किसानों से छलावा कब तक ?

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इस वर्ष प्रकृति ने किसानों का साथ दिया। मानसून की अच्छी वर्षा तथा रबी फसलों में पिछले वर्षों की तरह प्राकृतिक विघ्न नहीं आये, फलस्वरूप किसानों को रबी फसलों का भरपूर उत्पादन मिला है। किसान को उसके उत्पादन का अच्छा मूल्य मिलने की आशा थी। परंतु पिछले दिनों लगभग सभी खाद्यान्न  फसलों तथा फल व सब्जियों के मूल्य में गिरावट आई है। कुछ सब्जियों में आलू, टमाटर आदि में तो कहीं -कहीं इनकी खुदाई, तुड़ाई की लागत भी नहीं निकल पाई। ऐसी परिस्थितियों में किसानों को अच्छी फसल का लाभ न मिलकर हानि हुई है। खाद्यान्न फसलों में गेहूं के मूल्य में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिलते। गेहूं की खेती में किसान को ज्यादा जोखिम भी नहीं उठाने पड़ते। गेहूं की खेती मेें जोखिम पकने की अवस्था में आंधी-पानी का रहता है जिससे फसलें इस वर्ष बच गई, रबी में कटने वाली दलहनी फसलों चना तथा अरहर से भी इस वर्ष अच्छे उत्पादन की आशा है। ये फसलें भी इस वर्ष प्राकृतिक विपदाओं से बच गई। परंतु किसान को फसल लगाते समय जिन कीमतों के मिलने की आशा थी उन पर पानी फिर गया। बाजार में इन फसलों के आने के पूर्व ही मूल्यों में सुनियोजित तरीके से गिरावट ला दी गई ताकि व्यापारियों को कम मूल्य पर ये दालें उपलब्ध हो जायें। और फिर व्यापारी किसानों से फसल खरीदने के बाद संग्रहित कर सकें फिर मनमाने ढंग से उनकी कीमतें बढ़ा सकें। किसान ने इन फसलों की बुआई करते समय जिन कीमतों की आशा की थी उसकी आधी कीमतें भी किसान को नहीं मिल पा रही है।
अब राज्य सरकारों का दायित्व बनाता है कि वे किसानों के प्रति अपने दायित्वों को निभायें। अब किसान के पूरे उत्पादन को कम से कम इन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की व्यवस्था करें। साथ ही देश हित में रबी फसलों के उत्पादन की उपयुक्त भंडारण की भी व्यवस्था करें। ताकि किसानों की मेहनत से उत्पादित अनाज मौसम व अन्य कारणों से नष्ट न हो जाये। यदि सरकारें किसान को उसके उत्पादन का उचित मूल्य न दिला पाये और भंडारण में अनाज इसी प्रकार नष्ट होता रहेगा तो किसानों का खेती के प्रति मोह भंग को कोई रोक नहीं पायेगा, जिसके परिणाम भयानक होंगे।

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