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राज्य कृषि समाचार (State News)

पराली जलाने के पाप से बचने का उपाय है ‘ हाथों में हंसिए की वापसी ’

  • ध्रुव शुक्ल, मो.: 9425301662

24 नवंबर 2021, पराली जलाने के पाप से बचने का उपाय है ‘ हाथों में हंसिए की वापसी’ – हरित क्रांति के नाम पर भारत की खेती की ज़मीन जोतने, बीज बोने और फसल काटने के लिए मशीनों के हवाले की जाती रही है। इस पाप में पिछले पचास साल से राजनीति और बाजार शामिल रहे हैं। देश के सम्पन्न किसानों ने इस पाप में शामिल होकर खूब कमाई की है और जमीनों में जहरीले खाद डालकर उन्हें बांझ भी बनाया है।

इससे पहले देश के किसान बैलों और हल का उपयोग जोतने-बोने में करते थे। जब होली पर फसल पक जाती थी तो पूरे देश में गांव-गांव से अपने हंसिए लेकर फसल काटने वाले हजारों लोग खेतों में फैल जाते थे। हाथों में थमे हंसिए की खासियत है कि वह गेहूं की फसलों को जड़ के बहुत करीब से काटता है। जमीन पर बड़े डण्ठल छूटते ही नहीं और हजारों हाथों को काम भी मिलता है। जब मशीनें फसल काटती हैं तो बड़े-डण्ठल खेतों में छोड़ देती हैं। ये डण्ठल ही तो पराली हैं जिन्हें जलाकर जमीन अगली फसल के लिए तैयार करना पड़ती है।

पराली जलाने से जमीन की सतह पर रहकर उसे उर्वर बनाने वाले तत्व, कीड़े और बैक्टीरिया भी जलकर मर जाते हैं। इसीलिए जमीन ज़्यादा खाद-पानी मांगती है। कुल मिलाकर मशीनों से होने वाली फसल कटाई ही पराली के पाप की जड़ है। किसान आज भी खेतों पर हंसिए की वापसी का संकल्प लेकर हजारों हाथों को काम दे सकते हैं और पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने के पाप से बच सकते हैं।

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मुझे याद है कि हमारी पुश्तैनी जमीन पर होली के आसपास फसल काटने वाले लोग आते थे। उन्हें हम चैतुआ कहते थे। वे खेतों के करीब ही डेरा डाल लेते। वहीं बैगन का भुरता और गक्कड़ बनाकर खाते। उनका पूरा परिवार ही फसल कटैया की भूमिका निभाकर रोजी कमाता था। खेत कटाई के समय गिर गयी गेहूं की बालें बीन लेता था। उनके हाथ और हंसिए उनके साल भर के भोजन का इंतजाम कर लेते थे। चैतुआ को किसान अपना सगा मीत मानकर बिदाई के समय कहता— खाईं गकरियां गाये गीत अब घर चले चैतुआ मीत।

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