फसल की खेती (Crop Cultivation)

जैविक तरीके से करें लौकी की खेती, कम खर्च में मिलेगा बेहतर उत्पादन

18 जून 2026, नई दिल्ली: जैविक तरीके से करें लौकी की खेती, कम खर्च में मिलेगा बेहतर उत्पादन – लौकी एक बहुपयोगी एवं पोषक तत्वों से भरपूर सब्जी फसल है, जिसकी मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। इसके कच्चे फलों से सब्जियां, जूस और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां तैयार की जाती हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, असम, मेघालय और राजस्थान जैसे राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार लौकी की जैविक खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा देने वाला विकल्प साबित हो सकती है।

जैविक खेती से किसानों को कई लाभ

विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक खेती अपनाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। इससे खेती की लागत घटती है और मिट्टी की जलधारण क्षमता में भी सुधार होता है। साथ ही जल, भूमि और पर्यावरण प्रदूषण कम होने से खेती लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहती है। किसान जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग कर बेहतर गुणवत्ता वाली लौकी का उत्पादन कर सकते हैं।

इन किस्मों से मिलेगा अच्छा उत्पादन

लौकी की उन्नत खेती के लिए पूसा समर प्रोलिफिक लॉन्ग, पूसा मेघदूत, पंजाब लंबी, पंजाब कोमल, अर्का बहार, पंत संकर लौकी-1 और नरेंद्र संकर लौकी-4 जैसी किस्में उपयुक्त मानी जाती हैं। वहीं गोल आकार की लौकी के लिए पूसा मंजरी, पूसा संदेश और हिसार सिलेक्शन गोल किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं। ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई जनवरी से मार्च तथा वर्षाकालीन फसल की बुवाई जून-जुलाई में की जाती है।

खेत की तैयारी और जैविक पोषण प्रबंधन

लौकी की सफल खेती के लिए जीवांशयुक्त हल्की दोमट भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होना आवश्यक है। बेहतर उत्पादन के लिए खेत तैयार करते समय सड़ी गोबर खाद, नाडेप कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करना चाहिए। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए समय-समय पर गौमूत्र, वर्मीवाश और नीम आधारित घोल का छिड़काव भी लाभकारी माना जाता है।

सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान

गर्मी के मौसम में फसल को 4 से 6 दिन के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि वर्षा ऋतु में जरूरत के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार पहली निंदाई बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए, जिससे पौधों का विकास बेहतर होता है। 

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