राज्य कृषि समाचार (State News)

सोयाबीन- गेहूं फसल प्रणाली की उत्पादकता पर प्रशिक्षक प्रशिक्षण आयोजित

11 मार्च 2026, इंदौरसोयाबीन- गेहूं फसल प्रणाली की उत्पादकता पर प्रशिक्षक प्रशिक्षण आयोजित – भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर द्वारा “मध्यप्रदेश के मालवा एवं निमाड़ क्षेत्र में सोयाबीन- गेहूं फसल प्रणाली की उत्पादकता बढ़ाने की तकनीकों ‘ विषय पर तीन दिवसीय प्रशिक्षक प्रशिक्षण 10–12 मार्च  तक  किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मालवा एवं निमाड़ क्षेत्र के 18 जिलों से आए 36 अधिकारी भाग ले रहे हैं ।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के निदेशक डॉ. के.एच. सिंह के उद्बोधन  से  हुआ। उन्होंने बताया कि सोयाबीन उत्पादन क्षेत्रों में कीट एवं रोगों के बढ़ते प्रकोप के साथ-साथ लम्बे समय तक सूखा, उच्च तापमान जैसी प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों की चुनौती सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा ऐसी उन्नत सोयाबीन किस्मों तथा उत्पादन तकनीकों का विकास किया गया है, जो इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं। उन्होंने ब्रॉड बेड फरो तथा रिज-फरो जैसी उन्नत बुवाई पद्धतियों को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने बताया कि हाल ही में विकसित सोयाबीन किस्म नर्स 150, किस्म JS 95-60 का एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है और क्षेत्र के किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।

इस मौके पर  संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बी.यू. दुपारे ने  मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रायोजित परियोजना के उद्देश्यों एवं कार्ययोजना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह परियोजना प्रदेश के 18 जिलों—इंदौर, धार, खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर, रतलाम, मंदसौर, नीमच, उज्जैन, शाजापुर, आगर-मालवा, राजगढ़, देवास, सीहोर एवं भोपाल—में संचालित की जा रही है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य शीघ्र अवधि वाली सोयाबीन किस्म JS 95-60 के स्थान पर मध्यम अवधि वाली सोयाबीन किस्मों को प्रोत्साहित करना है, ताकि आगामी रबी फसल की उत्पादकता प्रभावित हुए बिना सोयाबीन की उपज में वृद्धि की जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले दो वर्षों में किए गए प्रदर्शनों के परिणामस्वरूप मध्यम अवधि वाली सोयाबीन किस्म NRC 142 को अपनाने से किसानों को 2 से 4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त हुआ है।

तकनीकी सत्र के दौरान डॉ. राघवेंद्र ने प्राकृतिक खेती परियोजना के अंतर्गत प्राप्त परिणामों को प्रस्तुत किया, जो खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली सोयाबीन फसल के लिए उत्साहजनक पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त तकनीकी सत्र में डॉ. लोकेश मीणा द्वारा कीट प्रबंधन, डॉ. मृणाल कुचलान द्वारा बीज उत्पादन, डॉ. महावीर शर्मा द्वारा जैव उर्वरक कंसोर्टिया तथा डॉ. प्रिंस चोयल द्वारा सूखा एवं जलभराव की स्थिति में सोयाबीन फसल प्रबंधन विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई।  आभार डॉ. विशाल थोराट द्वारा   व्यक्त किया गया।

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