहाय, राधिकारमण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, लक्ष्मी नारायण सुधांशु, नागार्जुन, फणीश्वर नाथ रेणु आदि ने भी अपनी क्षेत्रीय बोलियों के मोह से ऊपर उठकर हिन्दी के विकास में योगदान देना अपना राष्ट्रीय धर्म समझा।                       

  • (सप्रेस)

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