गेहूं निर्यात पर भारत दो कदम आगे, चार कदम पीछे

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  • शशिकान्त त्रिवेदी

9 जून 2022, गेहूं निर्यात पर भारत दो कदम आगे, चार कदम पीछे – भारत की गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने की कुछ विदेशी मीडिया में आलोचना हो रही है। कारण बताया जा रहा है फसल का गलत अनुमान लगाया जाना। फरवरी के मध्य में, कृषि मंत्रालय द्वारा गेहूं की फसल का रिकॉर्ड 111 मिलियन टन होने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन इससे पहले ही भारत की गर्म हवाओं जिन्हे लू कहते हैं उन्होंने फसल को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया। और मई की शुरुआत में ही, खाद्य सचिव ने कहा कि फसल 105 मिलियन टन कम होने की संभावना है। फिर 19 मई को, कृषि मंत्रालय ने अपने अनुमान को संशोधित कर 106.4 मिलियन टन कर दिया। पंजाब राज्य में रिपोर्ट्स के मुताबिक उत्पादन सबसे कम होने का अनुमान है। और इसी के मद्देनजर घरेलू जरूरत के लिए गेहूं के निर्यात पर केंद्र सरकार ने रोक लगा दी।

युद्ध के कारण पैदा हुई माँग

पहला सवाल यह किया जा रहा है कि, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और दुनिया उम्मीद कर रही थी कि भारत यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण पैदा हुई माँग और आपूर्ति की कमी को भर देगा, लेकिन अब यह मुश्किल दिख रहा है। जी-7 के कृषि मंत्रियों ने वैश्विक अनाज की कमी के बीच गेहूं के निर्यात को रोकने के भारत के फैसले की निंदा की।

भारत के फैसले की निंदा

दूसरा सवाल यह किया जा रहा कि, भारतीय गेहूं व्यापारियों ने वैश्विक अनाज की कमी से लाभ पाने का अवसर खो दिया है। निर्यात के लिए बाजारों के मिलने होने और वेयरहाउसिंग जैसी बुनियादी ढांचे की स्थापना में समय लगता है। क्या इस तरह के नीतिगत फैसले इसमें और मुश्किलें पैदा नहीं करेंगे?

सबसे अधिक गेहूं की खरीद

तीसरा, क्या यह किसानों के लिए नुकसानदायक नहीं होगा क्योंकि गेहूं का बाजार मूल्य एमएसपी से अधिक हो गया था। कई किसान बाजार में बेचना पसंद कर रहे थे। इससे पंजाब में निजी व्यापारियों द्वारा पिछले आठ साल में सबसे अधिक गेहूं की खरीद हुई है। चौथा, क्या देश की कृषि व्यापार नीति की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठेगा? मार्च की गर्मी के कारण कम उत्पादन के संकेत पहले से ही दिखाई दे रहे थे, फिर भी, वाणिज्य मंत्रालय ने एक प्रतिनिधिमंडल को इस नारे के साथ विदेश भेजा कि ‘भारत दुनिया का पेट भर सकता है।’

गेहूं आवंटन को भी कम किया

भारत सरकार ने देश में गेहूं की आपूर्ति सुनिश्चित करने और घरेलू कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए केवल निर्यात पर ही प्रतिबंध नहीं लगाया बल्कि खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम के तहत गेहूं के आवंटन को भी कम कर दिया और इसके एक हिस्से को चावल के सार्वजनिक स्टॉक के साथ प्रतिस्थापित कर दिया, जो अभी अधिशेष में हैं। इस तरह से बचाए गए लगभग 11 मिलियन टन गेहूं का उपयोग बाद में बाजार की कीमतों को कम करने के लिए या सरकार से सरकार को गेहूं निर्यात करने के लिए किया जा सकता है, जिन्हें प्रतिबंध से छूट दी गई है। कोरोना महामारी और रूस यूक्रेन युद्ध के बाद से दुनिया भर में हाल ही में एक चिंता उभर कर सामने आई है कि वैश्विक भूख का स्तर एक नई ऊंचाई पर है। कोरोना महामारी से पहले गंभीर रूप से खाद्य-संकट से जूझते लोगों की संख्या 13.5 करोड़ थी जो अब महामारी के बाद कई जगह सामान्य जीवन पटरी पर आने के बाद 27.6 करोड़ या दोगुनी हो गई है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने मई में ‘ग्लोबल फूड सिक्योरिटी कॉल टू एक्शन मंत्रिस्तरीय बैठक में कहा कि ‘निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए, और अधिशेष उन लोगों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिन्हें भोजन की सबसे ज्यादा जरूरत है।’

लेकिन क्या भारत के निर्णय को एकदम गलत ठहराया जाना उचित है? क्या गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का भारत का निर्णय दुनिया भर में व्याप्त संरक्षणवाद की लहर का हिस्सा नहीं लगता ? जिसे रूस-यूक्रेन युद्ध ने बल दिया ? क्या चीन ने उर्वरकों के निर्यात को प्रतिबंधित नहीं किया है? और क्या चीन एक साल से अधिक समय से खाद्य आयात करने की होड़ में नहीं है? क्या इंडोनेशिया ने स्थानीय कीमतों को कम करने के लिए अप्रैल माह में पाम तेल के निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया था बाद में इसे हटा लिया गया था? क्या सूखे और मुद्रा स्फीति से जूझते अर्जेंटीना ने मार्च में सोया तेल के निर्यात करों में वृद्धि नहीं की? क्या भारत की कोई खाद्य कूटनीति नहीं होना चाहिए? क्या गेहूँ के निर्यात पर प्रतिबंध में कोई छूट नहीं दी गई है?

गेहूं की पैदावार पर असर

गेहूं एक रबी फसल है, जिसे आमतौर पर अक्टूबर और दिसंबर के बीच बोया जाता है। यह अत्यधिक गर्मी के प्रति संवेदनशील है; फरवरी और मार्च के दो महीने गेहूं की बालियों के विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जब इसमें बीज, स्टार्च और प्रोटीन आता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि गेहूं 34 डिग्री तापमान से अधिक होने पर पैदावार में कमी का कारण बन सकता है। और यह गर्मी का प्रभाव भारत में गंगा के मैदानों के राज्यों में गेहूं की पैदावार पर साफ़ दिखा है। इस साल मार्च के दौरान, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में दो बार एक के बाद एक तपन और लू चली है; पहली 11-19 मार्च के बीच और दूसरी 27-31 मार्च के बीच। मार्च-अप्रैल में उत्तर भारत में औसत तापमान 4.5-6.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। पिछले वर्ष भारत, ब्रिटेन, नॉर्वे और चीन के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि भारत के गेहूं उत्पादक हिस्सों में गर्मी के इस प्रभाव का असर बढ़ रहा जिससे पैदावार में 1 से लेकर 8 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। अगर यही गर्मी और लू उन खेतों तक भी पहुंची हो जहाँ सिंचाई सुविधाएं नहीं हैं वहाँ यह आंकड़ा कई गुना बढऩे की आशंका, जिससे 4 से 36 प्रतिशत के बीच नुकसान हो सकता है।

इस साल मार्च की गर्मी की लहर के नतीजे, पंजाब के खेतों से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक दिखाई दिए हैं और रूस- यूक्रेन युद्ध ने दुनिया भर में गेहूं की कमी को बहुत बढ़ा दिया। जलवायु परिवर्तन और खाद्य प्रणालियों पर अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) की एक हालिया रिपोर्ट में भारत के खाद्य उत्पादन में 16 प्रतिशत की गिरावट की आशंका जताई गई है और चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 2030 तक भूख की कगार पर पहुँचने वाले संख्या 23 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। सिर्फ पंजाब में, कई खबरों के मुताबिक, प्रति एकड़ पाँच क्विंटल का नुकसान हुआ है, ऐसे में क्या केंद्र सरकार को अपनी जनता की खाद्य सुरक्षा के लिए कोई निर्णय नहीं लेना था।

बड़े पैमाने पर खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के लिए पर्याप्त गेहूं खरीद जो पिछले साल लगभग 440 लाख टन की तुलना में लगभग 180 लाख टन पर सिमट गई और अप्रैल में जब खाद्य कीमतों में साल-दर-साल 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि कुल खुदरा मुद्रास्फीति आठ साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई, वहीं थोक गेहूं की कीमतों में अप्रैल में 10.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, तो ऐसे में सरकार को खाद्य सुरक्षा के लिए निर्यात पर रोक लगाना एक सही कदम है। और इसलिए भी कि भारत ने जरूरतमंद देशों की मदद के लिए कभी कोई शर्त नहीं रखी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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