शहडोल: कृषकों को एकीकृत कीट व्याधि प्रबंधन की तकनीकी जानकारी दी
24 सितंबर 2026, शहडोल: शहडोल: कृषकों को एकीकृत कीट व्याधि प्रबंधन की तकनीकी जानकारी दी – कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग शहडोल के संयुक्त तत्वावधान में गत दिनों ग्राम पचड़ी एवं खमरिया कला, विकासखंड सोहागपुर में कृषक प्रक्षेत्र भ्रमण आयोजित कर फसलों में एकीकृत कीट व्याधि प्रबंधन की तकनीकी जानकारी दी गई तथा कृषकों को फसलों में लगने वाले कीट एवं व्याधियों की पहचान और नियंत्रण के उपायों के प्रति जागरूक किया गया।
कृषक प्रक्षेत्र भ्रमण के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने किसानों को बताया कि जिले में वर्तमान समय में धान की फसल में सफेद माहू, तना छेदक, तना गलन एवं शीथ ब्लाइट जैसी कीट एवं व्याधियों का प्रकोप देखा जा रहा है। निरीक्षण के दौरान कुछ किसानों के खेतों में विशेषकर मध्यम से लंबी अवधि वाली धान की फसल में सफेद माहू का प्रकोप पाया गया। वर्तमान समय में वातावरण में अधिक आर्द्रता होने के कारण हॉपर (माहू) कीट के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं। उन्होंने बताया कि सफेद माहू धान की फसल के लिए अत्यंत हानिकारक कीट है। इसके अंडा, शिशु एवं प्रौढ़ तीन अवस्थाएं होती हैं। शिशु एवं प्रौढ़ दोनों अवस्थाओं में यह धान के पौधे के तने से रस चूसकर फसल को तेजी से नुकसान पहुंचाता है। इससे पत्तियां गोल घेरे में पीली एवं भूरे रंग की दिखाई देने लगती हैं और मुरझा जाती हैं, जिसे हॉपर बर्न कहा जाता है। समय पर नियंत्रण उपाय नहीं अपनाए जाने पर हॉपर माहू से होने वाली क्षति 10 से 60 प्रतिशत तक हो सकती है।
डॉ. प्रजापति ने हॉपर माहू के नियंत्रण के लिए खेतों में फसल अवशेष एवं खरपतवारों को नष्ट करने की सलाह दी। कीट का प्रकोप बढ़ने पर खेत से पानी निकाल देने को कहा। देशी नियंत्रण के तहत गौमूत्र में जंगली तुलसी, नीम, सीताफल, बेशरम, धतूरा एवं बेल आदि की पत्तियों को काटकर सड़ाने तथा संभव हो तो इसमें मिर्च एवं लहसुन मिलाकर फसल में प्रारंभ से ही छिड़काव करने की सलाह दी। जैविक नियंत्रण के तहत 1500 पीपीएम वाले एजाडिरेक्टिन (नीम तेल) 5 मिली प्रति लीटर की दर से हींग मिलाकर सुरक्षात्मक रूप से अथवा कीट का प्रकोप प्रारंभ होते ही छिड़काव करने की सलाह दी गई। रासायनिक कीटनाशक के छिड़काव से पूर्व खेत में बांस की सहायता से निश्चित दूरी पर धान के पौधों के बीच रास्ता बनाने की सलाह दी गई, ताकि कीटनाशक का छिड़काव पौधों के तने पर आसानी से किया जा सके। अधिक प्रकोप होने पर पाइमेट्रोजीन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी 120 ग्राम, थायोमिथोक्सोम 25 प्रतिशत 40 ग्राम अथवा बुप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एसएल 350 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई।
डॉ. प्रजापति ने धान में पत्ती लपेटक कीट के संबंध में बताया कि इसकी सूंडी पौधों की कोमल पत्तियों को सिर की ओर से लपेटकर सुरंग जैसी संरचना बना लेती है और उसके अंदर रहकर पत्तियों को खाती रहती है। इससे पत्तियों का रंग उड़ जाता है तथा पत्तियां सिर की ओर से सूखने लगती हैं। अगस्त से अक्टूबर तक इस कीट से फसल को नुकसान हो सकता है। इसके नियंत्रण के लिए लाइट ट्रैप या नीम तेल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी 150 मिलीलीटर, क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी 1000 मिलीलीटर या क्लोरपायरीफास 20 प्रतिशत ईसी 1250 मिलीलीटर को 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने की सलाह दी गई। अंड परभक्षी ट्राइकोग्रामा काइलोनिस का 1 लाख से 1.50 लाख प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने की जानकारी भी दी गई।
सहायक संचालक कृषि श्री रमेन्द्र सिंह ने किसानों को धान के पत्ती लपेटक तथा टमाटर एवं बैंगन के फल छेदक कीट के नियंत्रण के उपायों की जानकारी दी। उन्होंने लाइट ट्रैप अथवा नीम तेल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर के प्रयोग की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सोयाबीन मोजेक रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है, जिससे उपज में 50 से 60 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। प्रारंभिक अवस्था में ही रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़ कर बाहर निकालने तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए नीम तेल 3000 पीपीएम का 3-5 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई।
वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (कार्यालयीन) श्रीमती रेखा अहिरवार एवं कृषि विस्तार अधिकारी सोहागपुर सुश्री भावना मिश्रा ने किसानों को खरपतवारनाशी, फफूंदनाशी एवं कीटनाशकों के उपयोग के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रासायनिक दवाओं का छिड़काव करते समय शरीर को दस्ताने, मास्क, चश्मा, एप्रन एवं गमबूट से सुरक्षित रखें, ताकि कीटनाशक त्वचा अथवा सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश न कर सके। सुबह या देर शाम, जब हवा धीमी हो, तभी छिड़काव करें तथा तेज धूप में छिड़काव से बचें। उन्होंने बताया कि खरपतवारनाशी, फफूंदनाशी एवं कीटनाशक का घोल साफ पानी से तैयार करें और उसे हाथों की बजाय लकड़ी की छड़ी से मिलाएं। स्प्रेयर पंप का नोजल बंद होने पर उसे मुंह से फूंक कर साफ न करें। छिड़काव के बाद पंप को पानी से अच्छी तरह धोकर साफ करने की भी सलाह दी गई।
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