तिल की उन्नत खेती

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खेत की तैयारी– अधिक खरपतवार उगने वाली भूमि में गर्मियों में एक गहरी जुताई अवश्य करें तथा मानसून की पहली वर्षा आते ही 1-2 बार खेत की जुताई करके भूमि तैयार कर लें। तीन वर्ष में एक बार 20-25 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
बीज की मात्रा एवं बुवाई-
बीज की मात्रा 2 से 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर रखें। तिल की बुवाई मानसून की प्रथम वर्षा के बाद जुलाई के प्रथम सप्ताह में 30-45 से.मी. कतार से कतार की दूरी व 10-15 से.मी. पौधे से पौधे की दूरी पर करें। बुवाई में देरी करने से उपज में क्रमश: कमी होती जाती है।
बीजोपचार
बुवाई से पूर्व बीज को 1.0 ग्राम कार्बेण्डाजिम 2.0 ग्राम थाइरम या 2.0 ग्राम कैप्टान या 4.0 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। जीवाणु अंगमारी रोग से बचाव हेतु बीजों को 2.0 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन का 10 लीटर पानी में घोल बनाकर 2 घंटे तक बीजोपचार करें तथा बीजों को छाया में सुखाकर ही बुवाई करें। तिल में कीटों से बचाव हेतु बीज को इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू. एस. 7.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
उन्नत किस्में
आर.टी. 46, आर.टी. 125, आर.टी. 127, आर.टी. 346, आर.टी. 351
उर्वरक
तिल के लिये निश्चित वर्षा वाले क्षेत्रों में 40 कि.ग्रा. नत्रजन व 25 कि.ग्रा.फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से देें। नत्रजन की आधी मात्रा एवं फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय कतारों में ऊर कर इस प्रकार दें कि उर्वरक बीज से 4-5 सेन्टीमीटर नीचे रहे। शेष आधी नत्रजन बुवाई के 4-5 सप्ताह बाद हल्की वर्षा के समय खेत में भुरक दें। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उर्वरक की मात्रा घटा दें। तिल की फसल में पैदावार बढ़ाने के लिये बुवाई के समय 250 कि.ग्रा. जिप्सम (40 कि.ग्रा. गंधक) प्रति हेक्टेयर, 2.5 टन गोबर की खाद के साथ एजेटोबेक्टर व फॉस्फोरस विलय बैक्टीरिया 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर एवं बीज को ट्राईकोडर्मा विरीडी 4 प्रतिशत द्वारा उपचारित कर बुवाई करें। फॉस्फोरस की मात्रा डी.ए.पी. के स्थान पर एस.एस.पी. द्वारा आपूर्ति करना लाभप्रद रहता है।
सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई
नमी की कमी हो तो फलियों में दाना पडऩे की अवस्था पर सिंचाई करें। बुवाई के 20 दिन बाद निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालें। तिल की छोटी अवस्था में अगर निराई गुड़ाई करना सम्भव न हो तो एलाक्लोर 2 कि.ग्रा. दाने या 1.5 लीटर तरल प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई से पूर्व प्रयोग करें। इसके बाद 30 दिन पर एक निराई गुड़ाई करें।
अंतराशस्य
तिल को मोठ मूंग या ग्वार के साथ 2: 2 कतारों में बुवाई करने से दूसरी फसलों की अपेक्षा अधिक उपज व आमदनी मिलती है।
पौध संरक्षण के जैविक उपाय
तिल में जैविक कीट रोग प्रबन्धन हेतु बुवाई पूर्व 8 टन सड़ी हुई खाद व नीम की खली 250 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से दें। बीज को मित्र फफूंद टाईकोडर्मा विरीडी 4.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से बीजोपचार करके बुवाई करें भूमि में इस फफूंद को 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद बीज के साथ मिलाकर देवें। खड़ी फसल में कीट व रोग नियंत्रण हेतु 30-40 दिन तथा 45-55 दिन की अवस्था पर नीम आधारित कीटनाशी (एजेडिरेक्टीन 3 मि.ली. प्रति लीटर) का छिड़काव करें।
कटाई एवं भंडारण
पौधों की पत्तियाँ पीली पड़कर झडऩा शुरू हो जाये तथा नीचे की फलियाँ पक कर तैयार हो उस समय फसल की कटाई करें ताकि बीजों का झडऩा शुरू नहीं हो। फसल को काटकर भारी बनाकर सीधे खेत या खिलहान में रखें।

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