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राज्य कृषि समाचार (State News)

तिवड़ा वापस आ रहा है !

लेखक – शशिकांत त्रिवेदी

22 फरवरी 2026, भोपाल: तिवड़ा वापस आ रहा है ! – भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् के वैज्ञानिक तिवड़ा वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं. इसे आमतौर पर खेसरी और घास मटर के नाम से जाना जाता है. किसानों की एक सभा को संबोधित करते हुए हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जल्द ही बाज़ार में एक नई कम नुकसानदायक किस्म आएगी।

तिवड़ा का भारत में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था लेकिन बाद में इस पर रोक लगा दी गई क्योंकि यह इंसानों में लेथिरिज्म बीमारी पैदा करती थी. कृषि मंत्री चौहान ने कहा, “हम अलग-अलग किस्मों से दाल का प्रोटीन निकालने के लिए प्रयोग कर रहे हैं ताकि किसानों को ज़्यादा फ़ायदा हो सके। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् के वैज्ञानिक तिवड़ा की उन किस्मों को तैयार कर रहे हैं जिनमे न्यूरोटॉक्सिन का स्तर काफ़ी कम हो और ये सुरक्षित किस्में हों. तिवड़ा इंसानों में न्यूरोलैथिरिज्म नाम की एक बीमारी पैदा करता है जिससे लंबे समय तक इस्तेमाल करने से पैरों में खराबी आ जाती है। इस टॉक्सिन को पहले न्यूरोलैथायरिज्म से जोड़ा गया है, जो एक पैरालिटिक डिसऑर्डर है, जिसकी वजह से 1961 से भारत में खेसरी/तिवड़ा की बिक्री और भंडारण पर रोक लगी है।

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कोशिशें इस तरह की जा रही हैं कि इस विषैले तत्व को कम करके इंसानों के इस्तेमाल के बजाय सुरक्षित किस्म विकसित करने पर ज़ोर दिया जा रहा है. भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् राज्य की एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर जारी की गई खास वैरायटी में रतन और प्रतीक शामिल हैं। इनमें इस विषैले तत्व का प्रतिशत 0.07 परसेंट से 0.1 परसेंट तक होता है, जो रिस्की माने जाने वाले लेवल से काफी नीचे है, और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार और ओडिशा जैसे सही इलाकों में 1.5 से 1.6 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देता है। शोधकर्ताओं ने पूसा-24 वैरिएंट से रतन जैसी लाइनें बनाने के लिए कन्वेंशनल हाइब्रिडाइजेशन, टिशू कल्चर और अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया। “अभी चल रहे काम में आनुवंशिक संशोधन की गुंजाईश भी है, विषैले तत्व को पूरी तरह खत्म किया जा सके. अभी शोध इस बात पर है कि सूखे की स्थिति में तिवड़ा में पाया जाने वाले विषैले तत्व का स्तर बढ़ सकता है।

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सन 2023 से 2025 तक की हालिया शोध में पूर्वी भारत, खासकर बिहार में खेसरी को उगाकर देखा गया है, ताकि चावल की कटाई के बाद कम इस्तेमाल होने वाली ज़मीनों में दालों का उत्पादन बढ़ाया जा सके। तिवड़ा या खेसरी को “गरीब आदमी की दाल” का नाम इसलिए मिला है क्योंकि यह बहुत ज़्यादा सूखे, पानी भरने और बंजर मिट्टी में भी उगती है, जहाँ दूसरी फसलें नष्ट हो जाती हैं। इसमें ज़्यादा प्रोटीन होता है, यह लगभग 125 दिनों में जल्दी पक जाती है, और खाने और चारे के तौर पर दोनो तरह से इस्तेमाल की जा सकती है। रतन और प्रतीक जैसी कम विषैले तत्व वाली किस्मों को खेती के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन कमर्शियल बिक्री के लिए बड़े पैमाने पर मंज़ूरी अभी भी फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया और इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के अधीन है। कुछ राज्यों ने पाबंदियां हटाने की तैयारी कर ली हैं, और कुछ संस्थानों के अध्ययन के मुताबिक, नई किस्मों का कम इस्तेमाल दिल की बीमारियों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है। यह शोध बदलते पर्यावरण के हालात के बीच पौष्टिक भोजन की सुरक्षा और छोटे किसानो के लिए एक “स्मार्ट दाल” के तौर पर दिलचस्पी पैदा करती है। (लेखक भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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