नौकरशाही के झासे में है सरकार, उर्वरक के लिये मोहताज हुआ किसान

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  • आलेख : विनोद के. शाह
    Shahvinod69@gmail.com

08 नवंबर 2021, नौकरशाही के झासे में है सरकार, उर्वरक के लिये मोहताज हुआ किसान – मप्र में किसानो के लिये खाद व्यवस्था संभालने वाले सरकार के विभागीय अधिकारी फसल बौनी तक प्रदेश सरकार एंव किसानो को अंधेरे में रखे हुये है। राज्य के जिम्मेदार अधिकारी अक्टूबर माह के अंत तक राज्य में खाद की पर्याप्त उपलब्धता की बात कर रहे थे। जबकि हकीगत यह है कि सरकारी अफसरो का झूठा सरकार एंव अन्नदाता दोनो पर ही भारी रहा है। राज्य में फसल कटाई के बाद हुई बरसात से राज्य का पचास फीसदी किसान अक्टूबर माह मे बौनी के लिये तैयार था। लेकिन बीज बौने किसानो को पर्याप्त खाद नही मिल सकी है। जब पूरे प्रदेश में किसान के आक्रोश से हालात बिगडने लगे तब मोर्चा संभालने मुख्यमंत्री शिवराजसिह को ही आगे आना पडा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से 32 रैक उर्वरक की मात्र तुरंत उपलब्ध कराने के साथ ही, कालाबजारी करने वालो को शक्ति से कुचलने की बात भी कही,तो हालात सुधरे है। लेकिन इसके पहले राज्य में उर्वरक की जमकार कालाबजारी हो चुकी है। राज्य के 40 फीसदी किसानो को अक्टूबर माह में खुले बाजार से मॅहगे दामो में उर्वरक खरीदकर बौनी करने को मजबूर होना पडा है। इसमें कोई दो राय नही है कि पूर्व में उपलब्ध खाद अक्टूबर माह में सहकारी समिति एंव विपणन संघ के कर्मचारियों के माध्यम से कालाबजारियों तक पहुॅचा है। विपणन संघ द्धारा राजनैतिक दबाब में सभी सहकारी समितियो को समानता के आधार पर वितरण न करके कुछ ही सह​कारी समितियों तक वितरित किया है। वही राजनैतिक दबाब में कुछ चुनिंदा समितियों को तय कोटे से अधिक उर्वरक प्रदाय किया गया है। जबकि अक्टूबर माह के अंत तक अनेको सहकारी समितियौ ऐसी भी रही है,जिन्हे खाद की एक भी बोरी राज्य विपणन संघ द्धारा उपलब्ध नही कराई गई थी। चालू अबधि में राज्य में दलहनी,सरसो एंव लम्बी अबधि के गेहॅू की 50 फीसदी से अधिक बौनी हो चुकी है। लेकिन प्रदेश के नौकरशाह यह स्वीकारने ने कतई तैयार नही है कि मप्र में उर्वरक का कोई संकट रहा है। मंत्रालय स्तर के अधिकारी मुख्यमंत्री सहित पूरी सरकार से कह रहे है कि प्रदेश में खाद का कोई टोटा है ही नही है, ब्लकि किसान खाद का आवश्यकता से अधिक संग्रह कर रहा है। यही बात जिला स्तर पर भी जिम्मेदार अधिकारी कर रहे हैै। लेकिन इसके विपरीत सत्य जो सबके सामने है,उपचुनाव वाले क्षेत्र को छोडकर प्रदेशभर में किसान खाद के लिये हैरान—परेशान रहा है।

सहकारी समितियो के बाहर लम्बी—लम्बी कतारे,कतारो में खडे बीमार,बुर्जग एंव महिलाओ की दर्दभरी तस्वीरे राज्य के नौकारशाहो के झूठ को उजागर करने के लिये पर्याप्त है। मप्र में राज्य विपणन संघ के पास खाद भंडारण एंव वितरण का जिम्मा है। चालू रवी सीजन के लिये राज्य विपणन संघ को साढे चार लाख टन यूरिया,चार लाख टन डीएपी,03 लाख 90 हजार टन मिश्रित खाद एनपीके का भंडारण 01 अगस्त से 15 सितंबर की अबधि में सहकारी समितियों में करना था। इसके लिये राज्य सरकार सरकार छ: सौ करोड रुपये की राशि बतौर बैंक गारंटी अग्रिम रुप में राज्य विपणन संघ को प्रतिबर्ष उपलब्ध कराती आ रही है। लेकिन अन्र्तराष्टीय स्तर पर बडी डीएपी की कीमतो एंव इसके तुरन्त बाद केन्द्र सरकार की सब्सिटी में बडौत्तरी,एनपीके खाद में मूल्य बृद्धि के द्धष्टिीगत राज्य विपणन संघ की नीयत अधिक मुनाफा कमाने की थी। इस कारण जानबूझकर राज्य की सभी सहकारी समितियो में अग्रिम रुप में उर्वर​क का भंडारण नही किया गया था। अब जबकि सरकार के आकडे से राज्य में उर्बरक की उपलब्धता गत बर्ष की तुलना में 53 हजार टन की अधिक मात्रा द्धष्टीगोचर हो रही है। राज्य विपणन संघ अब भी सत्य पर पर्दा डालने में लगा है। खाद न मिलने से आक्रोशित किसान आन्दोलित हुये थे। स्थानीय स्तर पर किसानो को चक्काजाम,धरना सहित रेल ट्रैक जाम जैसे आन्दोलन करने को मजबूर होना पडा है। चुनावी जिलो को छोड राज्य के शेष सभी जिलो में खाद की आसान उपलब्धता नही है। पिछले कुछ बर्षो से राज्य सरकार बारिश के दिनो में सहकारी समितियो के माध्यम से राज्य के किसानो को ब्याज मुक्त राशि पर अग्रिम खाद उपलब्ध कराती आ रही है। इस नीति से राज्य सरकार की भंडारण पर खर्च होने वाली करोडो रुपये की राशि की बचत हो रही थी। लेकिन राज्य विपणन संध की चालू बर्ष में  मुनाफा कमाने की नीति राज्य शासन को आर्थिक नुकशान पहॅुचाने के साथ संकट में डालने वाली भी रही है। राज्य सरकार के अधिकारी स्वदेशी एनपीके खाद को डीएपी का उत्तम बिकल्प बताने के साथ उसकि भरपूर उपलब्धता की बात अवश्य कर रहे है। लेकिन सहकारी समितियो के पास किसानो को देने एनपीके खाद भी उपलब्ध नही है। एनपीके,सिंगल सुपर फास्फेट एंव यूरिया का मिश्रण डीएपी के बिकल्प बन सकते है, लेकिन इस मिश्रण को किसान कैसे उपयोग में लाना है, ऐसी जागरुकताभरी जानकारी उपलब्ध कराने में राज्य का कृषि विभाग पूर्णता नाकाम बना हुआ है। राज्य सरकार ने खाद की कालाबजारी एंव इसके अनावश्यक प्रयोग को रोकने सीजन से पूर्व

ई वाउचर जैसी व्यवस्था लागू करने की बात भी कर रही थी। योजना में राज्य के किसानो के पास उपलब्ध कृषि भूमि के आधार पर तय मात्रा की खाद किसानो को देना थी। लेकिन राज्य की सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था योजना को अमलीजामा पहनाने में नाकाम होती दिखाई दे रही है। चालू बर्ष में राज्य का 25 फीसदी किसान अपना पिछला सहकारी समिति का कर्ज अदा न करने के कारण डिफाल्टर की श्रेणी में है। सरकारी समितियॉ ऐसे कर्जधारियों को किसी भी प्रकार से खाद नही दे रही है। इसके के कारण गत बर्ष की तुलना में सहकारी समितियीे के पास खाद—ग्राहको की संख्या कम रही है,जबकि सरकार की माने तो प्रदेश के सरकारी रिकार्ड में खाद की उपलब्धता गत बर्ष की तुलना में अधिक है। ऐसे में बडा सबाल यह है कि आखिर राज्य का खाद कहॉ गया? सरकार एंव अन्नदाता को अंधेरे में रखकर,गुमराह करने वाले जिम्मेदार अधिकारियो एंव कर्मचारियो पर दंड की कार्यवाही आवश्यक है। तभी प्रदेश के किसानो को शोषित होने से बचाया जा सकेगा।

                          (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एंव कृषि मामलो के जानकार है।)

                          अंबिका, हास्पीटल रोड,विदिशा 464001, मोबा. 9425640778

                        

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