पुदुक्कोट्टई में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी और तना घुन का हमला, किसानों को मिली छिड़काव की सलाह
13 अक्टूबर 2026, पुदुक्कोट्टई: पुदुक्कोट्टई में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी और तना घुन का हमला, किसानों को मिली छिड़काव की सलाह – तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की अक्टूबर महीने की कीट-रोग पूर्वानुमान रिपोर्ट में पुदुक्कोट्टई जिले के कपास किसानों के लिए खास चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी, तना घुन और मीलीबग का प्रकोप देखा जा रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों ने तीनों कीटों के लिए अलग-अलग दवा और मात्रा की सलाह दी है, ताकि किसान समय रहते अपनी फसल बचा सकें।
तना घुन और मीलीबग से बचाव
तना घुन से बचाव के लिए बुवाई से पहले बीज को क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी से 10 मिलीलीटर प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करने की सलाह दी गई है। इसके बाद बुवाई के 15 और 30 दिन पर क्लोरपायरीफॉस 50 ईसी को 1200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की मात्रा में जड़ के पास डालकर मिट्टी चढ़ाने की सलाह दी गई है।
मीलीबग की समस्या के लिए फिश ऑयल रोज़िन साबुन को 25 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़का जा सकता है। इसके विकल्प के तौर पर प्रोफेनोफॉस को 2000 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। हल्के प्रकोप में किसान 2 प्रतिशत नीम तेल का भी छिड़काव कर सकते हैं।
गुलाबी सुंडी पर नजर रखना जरूरी
गुलाबी सुंडी का पता लगाने के लिए खेत में प्रति हेक्टेयर 12 फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है, जिससे कीट के प्रकोप का समय रहते पता चल सके। प्रकोप दिखने पर इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी को 190 ग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा में छिड़का जा सकता है।
इसके विकल्प के तौर पर डाइफ्लुबेंजुरॉन 25 प्रतिशत डब्ल्यूपी को 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर या थायोडाइकार्ब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी को 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालय ने कहा है कि एक ही कीटनाशक को बार-बार न छिड़कें, ताकि कीट में दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता न बने।
रिपोर्ट में बारिश के बाद होने वाली जड़ सड़न की समस्या का भी जिक्र है, जो कपास के खेतों में पानी भरने से बढ़ती है। इसके लिए कार्बेन्डाजिम को 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पौधे की जड़ के पास डालने की सलाह दी गई है।
जिन किसानों के खेत में जैविक तरीके अपनाने की गुंजाइश है, वे ट्राइकोडर्मा एस्परेलम और बैसिलस सबटिलिस को 2.5 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से 500 किलो गोबर की खाद में मिलाकर इस्तेमाल कर सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से कहा है कि छिड़काव से पहले अपने इलाके के कृषि विज्ञान केंद्र से एक बार मात्रा की पुष्टि जरूर कर लें।
पुदुक्कोट्टई जिले में कपास की बुवाई का बड़ा हिस्सा बारिश के पानी पर निर्भर खेतों में होता है, इसलिए फसल में नमी और तापमान में बदलाव का असर कीटों की संख्या पर जल्दी दिखता है। कृषि अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में बीच-बीच में हुई बारिश के बाद खेतों में मीलीबग और तना घुन दोनों के मामले बढ़े हैं।
विश्वविद्यालय ने यह भी सुझाव दिया है कि गुलाबी सुंडी पर नजर रखने के लिए किसान हफ्ते में कम से कम एक बार फेरोमोन ट्रैप की जांच करें और ट्रैप में फंसे कीटों की गिनती नोट करें। अगर एक ट्रैप में लगातार दो-तीन दिन ज्यादा कीट मिलें, तो यह छिड़काव शुरू करने का सही समय माना जाता है।
सिंथेटिक पाइरेथ्रॉइड समूह की दवाओं के बेतरतीब इस्तेमाल से मीलीबग और सफेद मक्खी जैसे कीटों की समस्या और बढ़ सकती है, क्योंकि इससे इनके प्राकृतिक दुश्मन कीट भी मर जाते हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि जहां तक संभव हो, पहले जैविक और कम नुकसानदायक उपायों को आजमाएं और रासायनिक दवा का इस्तेमाल सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही करें।
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