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राज्य कृषि समाचार (State News)

शहडोल: जैविक खेती अंतर्गत मृदा सौर्यीकरण पर प्रशिक्षण संपन्न

02 मार्च 2026, शहडोल: शहडोल: जैविक खेती अंतर्गत मृदा सौर्यीकरण पर प्रशिक्षण संपन्न – जैविक खेती अंतर्गत मृदा सौर्यीकरण पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम शासकीय इंदिरा गांधी होम साइंस कॉलेज शहडोल में आयोजित किया गया।  

प्रशिक्षण  कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रज किशोर  प्रजापति ने प्रशिक्षणार्थियों  को बताया कि कई दशकों से फसलों के उत्पादन वृद्धि हेतु रसायनों जैसे उर्वरकों, कीटनाशक एवं खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग बढ रहा है जो कि मानव समाज व पर्यावरण दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसी वजह से वर्तमान में प्राकृतिक एवं जैविक खेती पर ज्यादा बल दिया जा रहा है। किसान की बोई गई फसलों की नर्सरी को भूमि जनित कीटं, रोग और खरपतवार से भारी नुकसान होता है। यह भूमि जनित कीटं, रोग और खरपतवार खेत की मिट्टी में पहले से ही पड़े रहते है और अनुकूल मौसम मिलते ही खेत में लगी फसलों को नुकसान पहुंचाते है। अधिकतर किसान जमीन मे छिपे इन रोगों, कीटों से निपटने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे मिट्टी के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण और जीव-जंतु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। किसान साथियों को फसलों के उत्पादन को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों, कीटों व खरपतवारों से बचाव के लिए सौर ऊर्जा का भरपूर उपयोग करना चाहिए।

अगर किसान खेती की जाने वाली जगह का मृदा सौरीकरण कर लें तो इनसे छुटकारा पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मृदा सूर्यीकरण तकनीक में पारदर्शी पालीथीन (प्लास्टिक मल्चिंग) से वर्ष के अधिक तापमान वाले महीनों (मई-जून) में सिचाई उपरान्त खाली पड़े खेत को ढक देते हैं और पालीथीन के किनारों को मिट्टी से अच्छी तरह दबा देते हैं, ताकि मृदा में अवशोषित एवं संचयित ताप बाहर न निकल सकें। जिसके फलस्वरूप खेत की सतह पर तापमान में लगभग 8-12 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो जाती है। जो कि मृदा  में पाये जाने वाले हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं एवं खरपतवारों के बीजों के संक्रामकता दोष से शुद्धि करता है। मृदा में नमी की मात्रा इस तकनीक की सफलता का एक मुख्य कारक है इसलिए पॉलीथीन बिछाने से पहले खेत की हल्की सिंचाई कर देना अति आवश्यक है। इससे मृदा में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु पर सौर ऊष्मा का प्रभाव  बढ़ जाता है तथा साथ ही साथ ऊष्मा का संचालन अधिक गहराई तक होता है।

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इस तकनीक का उपयोग उन क्षेत्रों में संभव है, जहां पर कम से कम 6 से 8 हफ्तों तक आसमान साफ एवं वातावरण का तापमान 40 डिग्री से.ग्रे. से अधिक रहता हो। इसके अतिरिक्त यह भी जानकारी दी कि मृदा सूर्यीकरण से मिट्टी में पाये जाने वाले परजीवी कवकों, जीवाणुओं, सूत्रकृमि व खरपतवार   पर अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः इनकी निष्क्रियता से फसलों को सीधा लाभ होता है। लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सक्रियता, पोषण तत्वों की घुलनशीलता तथा उपलब्धता में वृद्धि एवं प्रभावकारी खरपतवार नियंत्रण आदि सभी कारकों के सम्मिलित प्रभाव से फसलों की बढ़वार तथा अन्ततः पैदावार में प्रशंसनीय वृद्धि हो जाती है। सब्जियों में भूमि जनित (मृदा जनित) प्रमुख बीमारियों में डैम्पिंग ऑफ (पौध गलन), बैक्टीरियल विल्ट (मुरझाना), फ्युजेरियम विल्ट, जड़ सड़नए मूल विगलन और फाइटोप्थोरा ब्लाइट शामिल हैं। इनसे बचाव के लिए    मृदा सूर्यीकरण का प्रयोग सर्वोत्तम है। प्रषिक्षण कार्यक्रम में शासकीय इंदिरा गांधी होम साइंस कॉलेज शहडोल के  विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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