मध्यप्रदेश ने कर दिखाया – गेहूँ उपार्जन में देश में प्रथम आया

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मध्यप्रदेश ने कर दिखाया – गेहूँ उपार्जन में देश में प्रथम आया

कोरोना संकट के बीच राजनैतिक इच्छाशक्ति, जनभागीदारी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अद्भुत समन्वय

मध्यप्रदेश ने कर दिखाया – गेहूँ उपार्जन में देश में प्रथम आया – इस वर्ष मौसम की मेहरबानी और किसानों की मेहनत से गेहूँ की फसल लहलहा रही थी। अनुमान था कि इस वर्ष गेहूँ की फसल उत्पादन के सभी रिकॉर्ड तोड़ देगी। इसके उपार्जन को लेकर सरकारी हल्कों में चिंता की लहर थी। कारण यह कि पिछले वर्षों का अनुभव था कि उपार्जन हेतु अपने घरों से दूर बने उपार्जन केंद्रों में जाना, उपार्जन केंद्रों पर कई दिनों तक लगी रहने वाली ट्रैक्टर ट्रॉलियों की लम्बी लाइनें, भुगतान में देरी आदि कारणों से उपार्जन केंद्रों पर जाकर गेहूँ बेच देना किसानों के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं था। वहीं उपार्जित गेहूँ का परिवहन, भंडारण किसानों को समय पर भुगतान करना आदि भी कठिन कार्य था। इसी बीच प्रदेश में कोरोना ने दस्तक दे दी। फसल की कटाई भी नहीं हो पाई थी और इसी बीच लॉक डाउन हो गया। कोढ़ में खाज जैसी स्थिति हो गई। इन परिस्थितियों में जहां बम्पर उत्पादन की संभावना खुशी की बात थी वहीं उसका उपार्जन करना उतना ही दुष्कर हो गया था। ऐसी विषय परिस्थिति में ही किसी सरकार की व्यवस्थाओं को कसौटी पर कसा जाता है ।

कृषि कार्य में छूट

ग्रामीण क्षेत्रों में फसल कटाई को रोका नहीं जा सकता था अत: प्रथम लॉकडाउन में ही हार्वेस्टर, ट्रैक्टर व कृषि कार्य में लगे उपकरणों को लॉक डाउन से पृथक रखा गया। कृषि कार्य के लिए अपने घरों से निकलने की छूट दी गई। प्रदेश में हार्वेस्टर मुख्यत: पंजाब से आते हैं। अत: पंजाबी समाचारपत्रों में विज्ञापन जारी करके उन्हें प्रदेश में आमंत्रित किया गया व मध्यप्रदेश में पूरी मदद करने का आश्वासन दिया गया।

डायनामिक प्लानिंग

लॉक डाउन के कारण गेहूँ खरीदी की तिथि बढ़ाकर 15 अप्रैल करना पड़ी। किसानों की चिंता दूर करने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कई बार संदेश जारी करके किसानों को आश्वस्त किया कि मंडियाँ और उपार्जन केंद्र अपना कार्य करेंगे। गेहूँ की खरीदी में देर भले ही हुई है पर पूरी फसल खरीदी जाएगी। समय के साथ नई-नई समस्या सामने आने लगीं जिनका कोई पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं था। लॉक डाउन के कारण बिहार के मजदूर नहीं आ पाए जो लगभग पूरे प्रदेश में हम्माली का कार्य करते थे। कई मंडियां संक्रमण क्षेत्र में होने के कारण प्रारंभ नहीं हो पाईं। विगत वर्ष के संग्रहीत अनाज से गोदाम भरे हुए थे और नए गेहूँ को रखने के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं थी। पश्चिमी बंगाल में लॉकडाउन के कारण जूट के कारखाने बंद हो जाने के कारण बारदानों की आपूर्ति बाधित हो गई थी। बम्पर उत्पादन के कारण उपार्जन के सारे अनुमान ध्वस्त होते जा रहे थे अत: निरंतर गतिशील योजना (डायनेमिक प्लानिंग) की आवश्यकता थी।

डिजिटल टेक्नोलॉजी का उपयोग

किसानों को एसएमएस भेजे गये। पहले लघु व सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी गई। जिलों को अधिकार दिया गया कि वे विशेष परिस्थिति में सीमित संख्या में एसएमएस भेज सकते हैं। विषम परिस्थिति को देखते हुए प्रत्येक जिले को प्रेरित किया गया कि वे चुनाव जैसी व्यवस्था करें। 75 लाख से अधिक एसएमएस तो किसानों को यह बताने के लिए भेजे गये कि कोरोना से बचाव के लिए क्या सावधानियां रखी जाना हैं। एसएमएस भेजने से लेकर वीडियो कांफ्रेंसिंग, वाट्सएप व ऑनलाइन एप के प्रयोग के द्वारा किसानों तक सूचना का प्रवाह अबाधित रखा गया।

पीडीएस में अग्रिम उठाव

सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अग्रिम उठाव करा दिया गया। भारत सरकार से चर्चा करके अन्य प्रदेशों में रेल के माध्यम से अनाज भेजकर गोदामों में जगह की गई। धान के मिलर्स ने बड़ी मात्रा में धान उठाकर जगह खाली कर दी। लॉक डाउन के दौरान प्रदेश में 10 लाख टन मीट्रिक क्षमता के कैप का निर्माण करा देना किसी चमत्कार से कम नहीं है। उठाव की स्थिति की तत्परता इस बात से समझी जा सकती है कि औसतन 15 हजार ट्रकों की दैनिक फेरी लगाई गई।

बोल्ड निर्णय

जूट के बारदानों के स्थान पर एचडीपीई बारदानों के इस्तेमाल के लिए भारत सरकार की अनुमति लगती है। इस अनुमति में समय लगता और तब तक एचडीपीई बारदाने अन्य राज्य बुक कर लेते । अत: बोल्ड निर्णय लेते हुए एचडीपीई बारदानों की खरीदी का आदेश दे दिया गया। जब तक यह बारदाने आए तब तक भारत सरकार की अनुमति भी आ गई और खरीदी बाधित नहीं हुई।

उपार्जन केंद्र बढ़ाए, आत्मनिर्भर हुए

गत वर्ष प्रदेश में 3545 उपार्जन केंद्र बनाए गए थे। इस वर्ष इनकी संख्या 4529 कर दी गई। गोदाम स्थल पर ही केंद्र बनाने को प्राथमिकता दी गई। इस प्रकार 30 प्रतिशत केंद्र गोदाम स्तर पर बनाए गए। फलस्वरूप किसानों को उपज बेचने हेतु कम दूरी तय करना पड़ी और उपार्जित गेहूँ के परिवहन में भी सुविधा हुई। श्रमिकों की समस्या का समाधान स्थानीय लोगों और अन्य प्रदेशों से लौटे श्रमिकों की बदौलत किया गया। इन्हें साधारण प्रशिक्षण देकर प्रेरित किया गया। इसका परिणाम यह रहा कि हम्माली का कार्य स्थानीय लोगों ने किया। यह लोग आगामी वर्षों के लिए भी तैयार हो गये। हम्मालों और श्रमिकों के मामले में अब उपार्जन केंद्र आत्मनिर्भर हो गये हैं।

स्वनुशासन से संभव हुआ

मानव स्वभाव है कि सामान्य काल में उसे अनुशासन में रखने के लिए कानून की शक्ति का उपयोग करना पड़ता है। परंतु संकट काल में वही स्वानुशासित हो जाता है। कोरोना संकट ने भी लोगों में इस जिम्मेदारी की भावना को जगाया। उपार्जन केंद्रों पर भौतिक दूरी बनाना, गमछों के मास्क बनाकर उपयोग करना, एसएमएस मिलने पर ही फसल बेचने पहुँचना, उपार्जन केंद्र पर धैर्य बनाए रखना आदि बातें बगैर किसी कठिनाई के स्वनुशासन से संभव हो गईं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि उपार्जन केंद्रों पर आने वाले लगभग 16 लाख किसानों और लगभग 75 हजार कार्यकर्ताओं में से किसी को भी आपस में कोरोना संक्रमण नहीं हुआ।

मध्यप्रदेश ने पीछे छोड़ा पंजाब को

इसका परिणाम भी अद्भुत रहा। कभी गेहूँ उत्पादन और उपार्जन में सिरमौर रहे पंजाब को भी मध्यप्रदेश ने पीछे छोड़ दिया। 6 जून की स्थिति में पंजाब में 1 करोड़ 27 लाख क्विंटल गेहूँ का उपार्जन हुआ जबकि मध्यप्रदेश में यह ऑंकड़ा 1 करोड़ 29 लाख क्विंटल हो गया था। यह वही मध्यप्रदेश है जिसने पिछले वर्ष 73 लाख क्विंटल गेहूँ उपार्जित किया था। पिछले वर्ष 9 लाख 60 हजार किसानों ने गेहूँ बेचा था जबकि इस वर्ष उनकी संख्या 15 लाख 72 हजार हो गई। इस वर्ष लघु व सीमांत किसानों की भागीदारी भी बढ़ गई । गत वर्ष इन दोनों की संख्या 5 लाख 39 हजार थी जो इस वर्ष 9 लाख 20 हजार हो गई।

21 हजार करोड़ किसानों के खाते में

यह चमत्कार सरकार की इच्छा शक्ति और शासन के तत्पर क्रियान्वयन से संभव हो पाया है। जहां पूरे प्रदेश की शासकीय मशीनरी इस कार्य में रात-दिन एक किये रही वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने समीक्षा की कमान अपने हाथ में रखी। इस अवधि में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा लगभग 50 से अधिक समीक्षा बैठकें करके जिला स्तर तक की सतत् समीक्षा की। मध्यप्रदेश की इस उपलब्धि से अभी तक 14 लाख 41 हजार किसानों के खातों में लगभग 21 हजार करोड़ रुपये की राशि जमा हो चुकी है। कोरोना संकट में चरमराई अर्थव्यवस्था में यह बड़ा सहारा है। और इसका श्रेय किसानों, लोक सेवकों और सरकार के सामूहिक प्रयत्नों को जाता है।

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