फसल की खेती (Crop Cultivation)

कपास को कीट, मूंगफली को रोगों से बचायें

  • डॉ. सुनील कुमार
    विषय वस्तु विषेशज्ञ (पौध संरक्षण), कृषि विज्ञान केन्द्र, गूंता-बानसूर, अलवर, राज.
  • अरविन्द कुमार वर्मा
    विषय वस्तु विषेशज्ञ (पशुपालन), कृषि विज्ञान केन्द्र, गूंता-बानसूर,अलवर, राज.
  • डॉ. सुशील कुमार शर्मा
    प्रधान वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केन्द्र,गूंता-बानसूर,अलवर,राज.

 

7 सितम्बर 2022, कपास को कीट, मूंगफली को रोगों से बचायें –

कपास

जीवाणु अंगमारी रोग (कपास में काला बाह्य रोग)

यह एक फफूंद जनित रोग है। हालांकि यह फफूंद मुख्यत: नवजात पौधों में जड़ गलन रोग फैलाता है। झुलसा रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर भूरे व अनिश्चित आकार के धब्बों के रुप में उभरते है जो कि बाद में बढक़र पत्ती को झुलसा देते है। रोगजनक के अनुकूल नमी वाले मौसम में फफूंद की वृद्धि तने पर दिखाई देती है। इससे बचाव हेतु 120 पीपीएम स्ट्रैप्टोसाइक्लिीन + 0.3 प्रतिशत कॉपर आक्सीक्लोराइड प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर 70-80 दिन की फसल अवधि पर करें। आवश्यकतानुसार दोहरायेंं।

जैसिड/सफेद मक्खी

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यह एक रस चूसक कीट है जोकि फसल के प्रारंम्भिक अवस्था से ले कर टिंडें बनने तक पौधों को ग्रसित शिशु व वयस्क कीट पत्ती की निचली सतह से रस चूसकर फसल को हानि पहुंचाते हैं। इनके प्रकोप से पत्तियाँ सिकुड़क़र नीचे की तरफ मुड़ जाती है और लाल होकर अंतत: सूखकर गिर जाती है। सफेद मक्खी के शिशु व वयस्क दोनों ही कली पत्तियों एवं शाखाओं से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। ग्रसित पत्तियाँ ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं एवं पौधों पर मधु स्त्राव करते हंै, जिससे कि पत्तियाँ पर काली फफूंदी आने लगती है और पौधों में भोजन बनने की क्षमता कम हो जाती है। सफेद मक्खी कपास में मरोडिय़ा रोग को भी फैलाता है। इन कीटों के प्रबंधन के लिए नीम तेल 0.03 प्रतिशत 3-5 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें। आर्थिक क्षति स्तर के आधार पर इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 0.3 मिली/ लीटर या एसिटामिप्रिड 20 एसपी 0.4 मिग्रा/ लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।

मिली बग

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यह एक सर्वभक्षी कीट है जोकि वानस्पतिक अवस्था से लेकर फूल व टिण्डे लगने तक ग्रसित करता है। इसके प्रकोप से पौधे में विकृत, सिकुडऩ एवं झाड़ जैसे दिखते है एवं पौधों में विकास रुक जाता है। गंभीर रुप से संक्रमण होने पर पौध पूरी तरह से नष्ट हो जाते है। ये कीट पौधे के पृष्ठीय भाग पर होने के कारण इन पर कीटनाशकों का कम प्रभाव पड़ता है। प्रबंधन के लिए चीटिंयों का नियंत्रण करें क्योंकि मिलीबग चीटिंयों की सहायता से एक खेत से दूसरे खेत में फैलती है। इसके लिए खेत के चारों तरफ घेरा बनायें और फिर क्विनालफॉस डस्ट का प्रयोग करें। मिली बग से ग्रसित खेत में काम मे लिए गये औजारों की सफाई करके ही अन्य खेत में लेकर जाए। प्रबंधन के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 20 ईसी 2.0 मिली/लीटर पानी या इमामैक्टिन बैंजोएट 5 एसजी 0.5 ग्राम/लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।

कपास का धूसर/डस्की कॉटन बग

वयस्क 4-5 मिमी लंबे राख के रंग के या भूरे रंग व मटमैले सफेद पंखों वाले होते हैं। निम्फ छोटे व पंख रहित होते हैं। शिशु व वयस्क दोनों ही कच्चे बीजों से रस चूसते हैं जिससे वे पकते नहीं तथा वजन में हल्के रह जाते हैं। गिनिंग के समय कीटों के पिचक कर मरने से रुई की गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा बाजार भाव कम हो जाता है। प्रबंधन के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 20 ईसी 2.0 मिली/लीटर पानी या इमामैक्टिन बैंजोएट 5 एसजी 0.5 ग्राम/लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।

मूंगफली

कॉलर रॉट
यह रोग 50 दिन की फसल अवधि पर सबसे जयादा लगता है इस रोग से बीज में गलन अंकुरण से पहले या अंकुरण के बाद हो सकता है ग्रसित पौधों की पत्तियां पीली पडऩे लग जाती है एवं जमीन से लगे तने पर कमरबंध बन जाता हैं यह रोग 50 दिन की फसल अवधि पर सबसे जयादा लगता है इस रोग से बीज में गलन अंकुरण से पहले या अंकुरण के बाद हो सकता है ग्रसित पौधों की पत्तियां पीली पडऩे लग जाती है एवं जमीन से लगे तने पर कमरबंध बन जाता है। जड़ धीरे धीरे काले पडऩे लग जाता है। रोग का प्रबंधन के लिए 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर पौधों के कतार में भिगोंना (स्रह्म्द्गठ्ठष्द्धद्बठ्ठद्दद्ध) करें।

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टमाटर व मिर्च

पर्ण कुंचन व मोजेक विषाणु रोग

यह रोग मुख्यत: टमाटर व मिर्च दोनों में लगते है। पर्ण कुंचन रोग के प्रकोप से पत्ते सिकुड़ कर मुड़ जाते हैं व छोटे रह जाते हैं व झुर्रियां पड़ जाती हैं। मोजेक रोग के कारण पत्तियों पर गहरे व हल्का पीलापन लिये हुए धब्बे बन जाते हैं। यह रोग कीट के द्वारा प्रसारण होते हंै। प्रबंधन के लिए रोग से ग्रसित पौधे दिखाई देते ही उखाड़ कर नष्ट कर दें। फूल आने के बाद मैलाथियान 50 ईसी 1 मिली प्रति लीटर के हिसाब से छिडक़ाव करें। यह छिडक़ाव 15-20 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार दोहरायें।

झुलसा रोग (ब्लाइट)

यह एक फफंूद रोग है। इस रोग से टमाटर के पौधों की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है । यह रोग मुख्यत: दो प्रकार का होता है।

अगेती झुलसा

इस रोग में धब्बों पर गोल -गोल छल्ले नुमा धारियां दिखाई देती है।

पिछेती झुलसा

इस रोग से पतियों पर जलीये भूरे रंग के गोल अनियिमित आकर के बनते है जिनके कारण अंत में पतियां पूर्ण रूप से झुलस जाती है। प्रबधंन हेतु 2 ग्राम मैन्कोजेब या 3 ग्राम कॉपरआक्सीक्लोराईड या 2 ग्राम रिडोमिल एम.जेड. प्रति लीटर पानी के घोल का छिडक़ाव करें। आवश्यकतानुसार 5-7 दिन के बाद इन्हीं दवाईयों को दोहरायेंं।

थ्रिप्स

thips

यह कीट मुख्यत: टमाटर व मिर्च के पौधों को ग्रसित करता है व पौधों के कोमल भाग से रस चूसकर काफी नुकसान पहुंचाते है। इसके प्रकोप से फसलों के उत्पादन में 12-20 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। प्रबंधन हेतु 1 मिली डायमिथिएट 30 ईसी या 1 मिली मेलाथियॉन 50 ईसी या 1 मिली मिथाइल डिमेटॉन प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर छिडक़ाव करें। आवश्यकतानुसार 5-7 दिन के बाद इन्हीं दवाईयों को दोहरायें।

पशुओं में लंपी स्किन रोग

lumpi skin

यह बीमारी एलएसडी वायरस द्वारा पशुओं में फैलती है जिसे सामान्य भाषा में पशुपालक गांठदार त्वचा रोग कहते हैं। यह रोग गाय और भैंसों को सामान्यत: अपनी चपेट में लेता है। एलएसडी वायरस एक पशु से दूसरे पशुओं में खून चूसने वाले मक्खी, मच्छर, चींचड़, जूं इत्यादि से फैलता है। इस रोग से पशुओं के शरीर पर गांठें बन जाती हंै मुख्य: रुप से गर्दन, थन एवं जननांगों के आस-पास गांठें दिखाई देती हैं। पशुओं में बुखार होना, नाक व आंखों से पानी आना, पशुओं द्वारा खाना पीना बंद कर देना, दुधारु पशुओं में दूध उत्पादन कम हो जाना, ग्याभन पशुओं में गर्भपात होना, पशुओं का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना इत्यादि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं। इस रोग का कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। बीमारी से ग्रसित पशुओं को पशु चिकित्सक की सलाह से एंटीबायोटिक एनरोफ्लाक्सासिन 3-5 मिलीग्राम या आक्सीटेटरासाइक्लिन 5-7 मिलीग्राम प्रति किलो भार के हिसाब से दी जाये। बुखार के लिए पेरासिटामोल या एनालजीन दवाई देंं साथ में एंटीहिस्टामाइन (फेनरामीन मैलिएट) तथा प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए विटामिन सी एवं त्वचा के जख्म के लिए एंटीसेप्टिक या फ्लाईरिफ्लेन्ट स्प्रे का प्रयोग किया जा सकता है। ग्याभन पशुओं में इस इंजेक्शन का उपयोग नहीं करें। पशुओं को प्रतिदिन 50 ग्राम मिनरल मिक्सर आहार में दें। पशुओं का एवं पशुशाला को साफ -सफाई रखें ताकि मक्खी, मच्छर, चींचड़, जूं इत्यादि पनपने नहीं दें। बीमार पशु को अन्य पशु से दूर रखें एवं डॉक्टर से इलाज करवाएं।

महत्वपूर्ण खबर:15 सितंबर तक पशुओं के आवागमन एवं हाट बाजार पर प्रतिबंध

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