अन्नदाता के अरमानों पर पानी फिरा

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अति वर्षा से सोयाबीन का उत्पादन घटा

इंदौर। मौसम विभाग द्वारा प्रदेश से मानसून की औपचारिक विदाई की घोषणा के पूर्व ही मालवांचल में सोयाबीन की कटाई और गहाई कर ली। लेकिन इस वर्ष अति वर्षा से प्रभावित सोयाबीन की फसल के जो नतीजे आए उसने अन्नदाता के अरमानों पर पानी फेर दिया। सोयाबीन का औसत उत्पादन डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा ही रहा। इंदौर – उज्जैन संभाग के किसानों से कृषक जगत से हुई चर्चा में किसानों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि लागत मूल्य भी नहीं निकला। सोने से ज्यादा उसकी घड़ावन महंगी पड़ गई।

बता दें कि मालवांचल के किसानों ने इस वर्ष जून-जुलाई में बड़े रकबे में सोयाबीन की बोवनी इस आस में की थी कि पीले सोने (सोयाबीन) के भरपूर उत्पादन होने पर बेटी के हाथ पीले कर देंगे अथवा कर्ज चुका देंगे, लेकिन इस बार इन्द्र देवता ने खूब पानी बरसाकर इनके सभी अरमानों पर पानी फेर दिया। इस बारे में कृषक जगत ने इंदौर-उज्जैन संभाग के चुनिंदा गांवों के किसानों से चर्चा की। चोट्याबालोद (धार) के श्री छोगालाल नंदू निनामा ने 4  बीघा में सोयाबीन लगाई थी जो पानी ज्यादा होने से गल गई। डेढ़ क्विंटल प्रति बीघे का उत्पादन हुआ। जबकि लागत खर्च इससे कहीं ज्यादा हुआ। वहीं बोधवाड़ा (धार) के श्री निर्भय सिंह फते सिंह ने  सोयाबीन की 6124  किस्म 20 बीघा में लगाई थी। 40 क्विंटल के करीब उत्पादन हुआ। जबकि आनंदखेड़ी (धार) के श्री नारायण मोहनलाल पिपलिया की जमीन हलकी होने से डेढ़ बीघा में 10 क्विंटल उत्पादन हुआ। उन्होंने कहा कि जहां भारी जमीन थी वहां उत्पादन कम हुआ। जबकि मालखेड़ा (नीमच) के श्री राधेश्याम रामचंद्र धाकड़ की 20  बीघा में मात्र 8 क्विंटल सोयाबीन निकली। इससे मजदूरी का खर्च भी नहीं निकला। बरखेड़ामीना  (नीमच) के श्री चांदमल भेरूलाल मीणा ने सोयाबीन की 1025 किस्म साढ़े चार बीघा में लगाई थी। उत्पादन 30 – 40 किलो प्रति बीघा हुआ। उन्होंने कहा कि बीज, खाद और दवाई के अलावा 800रु. बीघा कटाई के दिए। सोने से ज्यादा तो घड़ावन महंगी पड़ गई। अयाना (रतलाम) के श्री निर्भयसिंह गोविन्द सिंह सिसोदिया को 42 बीघा में लगाई सोयाबीन का औसत उत्पादन डेढ़ क्विंटल /बीघा मिला। आपने फसल बीमा में हर साल 18 हजार प्रीमियम देने के बाद भी कोई मुआवजा नहीं मिलने से इसे बंद करने या इसे स्वैच्छिक करने की मांग की। नाऊखेड़ी (रतलाम) के श्री जसपाल सिंह ने कहा पानी कि अधिकता से फसल पर असर पड़ा फिर भी 20 बीघे में पौने दो क्विंटल औसत उत्पादन मिला। इसी तरह मंदसौर जिले के ग्राम पिण्डा के श्री जगदीश     मांगीलाल पाटीदार को 3 हेक्टर में लगाई सोयाबीन का उत्पादन 50  किलो प्रति बीघा मिला। यही औसत आसपास के गाँवों चिपलाना, लदुसा, लसुड़ावन आदि का भी रहा। मक्का, उड़द और टमाटर की फसल तो पूरी तरह बर्बाद हो गई। जबकि पालड़ी के श्री श्यामलाल राधेश्याम पाटीदार को 10 एकड़ में सोयाबीन का उत्पादन करीब दो क्विंटल/एकड़ रहा। वहीं जडवासा खुर्द के श्री लालाशंकर चौधरी को 23 बीघे में लगाई सोयाबीन का उत्पादन एक क्विंटल /बीघा मिला। यहां भी उड़द आदि फसलें नष्ट हो गई।

उधर,  भैसलाखुर्द (उज्जैन) के श्री नरेंद्र राजाराम जाट को इस बात का अफसोस रहा कि 50 प्रतिशत फसल खराब होने से अब दागी सोयाबीन को बीज के लिए उपयोग नहीं किया जा सकेगा। 20 बीघे में डेढ़ क्विंटल/बीघा का औसत उत्पादन मिला। सबरसी (देवास) के श्री केदार चौधरी खुशकिस्मत रहे। उन्हें 12 बीघे में करीब 25 क्विंटल का उत्पादन मिला। टाकून (इंदौर) के श्री श्याम सिंह बहादुर सिंह पटेल को 30 बीघे में सोयाबीन का दो क्विंटल प्रति बीघा का उत्पादन मिला। वहीं श्री दिलीप रूपसिंह चौधरी लिम्बोदागारी (इंदौर) को करीब 50 बीघा में लगाई सोयाबीन 60  क्विंटल उत्पादित हुई। औसत डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा रहा। किसानों के इन उत्पादन आंकड़ों से एक बार फिर साबित हो गया कि खेती मानसून का जुआ है, जिसमें प्राकृतिक आपदा से खेती को ज्यादा नुकसान होता है। ऐसे में फसलों की कम कीमतों से तो किसानों की तो कमर ही टूट जाती है। स्मरण रहे कि राज्य में हुई अति वर्षा और बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने केंद्रीय अध्ययन दल ने दूसरी बार दौरा किया और यह स्वीकार किया कि अतिवर्षा से खेती को बहुत नुकसान हुआ है।

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