फसल की खेती (Crop Cultivation)

2024 के लिए सोयाबीन की शीर्ष 4 अनुशंसित किस्में

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12 जून 2024, भोपाल: 2024 के लिए सोयाबीन की शीर्ष 4 अनुशंसित किस्में – भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर द्वारा क्रियान्वित अखिल भारतीय समन्वित सोयाबीन अनुसन्धान परियोजना की माह मार्च 2024 के दौरान कर्णाटक के  कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़ में 54वी वार्षिक समूह बैठक आयोजित की गई. इस अवसर पर भारत सरकार द्वारा गठित वैरायटी आइडेंटीफिकेशन समिति की बैठक का भी आयोजन किया गया जिसमे सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए 4 किस्मों की पहचान (3 किस्में मध्य क्षेत्र के लिए जबकि 1 किस उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र के लिए)  की गयी. प्रस्तुत लेख में इन्ही किस्मों की चर्चा की जा रही हैं. 

जे.एस. 23-03: इसका विकास जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर द्वारा किया गया हैं जो की अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान परियोजना का केंद्र भी हैं. वर्ष 2021 से 2023 के दौरान मध्य क्षेत्र में लगातार किये गए परीक्षणों में मात्र 93 दिनों की अवधी में इसने 2167 किग्रा./हे की औसत दर से प्रचलित किस्म की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक उत्पादन प्राप्त किया हैं. इस किस्म में बैंगनी रंग के फूल आते हैं तथा काली नाभिका एवं रोयेरहित फलियाँ होती हैं. परीक्षणों के दौरान चारकोल रॉट, अन्थ्राक्नोज, रायजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट एवं पिला मोजेक वायरस जैसे अनेक रोगों के लिए माध्यम प्रतिरोधिता प्रदर्शित की हैं. इसमें बैंगनी रंग के फूल आते हैं, नुकीली आकर की पत्तियां देखि जाती हैं एवं पीले बीजों पर काली रंग की नाभिका होती हैं. इस किस्म को मध्य क्षेत्र (सम्पूर्ण मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का मराठवाडा एवं विदर्भ क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात तथा मध्य उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए उपयुक्त पाई गई हैं.  

जे.एस. 23-09: जे.एस. सीरिज की अन्य किस्मों की तरह इसका विकास भी जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर द्वारा किया गया हैं जो की अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान परियोजना का केंद्र भी हैं. वर्ष 2021 से 2023 के दौरान मध्य क्षेत्र में लगातार किये गए परीक्षणों में मात्र 92 दिनों की अवधी में इसने 2104 किग्रा./हे की औसत दर से प्रचलित किस्म की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक उत्पादन प्राप्त किया हैं. इस किस्म में बैंगनी रंग के फूल आते हैं तथा काली नाभिका एवं रोयेरहित फलियाँ होती हैं. परीक्षणों के दौरान इस किस्म में चारकोल रॉट के लिए मध्यम से उच्च प्रतिरोधिता दर्शाई हैं. इसके अतिरिक्त एन्थ्राक्नोज एवं पीले मोज़ेक रोग के लिए भी यह मध्यम प्रतिरोधी देखि गई.  रायजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट एवं पिला मोजेक वायरस जैसे अनेक रोगों के लिए माध्यम प्रतिरोधिता प्रदर्शित की हैं. इसके फूलों का रंग बैंगनी हैं, तथा नुकीली आकर की पत्तियां देखि जाती हैं एवं पीले बीजों पर काली रंग की नाभिका होती हैं. इस किस्म को मध्य क्षेत्र (सम्पूर्ण मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का मराठवाडा एवं विदर्भ क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात तथा मध्य उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए उपयुक्त पाई गई हैं.  

आर.एस.सी. 11-42: जे इसका विकास इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा किया गया हैं जो की अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान परियोजना का केंद्र भी हैं. वर्ष 2021 से 2023 के दौरान पूर्वी क्षेत्र में लगातार किये गए परीक्षणों में इसने 2299 किग्रा./हे की औसत दर से प्रतिस्पर्धी किस्म की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक उत्पादन प्राप्त किया हैं. यह किस्म अर्धसिमित वृद्धि वाली हैं तथा इसमें बैंगनी रंग के फूल आते हैं. इस किस्म में इंडियन बड ब्लाइट रोग तथा बैक्टीरियल पुस्तुले के लिए मध्यम प्रतिरोधिता हैं जबकि रायजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट. के लिए मध्यम प्रतिरोधिता हैं. यह चक्र भृंग के लिए मध्यम प्रतिरोधि हैं. इसकी औसत परिपक्वता अवधि 101 दिन हैं. इस किस्म को पूर्वी क्षेत्र (छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल) के लिए उपयुक्त पाया गया हैं.  

एन.आर.सी. 197: मार्कर असिस्टेड सिलेक्शन पद्धति से इसका विकास भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान द्वारा किया गया हैं. यह उत्तर पहाड़ी क्षेत्र की प्रथम किस्म हैं जो अपौष्टिक कुनीत्ज ट्रिप्सिन इन्हिबिटर से मुक्त हैं तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के लिए उपयुक्त पाई गई है. यह 113 दिन में पकनेवाली किस्म शीघ्र समयावधि की किस्म हैं जो की पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त विकल्प हैं. इसके पत्तियों का आकर नुकीला होता हैं. इसकी औसत उत्पादकता 1624 किग्रा/हे देखि गयी और परीक्षणों में 2072 किग्रा/हे की अधिकतम उत्पादन क्षमता देखि गई हैं. 

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