अम्लीय मिट्टी में कौन सी खाद सबसे असरदार? पूर्वी भारत के लाखों किसानों के लिए महत्वपूर्ण सवाल
22 जून 2026, नई दिल्ली: अम्लीय मिट्टी में कौन सी खाद सबसे असरदार? पूर्वी भारत के लाखों किसानों के लिए महत्वपूर्ण सवाल – पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और केरल के कई हिस्सों में किसान वर्षों से एक जैसी समस्या का सामना कर रहे हैं। पर्याप्त खाद डालने के बावजूद फसलों की वृद्धि अपेक्षित नहीं होती। कई बार पौधों में पोषक तत्वों की कमी दिखाई देती है, जबकि खेत में उर्वरक की कोई कमी नहीं छोड़ी गई होती। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इसका संबंध सीधे मिट्टी की अम्लीय प्रकृति से है।
मिट्टी का पीएच यदि 6.5 से नीचे चला जाए तो उसे अम्लीय माना जाता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लगातार जल निकास के कारण कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व मिट्टी से बाहर निकल जाते हैं। परिणामस्वरूप मिट्टी की अम्लीयता बढ़ती जाती है। यही कारण है कि भारत के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अम्लीय मिट्टियां व्यापक रूप से पाई जाती हैं।
अम्लीय मिट्टी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें पोषक तत्वों की उपलब्धता बदल जाती है। किसान भले ही पर्याप्त फास्फोरस डाल रहा हो, लेकिन पौधा उसे पूरी तरह उपयोग नहीं कर पाता। इसका कारण यह है कि अम्लीय परिस्थितियों में फास्फोरस आयरन और एल्यूमिनियम के साथ मिलकर ऐसे रूप में परिवर्तित हो जाता है जिसे पौधे आसानी से अवशोषित नहीं कर सकते।
कई किसानों को यह भ्रम होता है कि यदि फसल कमजोर है तो अधिक उर्वरक डालना चाहिए। लेकिन अम्लीय मिट्टी में केवल मात्रा बढ़ाने से समस्या हल नहीं होती। यहां सही उर्वरक चयन और मिट्टी सुधार दोनों आवश्यक होते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि अम्लीय मिट्टी में जैविक पदार्थों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद मिट्टी की संरचना सुधारते हैं और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करते हैं। यही कारण है कि अम्लीय क्षेत्रों में जैविक स्रोतों को विशेष महत्व दिया जाता है।
चूना (Lime) का उपयोग अम्लीय मिट्टी सुधार का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। चूना मिट्टी की अम्लीयता को कम करता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाता है। कई शोधों में पाया गया है कि चूना उपयोग के बाद फास्फोरस उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
अम्लीय मिट्टी में उर्वरक चयन करते समय किसानों को यह भी समझना चाहिए कि सभी उर्वरकों का प्रभाव समान नहीं होता। कुछ उर्वरक मिट्टी को और अधिक अम्लीय बना सकते हैं जबकि कुछ का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है। इसलिए मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेना सबसे उचित माना जाता है।
धान, मक्का, आलू और कई बागवानी फसलें नियंत्रित अम्लीय परिस्थितियों में अच्छी उपज दे सकती हैं, लेकिन अत्यधिक अम्लीयता उत्पादन क्षमता को सीमित कर देती है। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक अम्लीय मिट्टियों को अनुपयोगी नहीं बल्कि प्रबंधन योग्य मिट्टियां मानते हैं।
पूर्वी भारत में खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक उत्पादन में बदलने के लिए अम्लीय मिट्टी की विशेष आवश्यकताओं को समझना होगा। केवल अधिक खाद डालना समाधान नहीं है। मिट्टी की रासायनिक प्रकृति को समझकर किया गया उर्वरक प्रबंधन ही बेहतर परिणाम दे सकता है।
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