तिलहनी फसलों में गंधक का महत्व

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  • डॉ. प्रियंका कुमावत
    सहायक प्राध्यापक, श्री कर्ण नरेंद्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर
  • डॉ. वर्षा कुमारी ,पंकज कुमार
    सहायक प्राध्यापक, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार

11 मई 2022, तिलहनी फसलों में गंधक का महत्व – तिलहन फसलों में गंधक तेल निर्माण के लिये आवश्यक होने के कारण इन फसलों के लिये यह अद्वितीय तत्व माना गया है। गंधक के उपयोग पर विशेष ध्यान न दिये जाने के कारण तिलहन उत्पादन वाले क्षेत्रों में लगभग 41 प्रतिशत मृदाओं में गंधक की कमी देखी गई है। गंधक प्रमुख द्वितीयक पादप पोषक तत्वों में से एक है। एक औसत फसल द्वारा फास्फोरस के बराबर गंधक अवशोषित की जाती है। पिछले कुछ वर्षों से संतुलित उर्वरकों में केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश को ही महत्ता दी गयी तथा गंधक तत्व की उपयोगिता पर ध्यान न दिए जाने के कारण भारतीय मृदा नमूनों में 40 प्रतिशत तक गंधक की कमी पायी गयी है। गंधक सभी प्रकार की फसलों के लिए लाभदायक है परन्तु तिलहनी फसलों के लिए बहुत ही प्रभावी व उनकी गुणवत्ता को बढ़ाने वाला पोषक तत्व है। अत: गंधक की कमी को दूर करके तिलहनी फसलों से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

मृदा में गंधक की कमी के प्रमुख कारण
  • फसलों के द्वारा गंधक का भारी दोहन।
  • अधिक उत्पादन के उद्देश्य से उगाने वाली फसलों को हल्की भूमि पर उगाने में गंधक-मुक्त खाद की ओर झुकाव।
  • गंधक दोहन तथा गंधक की भूमि में आपूर्ति के अंतर का बढऩा।
  • उर्वरक तथा जैविक खाद का कम उपयोग।
  • मुख्य तत्व नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटेशियम वाली खाद को अधिक महत्व।
  • कुल गंधक की कमी, कुल जैविक खाद की कमी तथा गंधक का निक्षालन तथा अपरदन।
  • नहरी जल से सिंचाई जिसमें गंधक की कमी पाई जाती है।
तिलहनी फसलों में गंधक की कमी के लक्षण

गंधक की कमी के लक्षण सर्वप्रथम नई पत्तियों पर दिखाई देते हैं। पत्तियाँ पीली हरे रंग की, तने पतले तथा कमजोर जड़े कड़ी हो जाती हैं जिससे पौधों की वृद्धि रूक जाती है। बाद में अधिक कमी की दशा में पूरा पौधा पीला पड़ जाता है। गंधक की कमी वाले पौधे बौने एवं कमजोर रहने से परिपक्वता देरी से आती है परिणामस्वरूप उपज में कमी के साथ-साथ गुणवत्ता भी घट जाती है।

सरसों: गंधक की कमी से पत्तियां सीधी खड़ी हुई तथा अंदर की ओर मुड़ी हुई दिखाई देती हैं। प्रारम्भ में नई पत्तियों की निचली सतह पर लाल रंग बनता है, बाद में ऊपरी सतह पर भी आ जाता है।

सोयाबीन: शुरूआत में नई पत्तियां हल्की पीली हो जाती है परन्तु पुरानी पत्तियां सामान्य रहती है। कुछ समय बाद पत्तियां एवं पर्व छोटे आकार के हो जाते हैं एवं सम्पूर्ण पौधा पीला पड़ जाता है।
मूंगफली: नई पत्तियों का फलक छोटा पीला एवं सीधा खड़ा हो जाता है। पत्तियों का त्रिफलक ’’वी’’ आकार का हो जाता है। पौधे छोटे रह जाते हैं एवं मूंगफली कम बनती है जिससे नत्रजन स्थिरीकरण भी कम हो पाता है।
सूरजमुखी: शुरूआत में पुरानी पत्तियां सामान्य रहती है परन्तु कुछ ही समय बाद सम्पूर्ण पौधा पीला हो जाता है। सर्वप्रथम पौधे का शीर्ष भाग प्रभावित होता है। नई पत्तियां झुर्रीदार हो जाती है जिनका रंग हल्का पीला हो जाता है।

गंधक की आवश्यकता

फसलों में गंधक कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों ही रूप में पाया जाता है। यह गंधकयुक्त एमिनो अम्ल सिस्टाइन, सिस्टीन एवं मेथिओनीन तथा प्रोटीन संश्लेषण में आवश्यक होता है। यह सल्फर युक्त विटामिन्स और एंजाइम बनाने में सहायक है और एंजाइम की क्रियाशीलता को उत्प्रेरित करता है। गंधक विभिन्न फसलों की उपज और गुणवत्ता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तिलहनी फसलों में उपज के साथ-साथ तेल की मात्रा में बढ़ोत्तरी लाता है। फसलों में प्रोटीन की मात्रा में वृद्धि करता हैै। गंधक सल्फैडरिल प्रोटीन-एसएच समूह बनाने में सहायक है जो पादप को गर्मी तथा सर्दी प्रतिरोधक बनाने में सहायता करता है। तिलहन फसलों में विशेषत: सरसों में यह आइसोसाइनेट तथा सल्फोऑक्साइड के निर्माण में मदद करता है जिससे उत्पाद में विशेष गंध आती है। गंधक कार्बोहाइड्रेट उपापचय को नियंत्रित करता है तथा तिलहन की बाजार कीमत को बढ़ाता है। यह फसलों में ठंड और पाले से बचनेे की सहनशक्ति को बढ़ाता है। तिलहनी फसलों में गंधक की सापेक्षिक संवेदनशीलता क्रमश: इस प्रकार है- राई, सरसों, अलसी, तिल। न ही केवल फसल अपितु उनकी किस्में भी गंधक की कमी के प्रति संवेदनशीलता में भिन्न होती है। राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर पर किये गये विभिन्न परीक्षणों के परिणामों से पता चलता है कि गंधक के उपयोग से सरसों में 8.5 प्रतिशत में मूंगफली में 5.1 प्रतिशत सूरजमुखी में 3.6 प्रतिशत, राई में 7.3 प्रतिशत और सोयाबीन में 6.8 प्रतिशत तेल की बढ़ोत्तरी होती है।

गंधक प्रयोग का समय व तकनीक

सामान्यतया अधिकांश फसलों में गंधक का प्रयोग 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से किया जाता है। यदि मृदा अम्लीय है तो अमोनियम सल्फेट तथा पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग उपयुक्त रहता है। इसके विपरीत क्षारीय मृदा में जिप्सम या सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करना चाहिए। जिन स्थानों में तात्विक गंधक या पाइराइट काम में लाया जावे वहॉं के लिये बुवाई से 2 से 4 सप्ताह पूर्व ही खेत में डाल देना चाहिए। इतने समय में जब तक पौधे बड़े होंगे तब तक गंधक मिट्टी में घुल-मिलकर पौधों द्वारा अवशोषित करने योग्य हो जायेगा। अच्छी पैदावार लेने के लिये सिंगल सुपर फास्फेट तथा जिप्सम का प्रयोग कई भागों में करना चाहिए जिससे गंधक व चूना भरपूर मिल सके। जब यूरिया व डीएपी का उपयोग किया जाना है तो गंधक की आवयश्कता को तत्वीय गंधक, आयरन सल्फेट, जिंक सल्फेट, बायोसल्फर एवं जिप्सम से पूरा किया जाना चाहिए। इनमें जिप्सम गंधक का सबसे सस्ता व सर्वोत्तम स्त्रोत है। गंधकधारी उर्वरकों में गंधक सल्फेट के रूप में होने के कारण पौधों द्वारा शीघ्र एवं आसानी से ग्रहण कर लिया जाता है इसलिए इन उर्वरकों को बारीक करना आवश्यक नहीं है। यदि गंधक बारीक चूर्ण के रूप में हो तो उसे बुवाई के 20-25 दिन पूर्व खेत में डालने से अधिक प्रभाव रहता है। खड़ी फसल में इसके प्रयोग से वांछित परिणाम नहीं मिलते है क्योंकि बारीक चूर्ण के गंधक सल्फेट के रूप में बदलने में समय लगता है तथा इसका प्रभाव धीरे-धीरे पड़़ता है।

किसान भाई इस बात का ध्यान रखें कि खेतों में गंधक की कमी एक वास्तविक समस्या है और इसे शीघ्र ही ठीक किया जाना चाहिए। अत: गंधक युक्त उर्वरकों का उपयोग करके खेतों में गंधक की कमी को दूर किया जा सकता है और तिलहनी फसलों से अधिक से अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

 

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