फसल की खेती (Crop Cultivation)

खरीफ की तिल

 

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12 जुलाई 2021,  खरीफ की तिल –

मध्य प्रदेश में तिल की खेती खरीफ मौसम में 315 हजार हे. में की जाती है। प्रदेश में तिल की औसत उत्पादकता 500 कि.ग्रा./हेक्टेयर हैं प्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, सीधी, शहडोल, मुरैना, शिवपुरी, सागर, दमोह, जबलपुर, मण्डला, पूर्वी निमाड़ एवं सिवनी जिलों में इसकी खेती होती है।

भूमि का प्रकार

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हल्की रेतीली, दोमट भूमि तिल की खेती हेतु उपयुक्त होती है। खेती हेतु भूमि का पी.एच. मान 5.5 से 7.5 हो। भारी मिट्टी में तिल को जल निकास की विशेष व्यवस्था के साथ उगाया जा सकता है।
तिल की बोनी मुख्यत: खरीफ मौसम में की जाती है जिसकी बोनी जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक करनी चाहिये। ग्रीष्मकालीन तिल की बोनी जनवरी माह के दूसरे पखवाड़े से लेकर फरवरी माह के दूसरे पखवाड़े तक करना चाहिए। बीज को 2 ग्राम थायरम+1 ग्रा. कार्बेन्डाजिम, 2:1 में मिलाकर 3 ग्राम/ कि.ग्रा. फफूंदनाशी के मिश्रण से बीजोपचार करें। बोनी कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा कतारों में पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. रखते हुये 3 से.मी. की गहराई पर करें।

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उर्वरक प्रबंधन

मध्य प्रदेश में तिल उत्पादन हेतु नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश की अनुशंसित मात्रा इस प्रकार मात्रा (कि.ग्राम./हे.) है।

अवस्था         नत्रजन         स्फुर     पोटाश
सिंचित           60             40         20
असिंचित        40             30         20

  • स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बोनी करते समय आधार रूप में दें। तथा शेष नत्रजन की मात्रा खड़ी फसल में बोनी के 30-35 दिन बाद निंदाई करने उपरान्त खेत में पर्याप्त नमी हाने पर दें।
  • स्फुर तत्व को सिंगल सुपर फास्फेट के माध्यम से देने पर गंधक तत्व की पूर्ति (20 से 30 कि.ग्रा./हे. ) स्वमेव हो जाती है।
  • सिंचाई एवं जल प्रबंधन- तिल की फसल खेत में जलभराव के प्रति संवेदनशील होती है। अत: खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित करें। खरीफ मौसम में लम्बे समय तक सूखा पडऩे एवं अवर्षा की स्थिति में सिंचाई के साधन होने पर सुरक्षात्मक सिंचाई अवश्य करें।
  • फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये सिंचाई हेतु क्रांतिक अवस्थाओं यथा फूल आते समय एवं फल्लियों में दाना भरने के समय सिंचाई करें।
कटाई गहाई एवं भडारण

पौधों की फलियाँ पीली पडऩे लगे एवं पत्तियाँ झडऩा प्रारम्भ हो जाये तब कटाई करें। कटाई करने उपरान्त फसल के ग_े बांधकर खेत में अथवा खालिहान में खड़े रखें। 8 से 10 दिन तक सुखाने के बाद लकड़ी के डन्डों से पीटकर तिरपाल पर झड़ाई करें। झड़ाई करने के बाद सूपा से फटक कर बीज को साफ करें तथा धूप में अच्छी तरह सुखा लें। बीजों में जब 8 प्रतिशत नमी हो तब भंडार पात्रों में /भंडारगृहों में भंडारित करें।

संभावित उपज

उपरोक्तानुसार बताई गई उन्नत तकनीक अपनाते हुऐ काश्त करने एवं उचित वर्षा होने पर असिंचित अवस्था में उगायी गयी फसल से 4 से 5 क्विंटल तथा सिंचित अवस्था में 6 से 8 क्वि./हे. तक उपज प्राप्त होती है।

अधिक उपज प्राप्त करने हेतु प्रमुख बिंदु
  • कीट एवं रोग रोधी उन्नत किस्मों को टीके.जी. 308,टीके.जी. 306, जे.टी-11, जे.टी-12, जे.टी.एस.-8, बीजोपचार-बीज को 2 ग्राम थायरम 1 ग्रा. कार्बेन्डाजिम 2:1 में मिलाकर 3 ग्राम/कि.ग्रा., नामक फफूंदनाशी के मिश्रण से बीजोपचार करें।
  • बोनी कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा कतारों में पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. रखते हुये 3 से.मी. की गहराई पर करें।
  • अंतरवर्तीय फसल तिल, उड़द/मूंग 2:2, 3:3, तिल+सोयाबीन 2:1, 2:2, को अपनायें
  • सिंचाई एवं जल प्रबंधन- तिल की फसल खेत में जलभराव के प्रति संवेदनशील होती है। अत: खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित करें। खरीफ मौसम में लम्बे समय तक सूखा पडऩे एवं अवर्षा की स्थिति में सिंचाई के साधन होने पर सुरक्षात्मक सिंचाई अवश्य करें
  • फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये सिंचाई हेतु क्रान्तिक अवस्थाओं यथा फूल आते समय एवं फल्लियों में दाना भरने के समय सिंचाई करें
  • बोनी के 15-20 दिन पश्चात् पहली निंदाई करें तथा इसी समय आवश्यकता से अधिक पौधों को निकालेें। नींदा की तीव्रता को देखते हुये दूसरी निंदाई आवश्यकता होने पर बोनी के 30-35 दिन बाद नत्रजनयुक्त उर्वरकों का खड़ी फसल में छिडक़ाव करने के पूर्व करें।
महत्वपूर्ण है बीज अंकुरण परीक्षण

मानसून की शुरुआत से पहले, सोयाबीन के बीज का अंकुरण परीक्षण किया जाना चाहिए। किसान इसे अपने घर में टॉवल पेपर में कर सकते हैं या जूट के थैले साफ पानी में डुबोकर और बेतरतीब ढंग से इकट्ठा किए गए 1000 बीजों को जूट के थैले या तौलिया पेपर पर अच्छी तरह से व्यवस्थित लाइनों में डाला जा सकता है और इसको अच्छी तरह से घुमाया जा सकता है और इसको सीधे सूर्य के प्रकाश से दूर संरक्षित कमरा में रखा जा सकता है। चार-पाँच दिनों के बाद जुट के थैले को खोलकर स्वस्थ जर्म ट्यूब को गिना जा सकता है। इच्छानुसार पौधे की आबादी प्राप्त करने के लिए अंकुरण परीक्षण बहुत महत्वपूर्ण है।

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नींदा नियंत्रण

बोनी के 15-20 दिन पश्चात् पहली निंदाई करें तथा इसी समय आवश्यकता से अधिक पौधों को निकालें। नींदा की तीव्रता को देखते हुये दूसरी निंदाई आवश्यकता होने पर बोनी के 30-35 दिन बाद नत्रजनयुक्त उर्वरकों का खड़ी फसल में छिडक़ाव करने क पूर्व करें।

रसायनिक विधि से नींदा नियंत्रण
नींदा नाशक  दवा की  व्यापारिक मात्रा/हे. उपयोग का समय उपयोग करने की विधि 
फ्लूक्लोरोलीन (बासालीन) 1 ली./हे.  बुवाई के ठीक पहले मिट्टी में मिलायें। रसायन के छिडक़ाव के बाद मिट्टी में मिला दें।
पेन्डीमिथालीन 500-700  मि.ली./हे. बुवाई के तुरन्त बाद किन्तु अंकुरण के पहले 500 ली. पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें
क्यूजोलोफाप इथाईल 800 मि.ली./हे. बुवाई के 15 से 20 दिन बाद 500 ली. पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें
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