संपादकीय (Editorial)

खरीफ में अंतरवर्तीय फसल से आमदनी बढ़ाएं

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खरीफ में अंतरवर्तीय फसल से आमदनी बढ़ाएं

खरीफ में अंतरवर्तीय फसल से आमदनी बढ़ाएं – भारतीय कृषि मानसून की दासी है उसके बुने तानों-बानों पर ही उसे चलना है जैसा उसका बजाना वैसा ही कृषि को गाना है यह बात सर्वविदित है। खरीफ, रबी का आईना है जैसे-जैसे खरीफ फसलों की बुवाई साज संभाल से रबी पर भी असर होता है। 65 प्रतिशत आबादी की आर्थिक स्थिति की रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली कृषि का विशेषकर खरीफ फसलों का अस्तित्व चुनौती पूर्ण है। वैसे तो पिछले कुछ वर्षों से मानसून की लुका-छिपी का खेल चल रहा है।

गत वर्ष खरीफ में सोयाबीन को इतनी हानि पहुंची की आज बोआई हेतु बीज का टोटा पड़ गया है। सबसे अधिक क्षेत्र में लगने वाली सोयाबीन जिसे वर्तमान की कृषि का प्रमुख आधार माना गया है, 60 लाख हेक्टर की बुआई की जाना है। इतने बड़े क्षेत्र के लिये कोई नई फसल की सिफारिश और उसके बीज की व्यवस्था असम्भव ही होगा। इस वर्ष के मौसम को देखते हुए अधिक से अधिक क्षेत्र में अंतरवर्तीय फसलों का विस्तार किया जाना विवेक पूर्ण कदम होगा।

सोयाबीन के साथ अरहर, तिल, मूंग, उड़द की अंतरवर्तीय फसलें सफलता से ली जा सकती है, साथ ही कपास का क्षेत्र भी बढ़ाया जाकर उसके साथ ही खाली कतारों के बीच अंतरवर्तीय फसल लगाकर एक इकाई क्षेत्र से अधिक उत्पादन लेकर अधिक धन कमाया जा सकता है। ध्यान रहे अंतरवर्तीय फसलों के लिये उर्वरक की मात्रा अलग से डाली जाये ताकि पोषक तत्वों के लिये संघर्ष नहीं हो पाये। अनुसंधानकर्ताओं का यह भी मानना है कि इस वर्ष ज्वार, मक्का, तिल, बाजरा तथा ग्वार का रकबा बढ़ाया जा सकता है।

ज्वार, बाजरा तथा ग्वार की उत्पादन क्षमता तो पोषक तत्वों के भरपूर उपयोग कर बढ़ाई जा सकती है। दूसरी सबसे बड़ी जरूरत होगी जल, जिसके बिना जीवन दुर्लभ हो गया के बूंद-बूंद की हिफाजत के उपाय किये जायें। अतिरिक्त जल जैसी की संभावनायें हैं का संरक्षण के विषय में भी गंभीरता से तैयारी करनी होगी ताकि आने वाले रबी सीजन में मुश्किलों का सामना नहीं होने पाये। सोयाबीन की बुआई मेढ़ पद्धति से करें। अन्य फसलों के रखरखाव की और भी ध्यान रखा जाये। कम अवधि की सोयाबीन, धान लगाकर रबी की कुंडली पर यथा संभव सामन्जस्य बनाया जा सके। कम लागत की तकनीकी जैसे पूर्व में बताया जा चुका है का अंगीकरण जितने अधिक क्षेत्र में होगा उतनी ही अधिक सुरक्षित हमारी फसलें भी होंगी। आईये मानसून की चुनौतियों के लिये उपलब्ध तकनीकी का विस्तार करके सफलता से सामना किया जा सके।

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