केरल के रबर बेल्ट में रैंबूटान की खेती से बदल रही किसानों की किस्मत, एक हेक्टेयर से मिले 14 लाख रुपये
13 अक्टूबर 2026, कूथाट्टुकुलम (केरल): केरल के रबर बेल्ट में रैंबूटान की खेती से बदल रही किसानों की किस्मत, एक हेक्टेयर से मिले 14 लाख रुपये – केरल के पारंपरिक रबर उगाने वाले इलाकों में अब एक नया फल किसानों की किस्मत बदल रहा है। कूथाट्टुकुलम के आसपास के इलाकों में रैंबूटान की खेती तेजी से एक मुनाफे वाली व्यावसायिक फसल बनती जा रही है, जो कुछ साल पहले तक सिर्फ घरों के पिछवाड़े में उगाई जाती थी।
रैंबूटान एंड मैंगोस्टीन फार्मर्स ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक राज्य में अब करीब 25 हजार एकड़ में इस फल की खेती हो रही है। इस सीजन में करीब एक लाख टन उत्पादन और लगभग एक हजार करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान है।
रबर से ज्यादा मुनाफा
थिरुमरडी गांव के किसान एम. सी. साजू, जो इस किसान संगठन के अध्यक्ष भी हैं, दो तरीकों से रैंबूटान की खेती करते हैं। एक हेक्टेयर में वे 20 बाय 20 फीट की दूरी पर पौधे लगाते हैं, तो दूसरे हेक्टेयर में 40 बाय 40 फीट की दूरी रखते हैं।
उनके मुताबिक पौधे तीसरे साल से फल देने लगते हैं, और एक पेड़ से 300 किलो तक उपज मिल सकती है। साजू कहते हैं कि अगर भाव सिर्फ 100 रुपये प्रति किलो भी रहे, तो एक पेड़ से सालाना करीब 30 हजार रुपये की आय हो जाती है। उनके मुताबिक एक हेक्टेयर से सामान्य तौर पर दो से तीन लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है।
साजू रबर के मुकाबले इस फल को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं। उनका कहना है कि रबर का भाव 300 रुपये तक भी पहुंच जाए, तो भी वह रैंबूटान जितना मुनाफा नहीं दे पाता।
एर्नाकुलम जिले के एक अन्य किसान, जो अपनी फसल के चौथे साल में हैं, ने इस सीजन में एक हेक्टेयर रैंबूटान से करीब 14 लाख रुपये कमाए, जबकि उनका कुल खर्च सिर्फ करीब 60 हजार रुपये रहा।
मेहनत कम, पर कोल्ड चेन की कमी बड़ी चुनौती
किसानों के मुताबिक रैंबूटान की खेती में मेहनत और देखभाल रबर जितनी मुश्किल नहीं है। एक बार पौधे लग जाने के बाद सालों तक नियमित आय मिलती रहती है।
हालांकि फल तोड़ने के बाद उसे ज्यादा दिन तक ताजा रखना आसान नहीं है। किसानों का कहना है कि कोल्ड चेन और रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट की कमी के कारण उन्हें फल को तेजी से बाजार तक पहुंचाना पड़ता है, जिससे दूर के बाजारों में बिक्री सीमित हो जाती है।
कूथाट्टुकुलम में रैंबूटान कॉनक्लेव का आयोजन हुआ, जिसमें किसानों ने आपस में खेती के तरीके और बाजार की जानकारी साझा की। किसानों का कहना है कि अगर कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण की सुविधा बढ़े, तो यह फसल राज्य के और भी किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकती है।
केरल में रबर की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों से लगातार उतार-चढ़ाव रहा है, जिससे कई किसान परिवारों की आय अस्थिर हो गई थी। ऐसे में रैंबूटान जैसी फसलें किसानों को एक नया और ज्यादा भरोसेमंद विकल्प देती दिख रही हैं, हालांकि किसान खुद मानते हैं कि पूरी तरह रबर छोड़ने से पहले कुछ साल दोनों फसलों को साथ रखना ज्यादा सुरक्षित है।
किसान संगठन के मुताबिक रैंबूटान का बाजार अभी ज्यादातर केरल और पड़ोसी राज्यों तक सीमित है, लेकिन मांग लगातार बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में प्रसंस्करण इकाइयां और संगठित बाजार व्यवस्था बनने से किसानों को और बेहतर दाम मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। कुछ किसान अब नर्सरी से पौधे तैयार करके आसपास के इलाकों के नए किसानों को भी बेचने लगे हैं, जिससे उनकी एक अतिरिक्त आय भी शुरू हो गई है।
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