फसल की खेती (Crop Cultivation)

बाजरा की ये उन्नत किस्में देंगी दोगुनी पैदावार, जानें पूसा संस्थान की सलाह

18 सितम्बर 2025, नई दिल्ली: बाजरा की ये उन्नत किस्में देंगी दोगुनी पैदावार, जानें पूसा संस्थान की सलाह – बाजरा, जिसे श्री अन्न भी कहा जाता है, पोषण सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ है। इसमें प्रोटीन, आयरन और जिंक की भरपूर मात्रा होती है, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। भारत में लगभग 70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बाजरा की खेती होती है, और यह किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान IARI, पूसा के विशेषज्ञों ने बाजरा की खेती के लिए जोन-आधारित सलाह जारी की है, जिसमें उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं शामिल हैं। अगर आप बाजरा की खेती करते हैं, तो ये टिप्स आपकी पैदावार को बढ़ाने और रोगों से बचाने में मदद करेंगी। आइए जानते हैं विस्तार से।

बाजरा की खेती के जोन: आपके इलाके के अनुसार चुनें किस्में

पूसा संस्थान के वैज्ञानिकों ने बाजरा की खेती को तीन मुख्य जोनों में बांटा है, जो वार्षिक वर्षा के आधार पर तय किए गए हैं। इससे किसानों को सही किस्म चुनने में आसानी होती है:

  • ए1 जोन: यहां वार्षिक वर्षा 400 मिमी से कम होती है। इसमें राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के सूखे इलाके शामिल हैं। इस जोन के लिए जल्दी पकने वाली (75 दिन में) किस्में उपयुक्त हैं।
  • ए जोन: वार्षिक वर्षा 400 मिमी से अधिक। इसमें राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और दिल्ली के क्षेत्र आते हैं। यहां मध्यम अवधि (80 दिन के आसपास) में पकने वाली किस्में बेहतर काम करती हैं।
  • बी जोन: वार्षिक वर्षा 400 मिमी से अधिक। इसमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं। यहां देर से पकने वाली (80 दिन से अधिक) किस्में लगाई जाती हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जोन के अनुसार किस्म चुनने से पैदावार में 20-30% तक की वृद्धि हो सकती है।

पूसा संस्थान की उन्नत किस्में: पोषण और पैदावार का संगम

ICAR के विशेषज्ञों ने बाजरा की कई बायोफोर्टिफाइड और संकर किस्में विकसित की हैं, जो रोग-प्रतिरोधी हैं और पोषक तत्वों से भरपूर हैं। ये किस्में ब्लास्ट, डाउन मिल्ड्यू, रस्ट, एर्गोट और स्मट जैसे प्रमुख रोगों से मुक्त रहती हैं। आइए जानते हैं कुछ प्रमुख किस्मों के बारे में:

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  1. पूसा 1801: यह बायोफोर्टिफाइड किस्म ए और बी जोनों के लिए आदर्श है। पैदावार 33-34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने का समय 82-84 दिन। आयरन 70 पीपीएम और जिंक 57 पीपीएम। सूखा चारा भी 175 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलता है। रोगों के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी।
  2. पूसा 1201: बायोफोर्टिफाइड किस्म, जो 78 दिन में पक जाती है। पैदावार 28-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। आयरन 55 पीपीएम, जिंक 45 पीपीएम। बाजरा के पांच प्रमुख रोगों से बचाव। ए जोन के किसानों के लिए बेहतरीन विकल्प।
  3. पूसा कंपोजिट 701: आज की सबसे लोकप्रिय किस्म, जिसका 39-40% बीज इंडेंट इसी का है। ए जोन (हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) के लिए विकसित। पैदावार 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने का समय 78 दिन। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर पॉपुलर। सभी प्रमुख रोगों के प्रति अवरोधी।

ये किस्में न केवल पैदावार बढ़ाती हैं, बल्कि पोषण मूल्य भी ऊंचा रखती हैं, जिससे बाजार में बेहतर कीमत मिलती है। 2023-24 के डेटा के अनुसार, पूसा कंपोजिट 701 उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा बीज मांग वाली किस्म है।

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किसानों के लिए सलाह: समसामयिक कृषि कार्य अपनाएं

पूसा संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि जोन के अनुसार उन्नत बीज चुनें, और बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करवाएं। रोग-प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल करके कीटनाशकों पर खर्च बचाएं। साथ ही, पानी के प्रबंधन पर ध्यान दें – सूखे इलाकों में ड्रिप इरिगेशन अपनाएं।

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