बीज की गुणवत्ता बनाये रखने बीजोपचार का महत्व

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  • डॉ. शिखा शर्मा, मो. : 7566880568
  • डॉ. गौरव महाजन , डॉ. वी.के. पराडक़र , डॉ. अशोक राय
    आंच. कृषि अनु. केन्द्र, चंदनगांव छिंदवाड़ा
    जवाहरलाल नेहरू कृषि महाविद्यालय, जबलपुर (म.प्र.)

1 जुलाई 2022, बीज की गुणवत्ता बनाये रखने बीजोपचार का महत्व किसी भी फसल की बोनी के पूर्व हमारी लालसा तो अवश्य रहती है कि पिछले वर्ष से अधिक आमदनी हो। इस लालसा के पूर्व हमें क्या करना चाहिए, इसकी पूर्ण जानकारी होना भी अति आवश्यक है। आज के चहुंमुखी प्रगतिशील कृषि के उद्योग में बीज की शुद्धता का एक विशेष महत्व है। अब सवाल यह उठता है कि शुद्धता से क्या तात्पर्य है? एक कहावत भी है जैसा बोयेंगे वैसा-काटेंगे। कहने का तात्पर्य है कि जो बीज बोने के उपयोग में लाना है वह एक ही प्रकार का हो। उसमें अन्य कोई दूसरे बीजों का मिश्रण घास तथा अन्य फसलों के बीज न हो। इसके अलावा अविकसित टूटे-फूटे, सिकुड़े, छोटे बीज तथा फफूंदों के बीजाणु जैसे गाल्स, स्कलैरोशिया, स्मट बाल्स नहीं होने चाहिए। अगर है तो इनको छलनी से छानकर व हवा में सूपे से उड़ाकर अलग कर लें।

बीज की गुणवत्ता, शुद्धता का परीक्षण करने नमूने कैसे इकट्ठे करें

उपर्युक्त परीक्षण करने के लिए सर्वप्रथम बीज के नमूने इकट्ठे  करें। नमूना प्राप्त करने के लिए बीजों की मात्रा देखी जाती है। मान लीजिए की बीज पांच क्विंटल है तो ढेर में ले या बोरे में से अलग-अलग सतह से और हिस्सों से बीज के पांच नमूने इकट्ठे करें। फिर इन नमूनों को मिला लें। इस मिले हुए नमूने को संग्रहित नमूना कहते हैं। इस भेजे गये नमूने से जितना बीज परीक्षण हेतु चुना जाता है उसे काम करने वाला नमूना कहा जाता है।

बीजों की अंकुरण परीक्षण के तरीके

बीजों के अंकुरण परीक्षण करने के लिए चार सौ बीजों की आवश्यकता होती है। वैसे प्रयोगशाला में अंकुरण परीक्षण की कई विधियां हंै पर कृषक भाई स्वयं घर में आसानी से कर सकें, उन्हीं तरीकों का उल्लेख किया जा रहा है। परीक्षण करने के तीन तरीकों में सर्वप्रथम तो तीन-चार पेपर के नीचे तरफ से तौलिया रखकर या स्याही सोख (ब्लटिंग पेपर) वाला कागज लें और पानी से तर करके बीज को रख दें। इसके अलावा एक तरीका यह भी है कि एक स्याही सोख वाले कागज को गीला करें फिर उसके ऊपर कतार से बीज को जमा दें, (दस बीजों की दस कतारें) और फिर उसके ऊपर दूसरा स्याही सोख कागज रखें और पानी से तर करके उसको मोड़ दें। कागज के अलावा रेत को तर करने के बाद 1-2 सेमी. नीचे बीज रखकर अंकुरण क्षमता देखी जा सकती है।

बीज अंकुरण के समय ध्यान देने योग्य बातें

बीज अंकुरण क्षमता के परीक्षण के समय फसल के अनुसार तापक्रम व प्रकाश की व्यवस्था भी प्राकृतिक रूप से हो। साथ ही बीज अंकुरित की अवधि भी फसल बीज के अनुसार निश्चित रखें। अंकुरण क्षमता में सामान्य पौधे असामान्य पौधे कड़े बीज एवं अंकुरित न होने वाले बीजों की गणना की जाती है। इस प्रकार के परीक्षण से कितनी बीज की मात्रा अमुक क्षेत्रफल के लिए लगेगी निश्चित किया जा सकता है। मतलब की बीज की मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है।
बीज अनेक सूक्ष्मजीवों का आधार है, जिससे की अनेक रोग जैसे बीज सडऩ, जड़ सडऩ, पौधे गलन, पर्णचित्ती, झुलसन, कंडुआ रोग फैला सकते हंै। इसलिए बीज बोने से पहले बीज को उपचारित करना अधिक उत्पादन के लिए अति आवश्यक है।

बीजोपचार से लाभ
  • बीज को सडऩे से बचाता है।
  • अंकुरण में वृद्धि।
  • आरंभिक अवस्था में पौधों की रोगों से सुरक्षा।
  • पौधे संरक्षण का सरल एवं विश्वसनीय उपाय।
बीजोपचार की विधियां

नमक के घोल का उपचार – फफूंद के बीजाणु जैसे स्कलैरोशिया बाल्स (स्मट) गाल्स (कृमिजीव) को अलग करने के लिए नमक के 20 प्रतिशत घोल यानि कि 20 किलो नमक 100 लीटर पानी में बीज को डुबोयें। रोगजनक अंश तथा हल्के खराब बीज पानी की सतह पर इक_े हो जायेंगे। इन्हें सावधानी से अलग कर लें। तलहटी में बैठे बीजों को पानी में धोकर सुखाने के बाद बोने के प्रयोग में ला सकते हंै।

फफूंदनाशक दवाओं से बीजोपचार – फफूंद नाशक दवाओं से बीजोपचार करने पर बीज के चारों ओर एक कवच सा बन जाता है जिससे कि बीज फफूंद के रोग जनक प्रभाव से बच जाता है। ये फफूंदनाशक औषधियां दो प्रकार की होती हैं।

दैहिक दवा:- से बीज के अंदर पाई जाने वाली फफूंदों को नष्ट किया जा सकता है। उदाहरण के लिये वेविस्टिन, वीटावैक्स, बेनलेट। इन दवाओं का ड़ेढ से दो ग्रा./कि. बीज के हिसाब से उपयोग करें।

अदैहिक दवा:- से बीज के ऊपर की सतह में उपस्थित फफूंद नष्ट होती है। प्रमुख दवा थाइरम, कैप्टान, डाइथेन एम 45, एग्रोसान जी.एन. आदि। इन दवाओं से 3 ग्राम/कि. बीज की दर से बीजोपचार करें।

उपर्युक्त दवाओं से बीजोपचार दो प्रकार से कर सकते हैं –

सूखी (शुष्क) विधि:– बीज तथा फफूंदनाशी दवा की उपर्युक्त मात्रा को बीजोपचार ड्रम डालकर 10 मिनिट तक घुमायें। ड्रम न हो तो घड़े में भी कर सकते हंै। घुमाने से बीजों पर दवा की हल्की परत बन जाती है। इस प्रकार से उपचारित बीज को बोनी के प्रयोग में लें।

गीली विधि:- मिट्टी अथवा प्लास्टिक के बर्तन में बीज तथा दवा की आवश्यक मात्रा लेकर पानी में घोल लें। बीजों को 5-10 मिनिट तक घोल में डुबाकर रखें तथा छाया में सुखाकर बोनी करें। यह विधि विशेष तौर पर आलू, घुइयां, गन्ने एवं पान के लिए उपयोगी है।
जीवाणु कल्चर का प्रयोग:- दलहनी फसलों में फफूंदनाशक दवा द्वारा बीजोपचार के बाद जीवाणु कल्चर से उपचारित करें।

सावधानियां
  •  सही दवा, मात्रा एवं विधि के अनुसार बीजोपचार करें।
  • उपचारित बीज की बोनी नमीयुक्त भूमि में करें।
  • उपचारित कल्चर से उपचारित बीज की बोनी जल्दी करें एवं धूप से बचायें।
  • उपचारित बीज को स्वयं या जानवरों के खाने में प्रयोग में न लाये।
  • दवा के खाली पैकेटों तथा बीजोपचार में लाये गये डिब्बों, घड़ा या अन्य सामान को नष्ट करें।बीजोपचार करते समय हाथों में दस्तानों का उपयोग करें एवं नाक-मुंह पर कपड़ा लपेट लें।फसल का नियमित अवलोकन करें एवं रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही विशेषज्ञों से संपर्क स्थापित कर उचित कार्यवाही करें।
खरीफ बोनी पूर्व भूमि की तैयारी कैसे करें

भूमि शोधन – जिस प्रकार से बीजोपचार द्वारा बीज को शोधित करते हैं उसी प्रकार भूमि शोधन भी हम प्राकृतिक रूप से कर सकते हैं। यह विधि सौर्य उर्जाकरण अर्थात् सोलराइजेशन के नाम से जानी जाती है। इस विधि में भूमि में पानी देकर गर्मियों में करीब एक माह के लिए पारदर्शी पॉलीथिन शीट से ढक देते है। ऐसा करने से उस भूमि का तापक्रम और अधिक हो जाता है। दूसरी विधि में जमीन की गहरी जुताई करके गर्मियों में भूमि को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। प्रकृति ने सूर्य की रोशनी हमें बहुतायत दी है, यह हमारे ऊपर है कि हम उसका कितना और कहां सदुपयोग कर सकते हैं। इन दोनों विधियों के कई फायदे हैं।

  • भूमिगत फफूंदों के बीजाणु मर जाते हंै जो कि पुन: फसल में आक्रमण करने योग्य नहीं होते है, उनकी संख्या घट जाती है।
  • कीड़े और अंडे, अधिक तापक्रम से मर जाते हंै।
  • विभिन्न प्रकार के घास के बीज भी निष्क्रिय हो जाते हैं।
  • भूमि को अधिक उपजाऊ बनाता है।
  • फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है।

प्रथम विधि को बड़े क्षेत्र में करना महंगा पड़ता है। अत: जिस भूमि में पौधे (नर्सरी) तैयार करनी हो उदाहरर्णीय कि फलों की फूलों वाले पौधे या जड़ी-बूटी पौधे, उस भूमिखण्ड को इस विधि के माध्यम से भूमि का शोधन कर सकते हंै। दूसरी विधि तो खरीफ की कोई भी फसल लेने से पहले गर्मियों में भूमि की गहरी जुताई कर भूमि शोधन करने से उत्पादन में वृद्धि होगी।

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