विलय की वकालत

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हाल ही में भारत सरकार की खाद्य प्रसंस्करण मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने आम लोगों से सीधे जुड़े तीन विभागों को एक करने की वकालत की है। मंत्री के मुताबिक कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण विकास मंत्रालय की सभी योजनाएं आमजन से सरोकार रखती हैं और अमीर और गरीब दोनों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है। ये सही है कि इन विभागों की योजनाओं का विशेष रुप से ग्रामीण भारत से सीधा संबंध है। पर अनेक योजनाओं में परस्पर दोहराव है, टकराव है। जब सरकार द्वारा किसान को अपनी आय बढ़ाने के लिए एकीकृत खेती करने पर बल दिया जाता है जिसमें खेती के साथ बागवानी, फिर उसमें लगे फलों का प्रसंस्करण करना, खेत पर काम न हो तो ग्राम स्तर पर कुटीर उद्योग लगाना आदि तो सवाल उठना तर्कसंगत है कि लगभग एक ही प्रकृति, विषय, क्षेत्र, हितग्राही को लक्षित योजनाओं के लिए तीन-तीन मंत्रालय क्यों है? इन भारी-भरकम विभागों की जरुरत क्या है?
संभवत: इन विभागों के विलय से गैर जरुरी खर्च पर रोक लगेगी। योजनाओं का दोहराव नहीं होगा। मैदानी स्तर पर हितग्राही को लाभ जल्दी और सीधे पहुंचेगा।
भाजपा सरकार के नए कामकाजी माहौल में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र की योजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन के लिए मंत्रालयों का एकीकरण एक दीर्घकालीन बहस का विषय है। पर योजनाओं की मानिटरिंग आसान होगी। सरकार में दायें हाथ को मालूम रहेगा कि बांया हाथ क्या कर रहा है। मध्यप्रदेश में तो खाद्य प्रसंस्करण और उद्यानिकी विभाग राजनीतिक समीकरण के संतुलन के लिए फुटबॉल बना रहता है, यहां तक कि सचिव स्तर पर भी ऐसे ही व्यक्ति को सौंपा जाता है जिसका प्रशासनिक अलाईनमेंट बिगड़ा हुआ हो।
इतिहास में जाएं तो भारत सरकार में आजादी के बाद कृषि मंत्रालय ही एक बड़ी छतरी वाला विभाग था जिसमेंं सारे विभाग शामिल थे। 1952 में ग्रामीण विकास की सोच को आगे बढ़ाने की मंशा से योजना आयोग के तहत कम्युनिटी प्रोजेक्ट एडमिनिस्ट्रेशन नामक संगठन खड़ा किया गया। फिर 1974 में कृषि मंत्रालय के अंतर्गत ग्रामीण विकास विभाग बना।
अगस्त 1979 में इसका उन्नयन ग्रामीण पुर्नविकास मंत्रालय के रूप में हुआ। जनवरी 1982 में पुन: ग्रामीण विकास मंत्रालय हुआ। जनवरी 1985 में इसे दोबारा विभाग मेंं बदलकर कृषि मंत्रालय से जोड़ दिया गया। 1991 में पुन: ग्रामीण विकास मंत्रालय बनकर 1992 में पड़त भूमि विकास विभाग भी जोड़ा गया। संभवत: इस विभाग का वास्तु या नामकरण जितनी भी सरकारें आई स्थाई रुप से तय नहीं कर पाई। मार्च 1995 में इसे ग्रामीण क्षेत्र एवं रोजगार मंत्रालय बनाया गया जिसमें तीन विभाग – ग्रामीण रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग, ग्रामीण विकास एवं वेस्टलेंड डेवलपमेंट विभाग जोड़ा गया। अंतत: फिर सरकार ने 1999 में इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय बनाया। भारत सरकार मंत्रालय की नाम बदल-बदल कर पैकिंग भी बदलती रही है पर सरकारी माल अंदर से वही है जो गठन के समय था।
विलय के इस विचार से असहमति के स्तर जरुर उभरेंगे। सत्तारुढ़ दल को अपने वरिष्ठ कनिष्ठ सदस्यों को मंत्रिमंडल में एडजस्ट करने के लिए चिल्लर विभागों की दरकार तो रहेेगी, पर इन तीन विभागों के विलय से योजनाओं का युक्तियुक्तकरण आसान होगा।
मोदी सरकार के कथित मितव्ययी, मौनव्रती मंत्रिमंडल की मुखर मंत्री का यह विचार स्वागत योग्य है। इस विचार पर बहस-मुबाहिसे हों और परिणाम भी निकले तो सार्थक होगा।

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