फसल की खेती (Crop Cultivation)

ओल (जिमीकंद) की फसल में पत्तियां पड़ रही हैं पीली? जानिए कारण और बचाव के वैज्ञानिक उपाय

24 जून 2026, नई दिल्ली: ओल (जिमीकंद) की फसल में पत्तियां पड़ रही हैं पीली? जानिए कारण और बचाव के वैज्ञानिक उपाय – ओल (जिमीकंद/सूरन, वैज्ञानिक नाम Amorphophallus paeoniifolius) की खेती करने वाले किसानों के सामने इन दिनों एक गंभीर समस्या उभर रही है। कई खेतों में पौधों की पत्तियां पीली पड़ रही हैं, उन पर मोजेक जैसे धब्बे दिखाई दे रहे हैं, पौधे सामान्य वृद्धि नहीं कर पा रहे हैं और कंदों का अपेक्षित विकास भी नहीं हो रहा है। इससे उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

पौध रोग विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह, विभागाध्यक्ष, पौध रोग एवं सूत्रकृमि विभाग तथा प्रधान (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल (वैशाली) के अनुसार यह समस्या केवल पोषक तत्वों की कमी का परिणाम नहीं है। इसके पीछे विषाणु (वायरस) जनित रोग, रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप तथा असंतुलित पोषण जैसे कई कारण एक साथ जिम्मेदार हो सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों के निरीक्षण के दौरान उन्होंने ओल की फसल में ऐसे ही लक्षण देखे, जिसके बाद किसानों को समय रहते सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि पत्तियों पर पीले या हरे रंग के अनियमित मोजेक धब्बे दिखाई दें, पौधे बौने रह जाएं और कंदों का विकास रुक जाए, तो इसे सामान्य पोषण की कमी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में खेत का नियमित निरीक्षण करना आवश्यक है।

बचाव के प्रमुख उपाय

स्वस्थ एवं रोग मुक्त बीज कंदों का ही उपयोग करें।
खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें ताकि पौधों की जड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें।
रस चूसने वाले कीट, जैसे एफिड (चेपा) और सफेद मक्खी, वायरस के प्रमुख वाहक होते हैं। इनके नियंत्रण के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार समुचित कीट प्रबंधन अपनाएं।
वायरस से प्रभावित पौधों को पहचानकर खेत से निकाल दें, ताकि संक्रमण अन्य पौधों तक न फैले।
समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों से फसल का परीक्षण कराएं और आवश्यकता अनुसार ही दवाओं का उपयोग करें।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ओल की फसल में रोग और कीटों की समय पर पहचान तथा वैज्ञानिक प्रबंधन से उत्पादन में होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। किसान यदि नियमित निगरानी, संतुलित पोषण और समेकित रोग एवं कीट प्रबंधन (Integrated Disease and Pest Management) अपनाएं, तो कंदों का बेहतर विकास होगा और अच्छी उपज प्राप्त की जा सकेगी। यही सावधानी ओल की लाभकारी खेती को सुरक्षित और अधिक लाभदायक बनाने की कुंजी है।

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