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फसल की खेती (Crop Cultivation)

मत्स्य जीवाणु जनित रोग एवं उनका उपचार

मत्स्य पालन करते समय मछलियों को होने वाले रोगों की ओर ध्यान देना आवश्यक होता है। मछलियाँ भी अन्य प्राणियों के समान प्रतिकूल वातावारण में रोगग्रस्त हो जाती है। रोग फैलते ही संचित मछलियों के स्वभाव में प्रत्यक्ष रुप से अंतर आ जाता है। फिर भी साधारणत: मछलियाँ रोग-व्याधि से लडऩे में पूर्णत: सक्षम होती हैं।
रोगग्रस्त मछलियों के लक्षण

  • अनियंत्रित तैरती हैं। तथा उनकी बेचैनी बढ जाती है।
  • मछली के शरीर का रंग धूमिल पड़ जाता है। चमक में कमी हो जाती है तथा शरीर पर श्लेष्मिक द्रव के स्त्राव से शरीर चिपचिपा और चिकना हो जाता है।
  • बीमार मछली समूह में न रहकर किनारे पर अलग-थलग दिखाई देती है, तथा वे शिथिल हो जाती है।
  • अपने शरीर को बंधान के किनारे अथवा पानी में गड़े बाँस के ठूँठ से बार-बार रगड़ती है। आहार नहीं लेती है।
  • पानी में बार-बार गोल-गोल घूमती है।
  • मुँह खोलकर बार-बार वायु अन्दर लेने का प्रयास करती है।
  • मछलियों का पानी में सीधा टंगे रहना। कभी-कभी उल्टी भी हो जाती है।
  • कभी-कभी आँख, शरीर तथा गलफड़ फूल जाते हैं।
  • शरीर की त्वचा फट जाती है तथा उससे खून निकलने लगता है।
  • गलफड़ (गिल्स) की लाली कम हो जाती है, और उनमें सफेद धब्बों का बनना शुरू हो जाता है।
    उपरोक्त कारणों से मछली की बाढ़ रूक जाती है तथा कालान्तर में तालाब में मछली मरने भी लगती है।

रोग के कारण

  • – मछली के वज्र्य पदार्थ जल में एकत्रित होते जाते हैं तथा वे मछली के अंगों जैसे गलफड़े, चर्म, मुखगुहा के सम्पर्क में आकर उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं।

रसायनिक परिवर्तन –

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  • पानी की गुणवत्ता, तापमान, पी.एच., ऑक्सीजन, कार्बन डाईअॅाक्साइड आदि की असंतुलित मात्रा मछली के लिए हानिकारक होती है।
  • अनेक प्रकार के रोगजनक जीवाणु व विषाणु पानी में रहते है जब मछली प्रतिकूल परिस्थिति में कमजोर हो जाती है तो उस पर जीवाणु-विषाणु आक्रमण करके रोग ग्रसित कर देते हैं।
  •  कार्बनिक खाद, उर्वरक या आहार आवश्यकता से अधिक दिए जाने से विषैली गैसें उत्पन्न होती हैं जो नुकसानदायक होती हैं।

प्रमुखत: रोगों को चार भागों में बांट सकते हैं-
(अ) जीवाणु जनित रोग
(ब) परजीवी जनित रोग
(स) कवक (फंगस) जनित रोग
(द) विषाणु जनित रोग
जीवाणु जनित रोग
कॅालुमनेरिस रोग
लक्षण- यह फ्लेक्सीबेक्टर कॅालमनेरिस नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है, पहले शरीर के बाहरी सतह पर व गलफड़ों मे घाव होने शुरू हो जाते हैं फिर जीवाणु त्वचीय ऊत्तक में पहुंच कर घाव कर देते हैं।
उपचार – 1-2 पी.पी.एम. कॉपर सल्फेट का घोल पोखरों में डालें।
– पोटेशियम परमैंग्नेट के 20 पी.पी.एम घोल में 20-30 मिनटों तक डुबाते हैं ।
बेक्टीरियल हेमोरैजिक सेप्टीसिमिया
लक्षण- यह मछलियों में ऐरोमोनॉस हाइड्रोफिला व स्युडोमोनॅास फ्लुरिसेन्स नामक जीवाणु से होते हैं इसमें शरीर पर फोड़े, तथा फैलाव आता है, शरीर पर फूले हुए घाव हो जाते हैं जो त्वचा व मंासपेशियो में हुए क्षय को दर्शाता है, पंखों के आधार पर घाव दिखाई देते हैं।
उपचार – पोखरों में 2-3 पी.पी.एम. पोटेशियम परमेंगनेट का घोल डालना चाहिए।
– टेरामाइसिन को भोजन के साथ 65-80 मि.ग्राम प्रति किलोग्राम भार से 10 दिन तक लगातार दें।
एडवर्डसिलोसिस-
लक्षण- इसे सड़कर गल जाने वाला रोग भी कहते हैं, यह एडवर्डसिला टारडा नामक जीवाणु से होता है। प्राथमिक रूप से मछली दुर्बल हो जाती है, शल्क गिरने लगते हैं फिर पेशियों में गैस से फोड़े बन जाते हैं चरम अवस्था में मछली से दुर्गन्ध आने लगती है।
उपचार-

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सर्वप्रथम पानी की गुणवत्ता की जांच कराना चाहिए।
– 0.04 पी.पी.एम. के आयोडीन के घोल में दो घंटे के लिए मछली को रखना चाहिए।
वाइब्रियोसिस
लक्षण-

यह रोग विब्रियो प्रजाति के जीवाणुओं से होता है, इसमें मछली को भोजन के प्रति अरूचि होने के साथ-साथ रंग काला पड़ जाता है, मछली अचानक मरने भी लगती है। यह मछली की आँखों को अधिक प्रभावित करता है व सूजन के कारण आंख बाहर निकल आती है व सफेद धब्बे पड़ जाते हैं।
उपचार –

अॅाक्सीटेट्रासाईक्लिन तथा सल्फोनामाइड को 8-12 ग्राम प्रति किलोग्राम भोजन के साथ मिलाकर देना चाहिए।

https://www.krishakjagat.org/farming-solution/major-diseases-and-diagnosis-of-banana/