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राज्य कृषि समाचार (State News)

धान, मक्का और अरहर में कीट-रोग का खतरा, कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा की सही मात्रा

08 सितंबर 2026, बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़): धान, मक्का और अरहर में कीट-रोग का खतरा, कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा की सही मात्रा – खरीफ सीजन के इस समय धान, मक्का और अरहर की फसलों में कीट-रोग का प्रकोप बढ़ने लगा है। कृषि विज्ञान केंद्र, भाटापारा और जिला कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क करते हुए तीनों फसलों के लिए अलग-अलग दवा और मात्रा की सलाह जारी की है।

वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार बारिश और उमस भरे मौसम के बीच इस समय पत्ती लपेटक कीट, फॉल आर्मीवर्म और तना अंगमारी जैसी समस्याएं तेजी से फैल सकती हैं। समय पर पहचान और छिड़काव से नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

धान और मक्का में कीट का खतरा

धान की फसल में पत्ती लपेटक कीट का हमला हो रहा है। इसमें सूंडियां पत्तियों को मोड़कर अंदर छिप जाती हैं और पत्तियों पर सफेद धारियां या झिल्ली जैसे लंबे निशान दिखने लगते हैं।

इसके नियंत्रण के लिए कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी की एक किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा क्लोरेन्ट्रानिलीप्रोल की 150 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर, 500 लीटर पानी में घोलकर भी छिड़की जा सकती है।

मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म कीट का असर देखा जा रहा है। इसमें पत्तियों पर छोटे-छोटे छेद, खुरची हुई सतह और गोभ यानी पौधे के बीच वाले हिस्से में कतार जैसे निशान दिखते हैं, जो इस कीट की पहचान का मुख्य तरीका है।

इसके लिए एमामेक्टिन बेंजोएट की 250 से 300 मिलीलीटर मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़कने की सलाह है। इसके अलावा क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल की 150 मिलीलीटर मात्रा भी 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल की जा सकती है।

अरहर में तना अंगमारी रोग और बचाव

अरहर की फसल में तना अंगमारी रोग सामने आ रहा है, जिसमें पौधे के तने पर भूरे से गहरे भूरे रंग के धब्बे या घाव बन जाते हैं। समय पर ध्यान न दिया जाए तो पूरा पौधा सूख सकता है।

इसके इलाज के लिए ताम्रयुक्त कवकनाशी की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कने की सलाह दी गई है। इसके अलावा मेटालेक्सिल एम.जेड. की डेढ़ ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर, 10 से 12 दिन के अंतराल पर तीन बार छिड़काव करने की सलाह भी दी गई है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि दवा का छिड़काव करते समय अनुशंसित मात्रा का ही इस्तेमाल करें और खेत की नमी व मौसम का ध्यान रखें। ज्यादा मात्रा में दवा डालने से फसल को नुकसान भी हो सकता है और लागत भी बढ़ जाती है।

वैज्ञानिकों ने यह सलाह भी दी है कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करना चाहिए, जब तेज धूप न हो और हवा भी कम चल रही हो। तेज धूप में छिड़काव करने से दवा का असर कम हो जाता है और मजदूरों को भी परेशानी होती है।

छिड़काव करते समय दस्ताने, मास्क और पूरी बांह के कपड़े पहनने की भी सलाह दी गई है, ताकि दवा शरीर के संपर्क में सीधे न आए। इसके अलावा खेत में पानी न भरा हो और बारिश की संभावना अगले चार से पांच घंटे तक न हो, तभी छिड़काव करना बेहतर रहता है, वरना दवा बह जाने से असर नहीं होगा।

खेत के आसपास खरपतवार व सूखे पौधों के अवशेष हटाते रहने की सलाह भी दी गई है, क्योंकि इनमें कीट और फफूंद छिपे रह सकते हैं। फसल चक्र अपनाने और बीज को उपचारित कर बोने से भी अगले सीजन में इन समस्याओं का खतरा कम हो जाता है।

यह खबर किसानों और कृषि-इनपुट कारोबार के लिए क्यों मायने रखती है: खरीफ सीजन के इस दौर में समय पर सही दवा और सही मात्रा की जानकारी मिलने से किसान अपनी फसल को बड़े नुकसान से बचा सकते हैं। कीटनाशक और कवकनाशी बेचने वाली दुकानों के लिए भी यह जानकारी जरूरी है, ताकि वे किसानों को अनुशंसित दवा और सही मात्रा की सही सलाह दे सकें, न कि बिना जरूरत महंगी या गलत दवा बेचें।


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