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मिर्च के रंगों से निखरेगी निमाड़ की माटी

(मनीष पाराशर/यशवंत कुशवाह)
इंदौर। वाइरस का प्रकोप हो या अन्य कोई समस्या, पश्चिमी मध्यप्रदेश के किसान हर मोर्चे पर दो-चार होने को तैयार हैं। निमाड़ की माटी मिर्च के हरे-लाल रंगों से निखरने को तैयार है। आगामी सीजन में की तैयारी में लगे किसानों ने कृषक जगत को बताया कि मिर्च की खेती क्षेत्र की पहचान है। हर कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाले अधिकतम उत्पादन लेने की तैयारी है। खरगोन जिला देश की मांग की 20 फीसदी आपूर्ति करता है। यहां से लाल मिर्च दिल्ली, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र जैसे विभिन्न प्रांतों को भेजी जाती है।
खरगोन के ग्राम खेड़ी के श्री नारायण पाटीदार एवं श्री सीताराम पाटीदार बताते हैं, मिर्च की खेती में हर वर्ष कोई नई समस्या आती है। 28 एकड़ से मिर्च की लगभग 1.20 करोड़ रुपए की आमदनी लेने वाले श्री पाटीदार कहते हैं, किसान जागरूकता के साथ खेती करें। प्रारंभिक रोपणी बनाने से अंतिम तुड़ाई तक अनुशंसित उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई व्यवस्था जैसे हर बिंदु पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।

इससे निश्चित अच्छा उत्पादन मिलता है। कसरावद के श्री सचिन पाटीदार के अनुसार जिले में मिर्च का रकबा कम नहीं होगा। मेरी पांच बीघा के रकबे में मिर्च लगाने की योजना है। श्री राजेंद्र यादव बताते हैं, मैंने पिछले तीन वर्ष से मिर्च की खेती नहीं की, इस बार मैं तीन बीघा में मिर्च लगाने जा रहा हूं। गणेश हाईटेक नर्सरी के श्री वीरेन्द्र पाटीदार कहते हैं, हालांकि इस सीजन में बड़वानी-बेडिय़ा बेल्ट में वाइरस का काफी प्रकोप रहा है, इसके बावजूद मिर्च की खेती उसी अनुपात में होगी। न्यू पटेल कृषि सेवा केंद्र के संदीपसिंह पटेल बताते हैं मिर्च बीजों की मांग आने लगी है।

 

जैविक तरीकों से लाभ
छोटी कसरावद के श्री मनोहरसिंह कहते हैं कि मैं कई वर्षों से मिर्च की खेती कर रहा हंू। ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था की है। वाइरस एवं अन्य कीटों से बचाने के लिए कुछ जैविक तरीके अपनाए, जैसे गोमूत्र, छाछ का छिड़काव किया। श्री भीमसिंह कहते हैं कि फसल के चारों ओर गेंदे के फूल लगाए, जिनसे अतिरिक्त आय भी हुई, साथ ही फसल भी बच गई। श्री सुरेंद्रसिंह चौहान तीन वर्ष पश्चात एक एकड़ रकबे में मिर्च लगाने जा रहे हैं, खेती करने में समस्याएं तो आती ही हैं, लेकिन समाधान भी हैं।

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नहीं बन पाई खरगोन मंडी
ग्राम सांवदा के श्री भगवान पाटीदार कहते हैं मिर्च हब की योजना खटाई में पड़ी है। खरगोन मंडी राजनीति में उलझ गई है। जमीन स्वीकृत है, किंतु काम शुरु नहीं हुई। सरकार से कई बार गुहार लगाई जा चुकी है। मिर्च कोल्ड स्टोरेज में रखने इंदौर भेजनी पड़ती है। खंडवा और सनावद मंडियों में आढ़त प्रणाली कायम है, आवक बोरियों में होती है, जबकि बेडिय़ा, धामनोद, कुक्षी, मनावर और खरगोन मंडियों में किसान पोटलों में लाल मिर्च लाते हैं और कारोबारी सीधे नीलामी के माध्यम से इसे खरीदते हैं। सरकार ने मिर्च का कोई समर्थन मूल्य तय नहीं किया है, इससे निश्चित आय नहीं होती, वहीं भुगतान व्यवस्था व्यापारियों के हाथ में है, जो समय पर नहीं हो पाता है।

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