प्रिसिजन फार्मिंग (सटीक खेती): खेती का आधुनिक तरीका
लेखक: राज जैन, बीएससी कृषि, अरूण साहू असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. हिरदेश कुमार असिस्टेंट प्रोफेसर, विक्रांत यूनिवर्सिटी, ग्वालियर
22 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: प्रिसिजन फार्मिंग (सटीक खेती): खेती का आधुनिक तरीका –
परिचय:-
प्रिसिजन फार्मिंग (सटीक खेती) एक आधुनिक कृषि प्रबंधन प्रणाली है जो डेटा-संचालित तकनीकों जैसे जीपीएस, सेंसर, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करती है, ताकि खेत के हर छोटे हिस्से की ज़रूरत के हिसाब से सही मात्रा में पानी, खाद और उर्वरक दिए जा सकें, जिससे लागत कम हो, उपज बढ़े और पर्यावरण का बचाव हो सके। यह अंदाज़े पर निर्भर रहने की बजाय वैज्ञानिक और सटीक तरीके से खेती करने पर ज़ोर देती है, जिससे कम संसाधनों में बेहतर और ज़्यादा मुनाफ़ा होता है।
प्रिसिजन फार्मिंग क्या है?
साधारण शब्दों में कहें तो, प्रिसिजन फार्मिंग का मतलब है— सही समय पर, सही जगह पर, सही मात्रा में खाद, पानी और कीटनाशकों का प्रयोग करना।
पुराने तरीके में हम पूरे खेत में एक समान खाद या पानी डालते हैं, चाहे किसी हिस्से को उसकी जरूरत हो या नहीं। लेकिन प्रिसिजन फार्मिंग में तकनीक की मदद से यह पता लगाया जाता है कि खेत के किस कोने को किस चीज की जरूरतआधुनिक है।
यह कैसे काम करती है? (मुख्य तकनीकें)
- इसमें खेती को स्मार्ट बनाने के लिए कुछ औजारों का इस्तेमाल होता है:
- सेंसर (Sensors): ये मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की जांच करते हैं।
- ड्रोन (Drones): ये ऊपर से फसलों की निगरानी करते हैं और बीमारियों का पता लगाते हैं।
- GPS: इसकी मदद से ट्रैक्टर और मशीनों को सटीक दिशा दी जाती है ताकि कोई जगह छूटे नहीं।
- स्मार्ट सिंचाई: मिट्टी के सूखने पर अपने आप पानी देने वाली मशीनें
प्रिसिजन फार्मिंग के फायदे
- लागत में कमी: जब आप खाद और बीज जरूरत के हिसाब से डालेंगे, तो फिजूलखर्ची कम होगी और पैसा बचेगा।
- ज्यादा पैदावार: पौधों को उनकी जरूरत के अनुसार पोषण मिलने से फसल की क्वालिटी और मात्रा दोनों बढ़ती है।
- पर्यावरण की सुरक्षा: कीटनाशकों और रसायनों का कम इस्तेमाल होने से जमीन और पानी प्रदूषित नहीं होते।
- पानी की बचत: सिंचाई उतनी ही की जाती है जितनी फसल को चाहिए।
कुछ कम लागत वाली तकनीकें
भारतीय परिस्थितियों को देखते हुए, हर किसान के लिए महंगे ड्रोन या सैटेलाइट सिस्टम खरीदना मुमकिन नहीं है। लेकिन कुछ कम लागत वाली तकनीकें (Low-cost Technologies) हैं जिन्हें अपनाकर आप प्रिसिजन फार्मिंग की शुरुआत कर सकते हैं:
1. सॉयल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card)
यह सबसे सस्ती और प्रभावी तकनीक है। अपने खेत की मिट्टी की जांच सरकारी लैब में करवाएं।
फायदा: आपको पता चल जाएगा कि मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है। इससे आप उतनी ही खाद डालेंगे जितनी जरूरत है, जिससे यूरिया और DAP का पैसा बचेगा।
2. लीफ कलर चार्ट (Leaf Color Chart – LCC)

यह प्लास्टिक का एक छोटा सा कार्ड होता है जिसमें हरे रंग की अलग-अलग शेड्स (रंग) होती हैं।
कैसे इस्तेमाल करें: धान या गेहूं की पत्ती के रंग को इस चार्ट से मिलाएं।
फायदा: अगर पत्ती का रंग हल्का है, तभी नाइट्रोजन (यूरिया) डालें। इससे 20-25% यूरिया की बचत हो सकती है।
3. लेजर लैंड लेवलर (Laser Land Leveler)

खेत को समतल करना प्रिसिजन फार्मिंग की पहली सीढ़ी है।
फायदा: जब खेत पूरी तरह समतल होता है, तो पानी हर कोने में बराबर पहुँचता है। इससे पानी की 30% तक बचत होती है और फसल एक समान बढ़ती है। आप इसे किराए पर भी ले सकते हैं।
4. ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई (Drip & Sprinkler)

खुली सिंचाई (Flood Irrigation) की जगह बूंद-बूंद सिंचाई अपनाएं।
फायदा: यह सीधे पौधों की जड़ों तक पानी पहुँचाता है। सरकार इस पर 80% से 90% तक सब्सिडी भी देती है।
5. मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल
आजकल कई फ्री ऐप्स (जैसे Plantix या IFFCO Kisan) उपलब्ध हैं।
फायदा: बस फसल की बीमारी की फोटो खींचकर ऐप पर डालें, वह तुरंत बता देगा कि कौन सी दवा छिड़कनी है। इससे गलत कीटनाशक खरीदने का खर्चा बचता है।
कम लागत में शुरुआत कैसे करें? (टिप्स)
समूह बनाएं: अकेले मशीन खरीदना महंगा है, इसलिए 5-10 किसान मिलकर ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ से मशीनें किराए पर ले सकते हैं।
ट्रेनिंग लें: पास के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) जाकर नई तकनीकों की मुफ्त जानकारी लें।
मशीनों या ड्रिप सिंचाई पर कितनी सब्सिडी मिल रही है?
भारत में प्रिसिजन फार्मिंग और सिंचाई उपकरणों पर सब्सिडी मुख्य रूप से ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) और ‘सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन’ (SMAM) के तहत दी जाती है।
चूंकि हर राज्य में सब्सिडी की राशि थोड़ी अलग हो सकती है, यहाँ एक सामान्य अनुमान दिया गया है:
1. ड्रिप और स्प्रिंकलर (सिंचाई उपकरण)
सरकार पानी बचाने वाली इन तकनीकों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही है:
छोटे और सीमांत किसान (Small/Marginal Farmers): इन्हें कुल खर्च का लगभग 80% से 90% तक सब्सिडी मिलती है। यानी आपको केवल 10-20% पैसा देना होता है।
अन्य किसान (Big Farmers): इन्हें लगभग 45% से 50% तक की सब्सिडी मिलती है।
प्रमुख राज्य: उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा में इसके लिए विशेष ऑनलाइन पोर्टल हैं (जैसे यूपी में ‘पारदर्शी किसान सेवा पोर्टल’)।
2. कृषि यंत्र (Machines) – जैसे लेजर लेवलर, हैप्पी सीडर
व्यक्तिगत किसान: इन मशीनों पर आमतौर पर 40% से 50% की सब्सिडी मिलती है।
किसान समूह (CHCs): अगर 5-10 किसान मिलकर ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ खोलते हैं, तो सरकार 80% तक सब्सिडी देती है (अधिकतम ₹10 लाख से ₹40 लाख तक की मशीनरी पर)।
SC/ST और महिला किसान: इन्हें अक्सर 10% अतिरिक्त छूट दी जाती है।
3. सोलर पंप (PM-KUSUM योजना)
खेत में बिजली के खर्च को जीरो करने के लिए सरकार सोलर पंप पर भारी छूट दे रही है:
इसमें 60% सब्सिडी सरकार (केंद्र + राज्य) देती है।
30% लोन मिल जाता है।
किसान को शुरुआत में केवल 10% खर्च करना पड़ता है !
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