हरी खाद की उन्नत तकनीक पर आभासी प्रशिक्षण

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24  मई 2021, टीकमगढ़। हरी खाद की उन्नत तकनीक पर आभासी प्रशिक्षण – कृषि विज्ञान केन्द्र टीकमगढ़ के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी. एस. किरार एवं वैज्ञानिक डॉ. यू. एस. धाकड़ द्वारा विगत दिवस किसानों को वर्चुअल प्रशिक्षण हरी खाद की उन्नत तकनीक एवं उसके महत्व पर जानकारी दी गयी । प्रशिक्षण में डॉ. किरार हरी खाद के रूप में उगायी जाने वाली प्रमुख फसलें सनई, ढैंचा, सिस्बेनिया रोस्ट्रेटा, मूंग एवं फली तुड़ाई के बाद बरवटी आदि है। हरी खाद खेत में वर्षा के जल के स्वस्थानिक संरक्षण, मृदा क्षरण में कमी तथा भूमि की उर्वरा शक्ति एवं फसलों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायक होती है।

हरी खाद वाली फसलों को ढालू भूमियों पर उगाकर मृदा क्षरक कम किया जा सकता है साथ ही मिट्टी की भौतिक एवं रसायनिक अवस्था में सुधार होता है। डॉ. धाकड़ ने सिंचाई सुविधा होने पर हरी खाद वाली फसलों की मई के अंत तक बुवाई कर सकते हंै। सनई बीज 50 से 60 किलोग्राम या ढैंचा 40 कि.ग्रा. प्रति हे. छिड़काव विधि से बोते हैं। उसके बाद सिंचाई कर दी जाये तथा प्रति सप्ताह सिंचाई करते रहें जब फसल 1 से 1.5 मी. की हो जाये अर्थात् बुवाई के 40 से 45 दिन बाद फसल पर पाटा चलाकर मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो चलाकर फसल को खेत में मिला दी जाये और पानी भर दिया जाये जिससे पूरी फसल ठीक से सड़ जाये उसके बाद उस खेत में सोयाबीन, उड़द, तिल, ज्वार या धान लगा दी जाये।

हरी खाद से एक हेक्टेयर में 18.4 टन हरा जैव पदार्थ एवं 4.7 टन सूखा जैव पदार्थ प्राप्त होता है और पोषक तत्वों से एक हेक्टेयर में नत्रजन 45.4 कि.ग्रा.,फास्फोरस, 3.5 कि.ग्रा. और पोटाश 51.9 कि.ग्रा. प्राप्त होता है। हरी खाद वाले खेतों में गेहंू उगाने पर उसकी उपज में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसलिये किसान भाई हरी खाद वाली फसलें उगायें और हरी खाद बनाकर जल संरक्षण, मृदाक्षरण रोकने एवं लागत में कमी लायें।

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