फसल की खेती (Crop Cultivation)

धान की फसल को प्रमुख रोगों से कैसे बचाएं? वैज्ञानिक तकनीकों से समझें

07 अक्टूबर 2025, नई दिल्ली: धान की फसल को प्रमुख रोगों से कैसे बचाएं? वैज्ञानिक तकनीकों से समझें – धान भारत की एक प्रमुख अनाज फसल है जिसकी खेती देशभर में व्यापक रूप से की जाती है। किसानों द्वारा वैज्ञानिक तरीके अपनाने के बावजूद, इस समय धान में कई तरह के रोगों की समस्या देखी जा रही है। पूसा संस्थान के विशेषज्ञों ने धान में लगने वाले प्रमुख रोगों, उनकी पहचान और प्रबंधन के तरीकों की विस्तृत जानकारी दी है।

बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (पत्ते का झुलसा रोग)

यह रोग धान की फसल में सबसे आम बीमारियों में से एक है, जिसे सामान्य भाषा में पत्ते का झुलसा रोग कहा जाता है। इस रोग के शुरुआती लक्षण के रूप में पत्तों के ऊपरी सिरे सूखने लगते हैं। धीरे-धीरे यह सूखा हुआ भाग नीचे की ओर फैलता जाता है और आखिर में पूरा पत्ता सूख जाता है।

इस रोग के प्रबंधन के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। साथ ही, स्ट्रेप्टोसाइक्लीन नामकी एंटीबायोटिक की 6 ग्राम मात्रा को 30 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इन दोनों छिड़कावों के बीच 10 से 15 दिनों के बिच करना जरुरी है।

शीथ ब्लाइट रोग

इस रोग की पहचान पानी के स्तर के ऊपर के हिस्से में दिखने वाले धब्बों से होती है। ये धब्बे तने पर दिखाई देते हैं और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ते जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए टेबुकोनाजोल 50% और ट्राईफ्लोक्सीस्ट्राबीन 25% के मिश्रण को 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर छिड़काव करना चाहिए। इस छिड़काव को 10-15 दिन के अंतराल पर एक से दो बार दोहराना आवश्यक होता है।

Advertisement
Advertisement

बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट

यह रोग धान की बालियों को प्रभावित करता है। इसके लक्षण के रूप में दानों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे दाने को भूरा बना देते हैं। कई बार इस रोग से प्रभावित दाने पुष्ट नहीं हो पाते और उनमें दूध नहीं बनता, जिससे दाने चपटे रह जाते हैं।

Advertisement
Advertisement

बालियां निकलने से पहले इस रोग की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। साथ ही स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 6 ग्राम प्रति 30 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। बालियां निकलने के बाद टेबुकोनाजोल 50% और ट्राईफ्लोक्सीस्ट्राबीन 25% के मिश्रण का छिड़काव करना प्रभावी रहता है।

लीफ ब्लास्ट (झोंका रोग)

यह रोग तीन चरणों में देखा जा सकता है। पत्तों पर होने वाले इस रोग में बादामी या भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं, जिनके अंदर का भाग ग्रे रंग का और किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं। तने के नोडल भाग पर लंबे-लंबे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बालियां निकलने के बाद गर्दन के हिस्से पर धब्बे होने से बालियां गिर जाती हैं, जिसे गर्दन तोड़ बीमारी कहा जाता है।

इस रोग के प्रबंधन के लिए ट्राईसाइक्लाजोल 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। वैकल्पिक रूप से टेबुकोनाजोल 50% और ट्राईफ्लोक्सीस्ट्राबीन 25% के मिश्रण को 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है।

इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान भाई धान की फसल को इन प्रमुख रोगों से बचा सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। रोग की पहचान समय पर करना और उचित छिड़काव विधि अपनाना सफल रोग प्रबंधन की कुंजी है।

Advertisements
Advertisement
Advertisement

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

Advertisement
Advertisement
Advertisements
Advertisement
Advertisement