संकट में भूमि

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भूमि तो तब से संकट में है, जब से मनुष्य अपना नाम लिखकर उसका मालिक बन बैठा। उसने यह मानने से इंकार कर दिया कि मनुष्य के नाते वह भी प्रकृति का हिस्सा है। उसने एक कानून बनाया जिसके मुताबिक भूमि पर जिसका नाम दर्ज होगा वह उसका मालिक होगा और उसकी खरीद-बिक्री भी कर सकेगा।

भूमि तब से मनुष्य के अत्याचार की शिकार हुई। उसके मालिक बदलते रहे, लेकिन उसका शोषण जारी रहा। उसे जगह-जगह खोदकर जख्म दिये गये, खनिज निकाले गये, पानी का दोहन किया गया और जंगल नष्ट कर दिये गये। भूमि पर लोहा, सीमेंट बिछाकर हवा, पानी, प्रकाश से उसका रिश्ता ही तोड़ दिया गया।

मालकियत के अधिकार ने भूमि को अमीरों की दासी बना दिया। जिसके पास धन होगा वही उस भूमि का मालिक होगा और फिर मालिक जैसा चाहे वैसा उपभोग कर सकेगा। किसानों ने बड़े संघर्ष के बाद खेती से रिश्ता जोड़कर उसे अपने सहजीवन का साथी बनाया था, लेकिन धीरे-धीरे फिर से भूमि को बाजार में खड़ा कर दिया गया।

अब कारपोरेट्स ने तय किया है कि औद्योगिक विकास और आधुनिक खेती के नाम पर भूमि के मालिक बनेंगे और फिर उसकी मनमानी लूट करेंगे। सरकार पांच ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी बनाने का संकल्प जाहिर कर रही है।  इसके लिए प्रतिवर्ष 20 लाख करोड़ रुपये के हिसाब से पांच साल में 100 लाख करोड़ रुपयों का निवेश लाने के लिए रोड मैप तैयार किया गया है। जिन्हें इसका लाभ मिल रहा है उनके लिए यह सब लुभावना हो सकता है, लेकिन जिन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी, उनके जीवन में विकास का अंधेरा छा जायेगा।

गांव और किसानों से बड़े पैमाने पर कृषि भूमि, प्राकृतिक संसाधन और उससे प्राप्त होने वाला रोजगार छीना जायेगा। रासायनिक खेती और जलवायु परिवर्तन के कारण भी कृषि भूमि और कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहे हैं और अति सिंचाई के कारण लवणीयता बढऩे से कृषि भूमि का एक तिहाई हिस्सा तेजी से बंजर होते जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का भी खेती और उसकी उपज पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में सरकार की नीतियों का भूमि और उसके कारण खाद्यान्न सुरक्षा, राजनीतिक आजादी पर क्या असर पड़ेगा, यह समझना जरूरी है।

देश की कृषि संबंधी नीतियां बनाने, कृषि योजनाएं क्रियान्वित करने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण, आयात-निर्यात, विभिन्न फ सलों का उत्पादन, कुल कृषि उत्पादन, सब्सिडी, बजट आदि के लिए देश में कितनी कृषि भूमि है यह जानना सरकार के लिये जरूरी होता है। उसके लिये देश में कृषि भूमि का प्रत्यक्ष आंकलन करने की व्यवस्था है, लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा कहीं भी जमीन का आंकलन ठीक से नहीं होता। सरकारें अनुमान (प्रोजेक्शन) से कृषि भूमि के आंकड़े जोड़ती हैं और उसी के आधार पर योजनाएं बनाती है। सरकारी विभाग अलग-अलग आंकड़े दे रहे हैं। कृषि विभाग और सैम्पल सर्वे के आंकड़ों में बहुत अंतर है। उद्योग मंत्रालय के पास कोई हिसाब नहीं है कि पूरे देश में उद्योगों के लिये कितनी जमीन ली गई है।

कृषि भूमि संबंधित सरकारी आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि सरकार की भावी विकास योजनाओं में कितनी कृषि भूमि लगेगी और उसके क्या प्रभाव होंगे।

पूरे देश में बनाये जा रहे छह औद्योगिक गलियारों से 20.14 करोड़ हेक्टर भूमि प्रभावित होगी जो देश के कुल रिपोर्टेड क्षेत्र का 66 प्रतिशत है। बढ़ती आबादी और घटती कृषि भूमि के कारण देश में किसान के पास प्रति परिवार औसत कृषि भूमि का क्षेत्र लगातार घट रहा है। वर्ष 2031 में जब भारत की जनसंख्या 150 करोड़ के आसपास होगी और जब कुल कृषि भूमि चार करोड़ हेक्टर होगी, तब हर परिवार के हिस्से में औसत 0.15 हेक्टर कृषि भूमि आयेगी।

सरकार भूमि संबंधी नीति और कानूनों में तेजी से परिवर्तन कर रही है। पांच सालों में आधे किसानों को खेती से बाहर करने की सिफारिश खुद नीति आयोग ने की है। सरकार किसानों की संख्या कुल आबादी के 20 प्रतिशत तक सीमित रखना चाहती है। कारपोरेट्स को अंधाधुंध भूमि सौंपने के लिये भूमि अधिग्रहण कानून में परिवर्तन, सीधे जमीन खरीदने के लिये कानून, बाहरी लोगों को जमीन न बेचने के राज्यों के अधिकारों को समाप्त करना, जमीन की अधिकतम सीमा निर्धारित करने वाले शहरी और ग्रामीण सीलिंग एक्ट समाप्त करना, लैंड बैंक, लैंड यूज बदलने के बाद भी जमीन किसानों को वापस न करते हुये लैंड बैंक में डालने का प्रावधान, आदिवासियों की जमीन बेचने का अधिकार आदि के लिये या तो कानून बनाये गये हैं या फिर बनाये जा रहे हैं।

कारपोरेट फार्मिंग के लिये खेती में विदेशी निवेश की अनुमति, पूंजी और तकनीक को प्रोत्साहन, कॉन्ट्रैक्ट खेती के लिये कानून, खेती को लंबी लीज पर लेने के लिये कानून आदि सब उसी योजना का हिस्सा है। कारपोरेट फार्मिंग के लिये उपजाऊ खेती कंपनियों को सौंपी जायेंगी। देश की पूरी खेती को फि र से चाय और नील की खेती की तरह नई कारपोरेटी जमींदारी की तरफ धकेला जा रहा है। गांव और भूमि बचाने के लिये ग्रामदान कानून एक रास्ता है।

जब सरकारें कारपोरेट्स के दलाल बनकर काम कर रही हों तब भूमि बचाने के लिये जनता को ग्रामसभा के द्वारा स्वयं निर्णय लेने ही होंगे। जनता को इसी दिशा में व्यापक भूमि सुधार के लिये काम करना होगा। तभी वह कारपोरेट्स की गिद्ध-न•ारों से बच पायेंगे। अन्यथा पूरे समाज को जमीन से उखाड़ दिया जायेगा या समाज की जमीन ही उखाड़ दी जायेगी।

गांव और किसानों से बड़े पैमाने पर कृषि भूमि, प्राकृतिक संसाधन और उससे प्राप्त होने वाला रोजगार छीना जायेगा। रासायनिक खेती और जलवायु परिवर्तन के कारण भी कृषि भूमि और कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहे हैं और अति सिंचाई के कारण लवणीयता बढऩे से कृषि भूमि का एक तिहाई हिस्सा तेजी से बंजर होते जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का भी खेती और उसकी उपज पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में सरकार की नीतियों का भूमि और उसके कारण खाद्यान्न सुरक्षा, राजनीतिक आजादी पर क्या असर पड़ेगा, यह समझना जरूरी है।
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.87 करोड़ हेक्टर और रिपोर्टेड क्षेत्र 30.59 करोड़ हेक्टर है। कृषि विभाग के अनुसार कृषि भूमि का क्षेत्र 14 करोड़ हेक्टर के आसपास है और पिछले 70 सालों में इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन नेशनल सॅम्पल सर्वे-2013 (70 वां दौर) के भारत में पारिवारिक स्वामित्व एवं स्वकर्षित जोत के अध्ययन के अनुसार ग्रामीण भारत में रहने वाले परिवारों के स्वामित्व में 1992 में 11.7 करोड़ हेक्टर जमीन थी, जो 2013 में घटकर 9.2 करोड़ हेक्टर रह गई थी। याने कि दो दशक में 2.5 करोड़ हेक्टर कृषि भूमि कम हुई है। भूमि हस्तांतरण की इस गति के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2023 के सॅम्पल सर्वे में ग्रामीण भारत के पास केवल 8 करोड़ हेक्टर कृषि भूमि बचेगी।
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