खेती में औषधि फसलों का महत्व

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खेती में औषधि फसलों का महत्व – मानव समाज द्वारा रोगों के उपचार के लिये औषधि पौधों के उपयोग का इतिहास सदियों से पुराना रहा है। उन दिनों पौधों के औषधि गुणों की चर्चा गुरू-शिष्य परम्परा आधारित होती थी। जब गुरू के द्वारा दिया गया मौखिक ज्ञान शिष्यों को याद रखना होता था तथा अगली पीढ़ी को उनके बारे में अवगत कराना होता था। हमारे वेदों से लेकर रामायण तथा महाभारत तक तत्कालीन लेखों में औषधि पौधों के तत्वों तथा उनके उपयोग विभिन्न रोगों के लिये करने की विधियां अंकित थीं। इसके उपरांत आज से 2200-2700 वर्ष पूर्व चरक तथा सुश्रुत ने क्रमश: अपने लेखों मेें औषधि पौधों का महत्व तथा उनकी उपयोगिता विधि पर चर्चा की गई। रामायण में जब लक्ष्मण को मेघनाथ द्वारा शक्ति के उपयोग से मुर्छित किया गया तब लंका के अनुभवी राजवैद्य श्री सुसेन द्वारा हिमालय पर्वत पर पैदा होने वाली औषधि संजीवनी पौध का उल्लेख आज भी ताजा है। औषधि पौधों से प्राप्त तत्वों का उपरोक्त आज केवल आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली तक ही सीमित नहीं है। बल्कि विश्व में करीब 75 से लेकर 80 प्रकार के औषधि पौधों के तत्वों का उपयोग एलोपेथी से किया जा रहा है। इनमें से लगभग 30-35 प्रकार के पौधों से बनी अंग्रेजी दवाईयां आज देश के किसी भी मेडिकल स्टोर से प्राप्त की जा सकती हैं। जो गोलियां, सीरप, इंजेक्शन, लोशन इत्यादि के रुप में समाज इसका उपयोग करके लाभ प्राप्त कर रहा है। इन औषधि पौधों में प्रमुख है सदाबहार, रजनीगंधा, कोंच, कलिहार, सतावर, सनाय, लावची, ग्वारपाठा तथा बैलाडोना इत्यादि। वर्तमान में एलोवेरा भी औषधियों के तत्काल प्रभाव का प्रभाव सभी लोगों पर है परंतु उन दवाओं का असर शरीर पर विपरीत हो रहा है यह भी सर्वमान्य है। यही वजह है कि हमारी धरोहर से कीमती औषधि पौधों को हम सहेजकर रखें और उनका उपयोग करके बिना किसी विपरीत असर के रोगों से मुक्ति प्राप्त कर सकें। इसके लिये जरुरी है कि हर कृषक अपनी खेती के कुछ भाग में औषधि फसल लगाकर स्वयं की आर्थिक स्थिति में सुधार लाये तथा समाज की मदद भी करे। वर्तमान में हमारे प्रदेश में औषधि फसलों का रकबा लगभग 14,26,441 लाख हेक्टर है। तथा उत्पादन लगभग 227.08 लाख टन है परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि इतने विशाल कृषि के क्षेत्र में से बहुत ही सीमित क्षेत्र में औषधि फसलों का उत्पादन किया जा रहा है। जबकि प्रदेश की जलवायु भूमि तथा वर्षा सभी प्रकार की औषधि फसलों को पैदा करने के लिए उपयुक्त है। औषधि फसलों की खेती के लिये शासन द्वारा भरपूर अनुदान की पात्रता उपलब्ध है। इसके अलावा प्रदेश में फैले कृषि विश्व विद्यालय उनके अधिनस्थ कृषि तथा उद्यानिकी महाविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा भारी-भरकम मैदानी कार्यकर्ताओं से पूर्ण उद्यानिकी संचालनालय भी हैं जहां औषधि फसलों को लगाने के तौर-तरीके उनके लिये बाजार व्यवस्था, विश्वनीय पौध सामग्री प्राप्त करने के लिये मार्गदर्शन इत्यादि की व्यवस्था मुफ्त है। देश-प्रदेश में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड भी कृषकों के हित के लिये तत्पर हैं। किसी ने सच कहा है जिन ढूढें तिन चाहिए गहरे पानी पेठ अत: साधन उपलब्ध है अब साध्य के सामर्थ और प्रयास की जरुरत है।

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