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फसल की खेती (Crop Cultivation)

कम पानी में मसूर खेती कर लाभ कमायें

मसूर की खेती भारतवर्ष में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल एवं झारखण्ड में मुख्य रूप से होती है। उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 611 किग्रा है। म.प्र. में मसूर का क्षेत्रफल 6.2 लाख हेक्टेयर है परन्तु उत्पादकता 371 किग्रा है। म.प्र. में अशोक नगर, दमोह, जबलपुर, सीहोर, नरसिंहपुर, सतना, पन्ना, विदिशा, रायसेन जिले प्रमुख हैं, मसूर ठंडी जलवायु की फसल जो रबी मौसम की चने के बाद दूसरी महत्वपूर्ण फसल है जो सामान्यत: बारानी खेती हेतु उपयुक्त दलहनी फसल मानी जाती है। परंतु उच्च भाव व अधिक उपज के कारण किसान भाई इसे सिंचित क्षेत्रों में भी बोने लगे हैं। मसूर का उपयोग दाल, नमकीन, अन्य व्यंजन बनाने में अधिक किया जा रहा है। इसमें प्रोटीन 24.2  प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 60.8 प्रतिशत, कैल्शियम 5.0 प्रतिशत एवं लोहा 6.0 प्रतिशत पाया जाता है जो पौष्टिकता की दृष्टि से लाभदायक है। मसूर की भरपूर पैदावार के लिये उन्नत कृषि क्रियाएं अपनाना चाहिए।

भूमि व उसकी तैयारी –

मसूर दलहनी फसल होने के कारण किसी भी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती हैं जो अधिक क्षारीय व अम्लीय न हो। अधिक उपज के लिये दोमट से भारी भूमि सर्वोत्तम है। पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद 2-3 जुताई हल्की कर पाटा चलाकर समतल, भुरभुरी एवं खरपतवार रहित करना आवश्यक है जिसमें समुचित नमी हो।

बीज दर-

मसूर बड़े दाने वाली किस्म 45 से 55 किग्रा और छोटे दाने वाला 40-45 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर लगता है।

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बुवाई का समय –

मसूर बोने का उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर है यदि धान में बुवाई करना हो तो खड़ी फसल में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में खेत में बीज बिखेर दें। बोनी में देरी होती है तो बीज दर में 5 किग्रा वृद्धि कर देना चाहिये।

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बुवाई की विधि –

मसूर की बुवाई सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से करना चाहिये। जिसमें कतार से कतार की दूरी 30 सेमी पौधे से पौधे की दूरी 5-7 सेमी जिसको 4-5 सेमी की गहराई पर बोयें।

भूमि उपचार एवं बीजोपचार –

भूमि उपचार के लिये अंतिम जुताई के समय खेत में मेलाथियान 5 प्रतिशत पाउडर का 20-25 किग्रा मात्रा जमीन में मिला दें। बीज को 2 ग्राम थाइरम एवं 2 ग्राम वाबिस्टीन दवा या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरडी से प्रति किग्रा बीज को उपचारित करें इसके बाद 10 किग्रा बीज को 250 ग्राम राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर छाया में सुखाकर बुवाई करें।

फसल चक्र-

धान के बाद फसल चक्र में मसूर का उत्पादन उतेरा विधि से भी किया जाता है इससे दलहन की फसल मिलने के साथ-साथ भूमि उर्वराशक्ति बढ़ती है।

खरपतवार प्रबंधन –

मसूर फसल को खरपतवार मुक्त रखकर अधिक उत्पादन प्राप्त होता है इसके लिये बुवाई के 25-30 दिन बाद हेंड हो या डोरा का उपयोग करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ ही वायु संचार अच्छा एवं जड़ों का विकास अच्छा होगा। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण में बुवाई के बाद अंकुरण के पूर्व पेंडामिथली 30 ई.सी. दवा का 0.75 – 1.00 किग्रा सक्रिय तत्व का प्रति हेक्टेयर 500 लीटर पानी में घोल बनाकर फ्लेट फेन या कट नोजल से छिड़काव करें।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन –

मसूर की जड़ों में पाये जाने वाली ग्रंथियों में नेत्रजन स्थिरीकरण जीवाणु पाये जाते हैं। जो वायुमंडल की स्वतंत्र नेत्रजन अवशोषित कर लेती है। जो कि लगभग 85 प्रतिशत नेत्रजन की मांग को पूरा करती है। फिर भी अच्छी पैदावार के लिये 20 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस, 20 किग्रा पोटाश और 20 किग्रा सल्फर का प्रति हेक्टेयर देना लाभकारी होता है।

मिश्रित खेती –

अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि मसूर को अलसी-मसूर, जौ-मसूर, सरसों-मसूर बोना लाभकारी है।

सिंचाई –

मसूर की खेती असिंचित और बरानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। यदि सर्दियों में एक बार वर्ष हो जाती है तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। सिंचाई की व्यवस्था हो ता हल्की प्रथम सिंचाई बुवाई के 40-45 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियों में दाने भरते समय करें।

कटाई एवं गहराई –

जब फसल पीली पड़कर सूखने तथा दानों का रंग हरे से भूरे रंग का होने लगे तभी फसल की कटाई करना उचित होता है। साफ खलिहान में सुखाकर गहाई करें।9-11 प्रतिशत आद्रता रहने तक  सुखाकर भण्डारण करें।

उपज :-

उन्नत खेती कर बरानी क्षेत्र में 8-10 क्विंटल तथा सिंचित क्षेत्र में 15-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज आसानी से प्राप्त की जा सकती है।